आडवाणी जी का ब्लाग

January 28, 2010
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इस बेबसाइट और मंच के माध्यम से भारतीय जनता पार्टी से संपर्क बनाए रखने वाले सभी मित्रों और शुभचितंकों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं। आप द्वारा हमको भेजे गए बहुमूल्य सुझावों को देखने का अवसर मिला। इस गणतंत्र दिवस के अवसर पर मैं फिर से अपने ब्लॉग को सक्रिय करने की शुरुआत कर रहा हूँ जैसाकि वर्ष 2009 के पूर्वाध्द में करता था।

भारत का संविधान 26 जनवरी, 1950 से लागू हुआ। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या यानी 25 जनवरी से निर्वाचन आयोग अपने हीरक जयंती समारोहों की शुरुआत कर रहा है। स्वतंत्रा के पश्चात् जब भारत ने संसदीय लोकतंत्र को अपनाया था, तो अनेक पश्चिमी पर्यवेक्षकों ने इसकी खिल्ली उड़ाई थी। आखिर इतनी बड़ी संख्या में अपनढ़ नागरिकों की बहुल जनसंख्या वाला देश लोकतंत्र को सफलतापूर्वक चला सकेगा? यही आलोचना का मुख्य भाव रहता था।

अधिकांश अन्य विकासशील देश जो भारत के साथ-साथ ही औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्र हुए थे, और जिन्होंने हमारी तरह लोकतंत्र को अपनाया, उनके यहां लोकतंत्र ज्यादा नहीं चल पाया। वे या तो सैनिक शासन या अधिनायकवाद के किसी न किसी रुप के शिकार हो गए। भारत इस पर गर्व कर सकता है कि हमने जो पध्दति अपनाई उसमें अनेक कठिनाइयों के बावजूद पिछले इन 6 दशकों में हम एक जीवन्त और सशक्त लोकतंत्र के रुप में उभरे हैं, 19 महीने के आपातकाल (जून 1975 से मार्च 1977) के एक काले धब्बे को छोड़कर।

स्वर्गीय बेनजीर भुट्टो के साथ इस विषय पर हुई बातचीत मुझे स्मरण हो आती है जब मैंने उनसे पूछा था कि ब्रिटिश शासन के बाद हमारे दोनों देशों ने एक जैसे लोकतंत्र को अपनाया था-परन्तु लोकतंत्र के मामले में दोनों देशों के अनुभव सर्वथा भिन्न क्यों है? बेनजीर ने इसके दो कारण गिनाए थे; पहला भारत की सेना का सदैव अराजनीतिक रहना और, दूसरा, भारत के संविधान निमार्ताओं द्वारा निर्वाचन आयोग को कार्यपालिका से अलग सचमुच में स्वतंत्र बनाना।

मुझे पता चला है कि अगले माह में किसी समय निर्वाचन आयोग चुनाव सुधारों से जुड़े मुद्दों पर विचार करने के लिए राजनीतिक दलों की बैठक बुलाने जा रहा है। आयोग पेड न्यूज (पैसे लेकर खबर छापने) के सवाल पर भी चर्चा करने को तैयार दिखता है जिसने चुनावों को बदनुमा बना दिया है। मेरा सुझाव है कि इस बैठक के विचारार्थ मुद्दों में इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) की निष्पक्षता और उस पर निर्भरता के मुद्दे को शामिल करना चाहिए जिसे लेकर विश्व के विभिन्न भागों और हाल ही में भारत में भी सवाल उठाए गए है।

यह महत्वपूर्ण है कि जर्मनी जैसा देश जो प्रोद्यौगिकी के मामले में दुनिया के अग्रणी देशों में है, वोटिंग मशीनों (ईवीएम) को निष्पक्ष चुनावों के लिए इतना जोखिम भरा मानता है कि उसने इनके उपयोग को प्रतिबंधित कर रखा है। संयुक्त राज्य अमेरिका अभी इस हद तक नहीं गया है। यद्यपि उसके 50 में से 32 राज्यों ने कानून पारित कर व्यवस्था की है कि ईवीएम का उपयोग तभी किया जा सकता है जब प्रत्येक डाले गए वोट का ”पेपर बैकअप” हो।
अमेरिका में, यह तकनीक वोटर वेरिफाइड पेपर ऑडिट टे्रल (Voter Verified Paper Audit Trail-VVPAT) के नाम से जानी जाती है। वीवीपीएटी वोटिंग मशीन प्रत्येक मतदाता द्वारा डाले गए प्रत्येक वोट का ‘पेपर रिकार्ड’ उपलब्ध कराती है। ईवीएम में वोट डालने के बाद मतदाता उसके ‘पेपर रिकार्ड’ का परीक्षण करता है और यदि वह संतुष्ट है कि इसमें कोई खामी नहीं है, तब वोट मतदाता बक्से में डालता है।

अमेरिकी कांग्रेस में ऐसे राज्यों के इस कानून को संघीय कानून बनाने का प्रस्ताव लम्बित है। मैं आशा करता हूं कि राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के साथ निर्वाचन आयोग की प्रस्तावित बैठक में इस तरह के कानून को भारतीय संसद द्वारा बनाए जाने पर सहमति बनेगी। दुनिया भर के आईटी विशेषज्ञ इसकी पुष्टि कर रहे हैं कि ऐसी कोई इलेक्ट्रॉनिक मशीन नहीं है जिससे छेड़छाड़ न की जा सकती हो! इसलिए ‘पेपर बैकअप’ न केवल मशीन से छेड़छाड़ रोकने का उपाय है अपितु गलत ढंग से काम करने वाली मशीनों की समस्या का समाधान भी है। मैं अपने सभी देशवासियों को गणतंत्र दिवस की बधाई देता हूँ।

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