एक अक्षम्य भारी भूल

October 17, 2010

जम्मू एवं कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने वाकई इतिहास रच डाला है। जम्मू एवं कश्मीर के किसी अन्य मुख्यमंत्री ने कभी इसका प्रतिवाद नहीं किया कि जम्मू एवं कश्मीर राज्य भारत का अभिन्न अंग है। ऐसा करके उमर ने न केवल भाजपा को चिढ़ाया है अपितु आगे बढ़कर जो कहा है उससे राज्य में अलगाववादी और पाकिस्तान का मीडिया हर्षोन्माद में है।

 

राज्य विधानसभा में एक ताजा वक्तव्य में, उमर ने कहा: जम्मू एवं कश्मीर राज्य भारत के साथ जुड़ा है; इसका भारत के साथ विलयनहीं हुआ है।

 

तथ्य यह है कि 500 से ज्यादा रियायतें जिनमें हैदराबाद और जूनागढ़ शामिल है जिनका विशेष रुप से उल्लेख करते हुए उमर ने इसे जम्मू-कश्मीर से भिन्न केस बताया है- ने उसी तरह विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए जैसेकि जम्मू एवं कश्मीर ने किए हैं, और स्वतंत्रता के बाद भारत अखण्ड हिस्सा बने। और पिछले 6 दशकों से ज्यादा समय से न केवल अकेली भाजपा जम्मू एवं कश्मीर को भारतीय क्षेत्र का अभिन्न अंग बताती है अपितु देश के प्रत्येक नेता पंडित नेहरु से लेकर श्रीमती इंदिरा गांधी से वर्तमान विदेश मंत्री श्री एस.एम. कृष्णा भी इसकी पुष्टि करते रहे हैं।

 

वास्तव में पाकिस्तान के समाचार पत्र डानके 8 अक्टूबर के मुख्य पृष्ठ पर एस.एम. कृष्णा के दावे को विधानसभा में उमर के भाषण के सामने प्रकाशित किया है।

 

1994 में भारतीय संसद के दोनों सदनों द्वारा जम्मू-कश्मीर पर पारित सर्वसम्मत प्रस्ताव को यहां स्मरण करना समीचीन होगा, जिसमें दृढ़तापूर्वक कहा गया है:

 

जम्मू एवं कश्मीर राज्य भारत का अभिन्न अंग रहा है, और रहेगा तथा शेष भारत से इसे अलग करने के लिए किसी भी प्रयासों का सभी आवश्यक साधनों से प्रतिरोध किया जाएगा।

 

यही प्रस्ताव आगे कहता है:

 

पाकिस्तान को भारत राज्य के जम्मू एवं कश्मीर का क्षेत्र खाली करना चाहिए जिसे उसने बलात हथिया रखा है।

 

अभी तक उमर अब्दुल्ला के त्यागपत्र की मांग इस आधार पर की जा रही थी कि वह पत्थर फेंकने वाली भीड़ द्वारा घाटी में पैदा किए गए हालात से निपटने में असफल रहे हैं। कुछ तत्व इसे उनकी प्रशासनिक अनुभवहीनता मानते थे। परन्तु उनके ताजे बयान से साफ होता है कि यह उनकी मात्र प्रशासनिक अनुभवहीनता नहीं है अपितु जहां तक जम्मू एवं कश्मीर का सम्बन्ध है, वह राष्ट्रीय मूड से पूरी तरह अलग है। इसलिए जितना जल्दी वे त्यागपत्र दे दें तो उतना ही जम्मू एवं कश्मीर और राष्ट्र के लिए अच्छा होगा।

 

विधानसभा के अपने भाषण में उमर अब्दुल्ला ने धारा 370 को समाप्त करने की भाजपा की मांग का आलोचनात्मक संदर्भ दिया। डा. श्यामा प्रसाद मुकर्जी के दिनों से हम एक प्रधान] एक निशान और एक विधान के लिए कटिबध्द रहे हैं।

 

डा. मुकर्जी द्वारा शुरु किए गए कश्मीर आंदोलन और बंदी अवस्था में उनकी मृत्यु से पहले दो लक्ष्य-एक प्रधान और एक निशान तो हासिल हो गए। तीसरा लक्ष्य एक संविधान-हासिल होना शेष है। और हम उसे हासिल करने के लिए कृतसंकल्प हैं।

 

बहुतों को यह नहीं पता होगा कि धारा 370 के कारण जम्मू एवं कश्मीर राज्य के पृथक संविधान की धारा 3 इस तरह है:

 

राज्य का भारत संघ के साथ सम्बन्ध- जम्मू एवं कश्मीर भारत संघ का अभिन्न अंग है और रहेगा।

 

भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति ए.एस. आनन्द ने अपनी पुस्तक द कांस्टीटयूशन ऑफ जम्मू एण्ड कश्मीर में उपरोक्त भाग पर निम्न टिप्पणी की है।

 

1951 में राज्य संविधान सभा आहूत की गई थी ताकि वह राज्य के जुड़ने के सम्बन्ध में अपने तर्कसंगत निष्कर्षदे सके। संयुक्त राष्ट्र संघ में कश्मीर सम्बन्धी विवाद पर ठहराव आ चुका था। राज्य के भविष्य के बारे में अनिश्चितता समाप्त करने के उद्देश्य से कश्मीर में असेम्बली ने पर्याप्त विचार-विमर्श के बाद 1954 में राज्य के भारत में विलय की पुष्टि की।

 

1956 में, जब राज्य संविधान की ड्राफ्टिग को अंतिम रुप दिया जा रहा था, तक राज्य संविधान में राज्य के विलय को एक स्थायी प्रावधानमानने के सम्बन्ध में राज्य की अंतत: स्थिति को शामिल करना जरुरी समझा गया। यही वह विचार था जो संविधान के भाग 3 के रुप में अपनाया गया।

 

इस भाग में शब्द प्रयोग में लाए गए हैंऔर रहेगा। इससे साफ होता है कि राज्य के लोगों के मन में भारत के साथ जुड़ने के बारे में कभी कोई शक नहीं था। यह भाग मात्र उनकी इच्छा कि भारत संघ के अभिन्न अंगबने रहने की पुष्टि भर है।

 

तब क्यों, मि. उमर, आप भाजपा के यह कहने पर नाराज होते हो?

 

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पिछले सप्ताह समाचार पत्रों की यह दो सुर्खियां थी :

 

राजा इगर्नोड पीएम, लॉ मिनिस्ट्रीज एडवाइस आन 2जी स्पेक्ट्रम, सेस सीएजी

(राजा ने 2 जी स्पेक्ट्रम पर प्रधानमंत्री, विधि मंत्रालय के परामर्श की उपेक्षा की, सीएजी का कहना है)

 

नथिंग मूव्स विदआउट मनी, सेस एक्सपर्ट

(बगैर पैसे के कुछ भी नहीं हिलता, विशेषज्ञो का कहना है)

 

दोनों सुर्खियों भ्रष्टाचार सम्बन्धी समाचारों से जुड़ी हैं-पहली में एक केंद्रीय मंत्री शामिल है, और दूसरी केंद्र सरकार में व्याप्त भयंकर भ्रष्टाचार पर सर्वो

च्च न्यायालय द्वारा की गई कड़ी निंदा का सार है।

 

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने बताया कि ए. राजा की टेलीकॉम मिनिस्ट्री ने 2008 में समूचे स्पेक्ट्रम आवंटन में विधि मंत्रालय, वित्त मंत्रालय और यहां तक कि प्रधानमंत्री की सलाह को नजर अंदाज करते हुए मनमाने ढंगसे काम किया।

 

सी.ए.जी. के अनुमान से इस मनमाने दृष्टिकोण से देश को 1.40 लाख करोड़ रुपए की विशाल धनराशि का नुक्सान उठाना पड़ा है! सी.ए.जी. के अनुमान से यह स्पेक्ट्रम घोटाला आजादी के बाद से सर्वाधिक बड़ा घोटाला बनता है।

 

सी.ए.जी. रिपोर्ट कहती है:

 

टेलीकॉम मंत्रालय ने स्पष्ट और तार्किक या मान्य कारणों के बिना वित्त और विधि मंत्रालय की सलाह को उपेक्षित किया, 2जी स्पेक्ट्रम जैसी दुर्लभ परिमित राष्ट्रीय सम्पदा को आवंटित करने हेतु टेलीकॉम आयोग के विचार-विमर्श को नकारा।

 

स्पेक्ट्रम की कमी और वाजिब से कम दाम के बारे में सभी एजेंसियों की जानकारी के बावजूद, लाइसेंस जारी करने का प्रवेश शुल्क 2001 में निर्धारित की गई दरों से बंधा हुआ रखा गया।

 

सीएजी ने टेलीकॉम मंत्रालय के इस तर्क को खारिज कर दिया कि स्पेक्ट्रम आवंटन पिछली सरकार द्वारा निर्धारित की गई नीति के अनुसार ही किया गया है। सीएजी कहता है कि यह दावा गलत है कि पूर्ववर्ती सरकार की नीति का पालन किया गया। सन् 2003 में केबिनेट ने भविष्य में सभी आवंटनों को सीधे नीलामी से करने का निर्देश दिया था।

 

जहां तक दूसरे समाचार का संबंध है उसमें पहले जैसे की भांति किसी बड़े राजनीतिज्ञ के शामिल होने का मामला नहीं है, लेकिन फिर भी यह एक मध्यवर्ती सरकारी अधिकारी से सम्बन्धित है, सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियां दर्शाती हैं कि बार-बार भ्रष्टाचार के केसों के मामले में देश का सर्वोच्च न्यायालय कैसे क्रोधित और उत्तेजित है।

 

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति मार्केण्डय काटजू और टी.एस. ठाकुर की पीठ कहती है:

 

यहां अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश में भ्रष्टाचार पर कोई नियंत्रण नहीं है। विशेष रुप से आयकर, बिक्री कर और आबकारी विभागों में भ्रष्टाचार काबू से बाहर है। बगैर पैसे के कुछ भी नहीं हिलता।

 

स्पष्ट कटाक्ष करते हुए पीठ ने आगे कहा: क्यों नहीं सरकार भ्रष्टाचार को वैध बना देती जिससे प्रत्येक केस के लिए एक विशेष राशि निर्धारित हो जाएगी। मान लीजिए यदि एक व्यक्ति अपने मामले को सुलझाना चाहता है तो उसे 2,500 रुपए भुगतान करने को कहा जाए।उससे प्रत्येक व्यक्ति को पता चल सकेगा कि उसे कितनी रिश्वत देनी है।

 

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यह अत्यंत संतोषजनक है कि नई दिल्ली में राष्ट्रमण्डल खेलों की समांप्ति के बाद ही प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने खेलों से जुड़े भ्रष्टाचार और विभिन्न कुप्रबन्धन के आरोपों की जांच की घोषणा की है।

 

देश को आशा है कि आद्योपांत जांच होगी और गलत काम करने वाला कोई भी बख्शा नहीं जाएगा। और केवल बलि का बकरा ढूढने की खोज नहीं होगी।

 

देश के भीतर के प्रेक्षकों को भारतीय खिलाड़ियों द्वारा बड़ी मात्रा में पदक जीतने, और उद्धाटन तथा समापन के अवसर पर भव्य कार्यक्रमों के सफल क्रियान्वयन से, महीनों से नकारात्मक प्रचार पा रहे राष्ट्रमण्डल खेलों के लिए कुछ हद तक क्षतिपूर्ति करने वाली हैं। लेकिन भारत के बाहर रहने वाले भारतीयों की बात मानी जाए तो विदेशों में इसका प्रचार नकारात्मक ही रहा है।

 

हालांकि, यह एक सुखद संयोग है कि राष्ट्रमण्डल खेलों के अंतिम दिन ने भारत को आस्ट्रेलिया के बाद दूसरे स्थान पर स्थापित किया है, इसके साथ-साथ क्रिकेट में भारत को तीन विजय मिलीं: (1) 2 मैच वाली श्रृंखला में आस्ट्रेलिया के ऊपर विजय, (2) दुनिया की क्रिकेट टीमों में भारत का पहले स्थान पर पहुंचना और (3) सचिन तेदुंलकर का लाजवाब प्रदर्शन। सभी खेलप्रेमियों को स्वाभाविक रुप से उस दिन गर्व महसूस हुआ होगा।

 

 

लालकृष्ण आडवाणी

नई दिल्ली

17 अक्टूबर, 2010

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