आपातकाल की स्मृतियाँ

June 19, 2010

आज पूरी दुनिया में भारत को सम्मान सिर्फ इसलिए नहीं मिलता कि उसे एक उभरती हुई बड़ी आर्थिक शक्ति माना जाता है अपितु इसलिए भी मिलता है कि विकासशील देशों में से भारत ही एकमात्र देश है जहां लोकतंत्र जीवंत और सशक्त ढंग से चल रहा है।

हालांकि, देश के भीतर अनेकों लोग इस बात से अनजान हैं कि जून, 1975 में हम एक ऐसी स्थिति में आ गए थे जहां सत्तारुढ़ दल बहुदलीय लोकतंत्र को दफनाकर एकदलीय लोकतंत्र स्थापित करना चाहता था।इस मास के अपने ब्लॉगों में, मैं विशेषरूप से वह सब स्मरण करने की कोशिश कर रहा हूं जो 26 जून, 1975 को देश पर थोपे गए आपातकाल के समय घटित हुआ।

देश को स्वतंत्र भारत के इतिहास के इस पक्ष के प्रति जागृत और सजग रहना चाहिए । इस पक्ष को भुला देने का अर्थ होगा लोकतंत्र की अवधारणा के साथ विश्वासघात !

जैसा कि गत सप्ताह मैंने बताया था कि 12 जून, 1975 को घटित दो घटनाएं आपातकाल की ओर ले गईं । साथ ही आपातकाल सत्तारुढ़ पार्टी के बहुत से नेताओं के लोकतंत्र के प्रति आतंरिक अविश्वास को सामने लाया। संभवतः इस भाव को सही ठहराते हुए ही उन दिनों श्रीमती इंदिरा गांधी ने एक बार कहा था : ”लोकतंत्र से ज्यादा महत्वपूर्ण राष्ट्र है।”

पंडित नेहरु द्वारा नई दिल्ली से शुरू किये गए दैनिक नेशनल हेराल्ड ने सम्पादकीय लिखकर तंजानिया जैसे अफ़्रीकी देश में एकदलीय प्रणाली की प्रशंसा करते हुए कहा कि यह किसी भी रुप में बहुदलीय प्रणाली से कम नहीं है। पत्र ने लिखा :

वेस्टमिन्स्टर मॉडल ही बेहतर मॉडल होना जरुरी नहीं है, और कुछ अफ्रीकी देशों ने यह प्रदर्शित किया है कि कैसे लोगों की आवाज सुनी जाएगी, चाहे लोकतंत्र का बाहरी ढांचा कैसा भी हो। एक मजबूत केन्द्र की आवश्यकता पर जोर देते हुए प्रधानमंत्री ने भारतीय लोकतंत्र की मजबूतियां बताई है: एक कमजोर केन्द्र देश की एकता, अखण्डता और अस्तित्व को खतरा हो सकता है । उन्होंने सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है: यदि देश की स्वतंत्रता ही नहीं बची तो लोकतंत्र कैसे जीवित रह सकता है?”

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1975 के आपातकाल पर असंख्य पुस्तकें लिखी गई हैं । इनमें से अधिकांश श्रीमती इंदिरा गांधी के आलोचकों ने लिखी है । इन दिनों मैं एक रोचक पुस्तक पढ़ रहा हूं जो उनकी प्रशंसक सुपरिचित पत्रकार उमा वासुदेव ने लिखी है। आपातकाल की घोषणा से कुछ ही पहले श्रीमती गांधी की तारीफ करते हुए उन्होंने एक पुस्तक प्रकाशित की जिसका शीर्षक था – ” Indira Gandhi – Revolution in Restraint”.

लेकिन आपातकाल और उस अवधि में जो कुछ हुआ, उसने उन्हें व्यथित कर दिया । परिणाम यह हुआ कि उसी नेता के बारे में उनकी दूसरी पुस्तक ”Two faces of Indira Gandhi” सामने आई।

पुस्तक इस अनुच्छेद से प्रारंभ होती है :

‘जून 1976 में, भारत की राजधानी से 600 मील दूर पंचमढ़ी की ठंडी पहाड़ियों में राजनीतिक अज्ञातवास में बैठे पण्डित द्वारका प्रसाद मिश्र, जो कि 1967-69 में पार्टी में अपने विरोधियों को परास्त करने में इंदिरा गांधी के मुख्य रणनीतिकार और विश्वस्त सलाहकार थे, ने उनसे मिलने आए एक प्रशासनिक मित्र को यह किस्सा सुनाया – ”तीस के दशक में मैं एक ऐसे राजनीतिक बंदी को जानता था जिसे अपनी पालतू बिल्ली के प्रति इतना लगाव था कि उसको उसे अपनी कोठरी में साथ रखने की अनुमति मिल गई थी। एक दिन उसने अवसाद और क्रोध की स्थिति में अपनी बिल्ली को बुरी तरह से पीटा। बिल्ली एक कोने में दुबककर बैठ गई, क्योंकि कोठरी के द्वार बंद थे और बाहर का कोई रास्ता न होने से वह उसमें फंस गई थी। जब भी उसका पूर्व रखवाला उसके निकट आता, वह सहमकर पीछे हटती और रिरियाहट करती। जेलर यह सुनकर भागा आया। जैसे ही कोठरी के द्वार खुले, बिल्ली बाहर भागने के बजाय छलांग लगाकर अपने मालिक पर चढ़ गयी और उसकी गर्दन को अत्यंत गुस्से में ऐसा दबोचा कि उसकी पकड़ से छूटने के पहले तक वह लगभग मर ही गया था।” चश्मे के पीछे से चमकती छोटी सी आंखों वाले श्री मिश्र ने बताया कि कहानी का सार यह है कि ”यदि आप दुश्मन पर वार करना चाहते हो तो उसके लिए बाहर निकलने का रास्ता भी अवश्य छोड़ो, अन्यथा उसकी हताशा उसे एक कातिल बना सकती है।”

संदर्भ माओवादी का था लेकिन वह कहीं और भी लागू होता था। 26 जून, 1975 को इंदिरा गांधी द्वारा आंतरिक आपातकाल घोषित किए जाने का एक वर्ष हो चला था। विपक्ष के सभी दिग्गज अभी भी जेल में थे, इनमें जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, राजनारायण, लालकृष्ण आडवाणी और पीलू मोदी जैसे बड़े नामों के साथ कांग्रेस के चन्द्रशेखर, मोहन धारिया, कृष्णकांत, रामधन और पी.एन. सिंह जैसे नेता भी उनके साथ जेलों में थे। मीडिया पर सेंसरशिप लागू थी। बहस और असहमति फुसफुसाहट तक सीमित थी जबकि अफवाहें भय बढ़ा रही थीं। राजनीतिज्ञों और बुध्दिजीवियों में असहज सामना हो रहा था. ज्ञान का क्षेत्र संकुचित से और संकुचित होता जा रहा था, और सत्य, इन्द्रधनुष के सातों रंगों से ज्यादा प्रतीत हो रहा था।’

इस विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए उमा वासुदेव ने अपनी पुस्तक के अंतिम अध्याय ”Dark Side of the Moon” में लिखा है:

जून 1976 में एक दिन बंगलौर जेल में एक दृढ़ संकल्पी बुजुर्ग आया। वह भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी से मिलना चाहता था जो आपातस्थिति की घोषणा होते ही अन्य कैदियों के साथ वहां बंदी थे। जब आडवाणी सामने आए तो उस बुजुर्ग ने देखा एक लम्बा, पतला, श्वेतवर्ण सिंधी, मूछों और शांत स्वभाव वाला व्यक्ति खड़ा है जिसके हाव-भाव से कुछ प्रकट नहीं हो रहा था.

”कहिए”? आडवाणी मुस्कराए।

बुजुर्ग फूट पड़ा ”मैं पैंसठ का हूं। वह (श्रीमती इंदिरा गांधी) जो कर रही हैं मैं उसे बर्दाश्त नहीं कर सकता। मैं जो चाहता था वह कर चुका हूं। जीने के लिए मेरे पास अब ज्यादा समय नहीं है। बताओ मैं क्या करूं? मैं मरने को तैयार हूं। मैं जाकर उन्हें गोली मार सकता हूं।”

”नहीं”, आडवाणी ने कहा।

लेकिन जेल के भीतर अन्य कार्यकर्ता धैर्य खो रहे थे। यह भावना घर करती जा रही थी कि नेतृत्व आत्मसंतुष्ट होकर बैठ गया है और नए कदम के लिए कोई योजना तैयार नहीं है। कारावास में आडवाणी के सहयोगी शिकायत करते थे ”आपको ऐसा लगता है कि कुछ और करने की जरूरत नहीं है।”

आडवाणी सोचते थे कि कोई भी अधिनायकवादी शासन हिंसा द्वारा नहीं बदला जा सकता। सिवाय इसके कोई विकल्प नहीं था कि जनता के जागृत होने की प्रतीक्षा की जाए।

”उस समय इंदिरा गांधी के विरूध्द काफी गुस्सा था। क्या आप सोचते हैं कि संभवतया उनकी हत्या हो जाएगी या यदि वह फिर से सत्ता में वापस आने में सफल होंगी ?” मैंने पूछा।

उनका उत्तर था, ”जिस हद तक वह चली गईं थी उसका विचार करते हुए शायद यह हो भी जाता यदि कोई दूसरा देश रहा होता तो। लेकिन भारत में नहीं। भारत इतना विशाल है और यह उसके लोगों के मानस में नहीं है; अन्यथा यह कभी का हो गया होता। इसके अलावा उनकी विरोधी राजनीतिक शक्तियों का नेतृत्व ऐसे किसी भी किस्म के कदम का विरोधी था। वे ऐसे क़दमों को स्वीकार नहीं करते थे। शांति के लिए उनकी प्रतिबद्धता अत्यंत मजबूत थी।”

आपातकाल के समय प्रेस पर सेंसरशिप अत्यन्त कड़ी थी। सरकार, सत्ता प्रतिष्ठान या आपातस्थिति की आलोचना की भी अनुमति नहीं थी।

इसलिए बंगलौर जेल, जहां मैंने 19 महीनों में सबसे ज्यादा समय बिताया, में जब मुझे ‘क्वेस्ट’ (QUEST -मुंबई से प्रकाशित नवम्बर-दिसम्बर, 1975 की एक त्रैमासिक पत्रिका) की प्रति मिली जिसमें आशीष नंदी का लेख था, मैं चकित हो गया। उनके लेख का लब्बो-लुबाब यह था – शासकों को बताया गया कि यदि आप अपने वर्तमान कदम पर चलते रहते हैं तो आप हत्या के लिए निमंत्रित कर रहे हैं। लेख का शीर्षक भी लम्बा था: ”इन्विटेशन टू ए बीहेडिंग: ए सायक्लोजिस्ट्स गाइड टू एसेसनेशन इन द थर्ड वर्ल्ड”।

इस लेख का एक अंश कुछ इस तरह था:

”हत्यारे और उसके शिकार के बीच गहरा और चिरस्थायी रिश्ता है। सिर्फ मौत खुले तौर पर और अंतत: उन्हें इकट्ठा लाती है। हालांकि ऐसे तानाशाह भी हैं जो वास्तव में देश में सभी को संभावित हत्यारा बना देते हैं और कुछ ऐसे नेता भी होते है जो लोगों के मानस में अपनी हत्या की अवधारणा को कुंद कर देते हैं और अपने संभावित हत्यारों को चंद अवसाद-ग्रस्त कुंठित मनोरोगियों में तब्दील कर देते हैं.

नीरो बादशाह पहली श्रेणी और मार्टिन लूथर किंग दूसरी श्रेणी में आते हैं। एक विशिष्ट श्रेणी के शासक ऐसे भी होते हैं जो प्रकटतः जन-सहमति से देश के भीतर और जहाँ तक संभव हो, बाहर की दुनिया में भी निरंकुश और अतिवादी हो जाते हैं। उनकी विकृत प्रकृति लोगों को व्यक्तिगत हत्याओं से परे सामूहिक आत्महत्या की ओर ले जाती है। एडोल्फ हिटलर उस नस्ल का जाना पहचाना ज्वलंत उदाहरण है। लेकिन ऐसे नेता विरले ही होते हैं। ऐसी स्थितियां ज्यादा होती हैं जहां शासक लोकप्रिय और करिश्माई है परन्तु अपनी आंतरिक अतिरंजनाओं से स्वयं ही अपनी हत्या की पृष्ठ-भूमि तैयार करते हैं। ऐसे मामलों में, ऐसे व्यक्तियों की अभिप्रेरक अनिवार्यता और अपनी मनोवैज्ञानिक जरूरतों के अनुसार राजनीति को ढालने के उनके प्रयास ही उनके संभावित हमलावरों को निमंत्रण देते हैं ।

ऐसे शासकों की पहली विशेषता पूर्ण विश्वास करने की उनकी असमर्थता होती है। यद्यपि उसकी आकर्षक शैली और आचार से काफी समय तक यह छुपा रहता है और वह अपने द्वारा निर्मित आंतरिक संसार में रहता है जहाँ ज्यादातर लोग विश्वास करने योग्य नहीं होते। हांलाकि जब वह किसी पर विश्वास भी करता है तो बहुत कम क्षण के लिए । उसके सिपहसालारों की श्रृंखला उसी तरह से आती और जाती रहती है ठीक जैसे रेलवे के डिब्बे में लोग अंदर घुसते और बाहर जाते रहते हैं।

ऐसा शासक सिर्फ अपने परिवार के सदस्यो पर ही विश्वास करता है या उन पर जो राजनीति से बाहर से आकर जन- अवधारणा को प्रभावित करने में उसकी मदद करते हैं और जिनका अपना कोई व्यक्तिगत आधार नहीं होता और जो पूर्णतया उस पर आश्रित होते हैं।”

मेरी रिहाई के बाद उमा वासुदेव मुझसे आकर मिली और हमने आपातकाल की घटनाओं और नेशनल हेराल्ड द्वारा तंजानिया जैसी एकदलीय प्रणाली ( ऊपर उद्धृत पुस्तक में उल्लिखित एक तथ्य) स्थापित करने की वकालत के मुद्दे पर चर्चा की। सुश्री वासुदेव ने मुझसे कहा : लेकिन क्या यह सत्य नहीं है कि यह सम्पादकीय 11 अगस्त को लिखा गया परन्तु 25 अगस्त को इसी समाचार पत्र ने यह भी लिखा :

”प्रधानमंत्री ने पिछले दिनों में स्पष्ट किया है कि इस देश में एकदलीय प्रणाली स्थापित करने के लिए कोई प्रयास नहीं हो रहे और न ही वह संविधान सभा या एक नए संविधान के बारे में सोच रही है । जहाँ तक दलीय प्रणाली का सम्बन्ध है, एक दलीय प्रणाली यद्यपि उसका उत्तर सैध्दांतिक तौर पर हो सकता है, लेकिन यह थोपा नहीं जाएगा; यह केवल स्वाभाविक तौर पर ही उभर सकता है और वर्तमान में ऐसी कोई संभावना नहीं है। ”

प्रधानमंत्री के इस वक्तव्य को उद्धृत करने के बाद उन्होंने मुझसे पूछा : ” 11 और 25 अगस्त के बीच क्या हुआ था ? ”

तत्काल मेरा उत्तर था : ”15 अगस्त को शेख़ मुजीब की हत्या.” मैने आगे कहा : ” इससे उन्हें गहरा झटका लगा और यह अहसास हुआ कि लोकतंत्र को अवश्य ही बनाए रखना चाहिए”।

लाल कृष्ण आडवाणी
नयी दिल्ली

१९ जून, २०१०

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