एक बंधन जो देश को बांधे रखता है

May 23, 2010
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मेरे और मेरी सुपुत्री प्रतिभा के लिए पिछला सप्ताह सदैव अविस्मरणीय रहेगा। लगातार दो दिनों तक हमने दो ऐसे पवित्र स्थलों की यात्रा की जिन्हें देखने के लिए हम काफी समय से सोच रहे थे।

पहला गंगोत्री था जोकि पवित्र गंगा का उद्गम स्थल है। गंगोत्री से 19 किलोमीटर ऊपर गोमुख से गंगोत्री ग्लेशियर प्रारम्भ होता है। गंगोत्री में गंगा के निकट जहां यज्ञ हो रहा था और जिसमें पूर्णाहूति के लिए मुझे आमंत्रित किया गया था, पर जब हमने पांव गंगा में रखे तो ग्लेशियर का पानी बर्फ जैसा था।

दूसरा था केदारनाथ जो कि देश के बारह ज्योर्तिलिंगों में से एक है। इनमें सर्वाधिक प्रमुख गुजरात के सोमनाथ में स्थित द्वादश ज्योर्तिलिंग है। एकध्रुवीय भारत की राजनीति को द्विध्रुवीय राजनीति में परिवर्तित करने में भाजपा की सोमनाथ से अयोध्या रथयात्रा की महत्वपूर्ण भूमिका है।
A view of Kedarnath Temple

उत्तराखण्ड प्रदेश में तीर्थ स्थलों की भरमार है। इसमें आश्चर्य नहीं है कि यह देवभूमि के नाम से लोकप्रिय है। गंगोत्री और केदारनाथ को प्रदेश के चार धामों में से दो के रुप में माना जाता है, जहां तीर्थयात्री दर्शन करने की इच्छा रखते हैं, शेष दो धाम हैं बदरीनाथ और यमुनोत्री

पांच से 6 महीने, अप्रैल तक यह चारों स्थल वर्फ से ढके रहते हैं। इन स्थलों पर मंदिर प्रतिवर्ष मई मास के मध्य में खुलते हैं। इस वर्ष गंगोत्री मंदिर 16 मई और 18 मई को खुले। गंगोत्री समुद्र तल से 10000 फीट और केदारनाथ 12000 फीट ऊपर है।

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अक्टूबर, 1961 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने अपना अधिवेशन तमिलनाडू के दूसरे सर्वाधिक बड़े शहर और विश्व प्रसिध्द मीनाक्षी मंदिर के स्थान मदुरई में आयोजित किया था। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान 1921 में मदुरई में ही गांधीजी ने सिर्फ खादी पहनने का निर्णय किया था।

पचास वर्ष बाद ए.आई.सी.सी. के अधिवेशन में पंडित नेहरु ने अविस्मरणीय भाषण दिया जिसमें उन्होंने रेखांकित किया कि कैसे तीर्थयात्राएं देश को जोड़ने में प्रमुख भूमिका निभाती हैं।

नेहरुजी ने कहा:

”भारत युगों-युगों से तीर्थयात्राओं, तीर्थस्थानों का देश रहा है। समूचे देश में आपको प्राचीन स्थान मिलेंगे। हिमालय की बर्फ से ढकी चोटियों पर बदरीनाथ, केदारनाथ तथा अमरनाथ से दक्षिण में कन्याकुमारी तक आपको तीर्थस्थल मिल जाएंगे। दक्षिण से उत्तर तक तथा उत्तर से दक्षिण तक कौन सी प्रेरणा-शक्ति लोगों को इन महान तीर्थस्थलों की ओर आकर्षित करती आ रही है ? यह एक राष्ट्र की भावना तथा एक संस्कृति की भावना है और इस भावना से हम परस्पर बंधे हुए है। हमारे प्राचीन ग्रंथो में कहा गया है कि भारतभूमि उत्तार में हिमालय से लेकर दक्षिण में समुद्र तक फैली है। सदियों से भारत की यह संकल्पना चली आ रही है तथा इसने हमें परस्पर बांध रखा है। इस महान् घारणा से प्रभावित होकर लोगों ने इसे ‘पुण्यभूमि’ माना है। जबकि हमारे यहां अनेक साम्राज्य हुए है तथा हमारी विभिन्न भाषाएँ प्रचलित रही है। यह कोमल बंधन ही हमें अनेक तरीकों से बांधे रखता है।”

जब गत् सप्ताह मैं गंगोत्री गया और वहां उल्लेख किया कि मुझे केदारनाथ जाना है तो मुझे सलाह दी गई कि गंगोत्री से जल लेजाकर उसे केदारनाथ के शिवलिंग पर चढ़ाना चाहिए।

इससे पूर्व मैंने अपने सहयोगियों को बताया कि देश के चारों धामों-बदरीनाथ, जगन्नाथपुरी, द्वारका और रामेश्वरम में से मैं सिर्फ रामेश्वरम नहीं जा पाया हूं। गंगोत्री मंदिर पर मुझे बताया गया कि रामेश्वरम के शिवलिंग पर गंगा का जल चढ़ाना अत्यन्त पवित्र रिवाज है। मुझे यह भी ज्ञात हुआ कि रामेश्वरम से रेत लेकर बदरीनाथ में गंगा में लाना भी इसी प्रकार एक पवित्र रस्म है।

अत: यह केवल तीर्थस्थानों का नेटवर्क ही नहीं अपितु सदियों से विकसित हुए रीति रिवाजों ने भी तीर्थयात्रियों की सतत यात्रा को प्रोत्साहित किया है। मैं विश्वास करता हूं कि यही वह डोर है जिसे पंडित जी ने ”हमको एक सूत्र में बांधने वाले कोमल बंधन” के रूप में परिभाषित किया है।

मैं नहीं जानता कि हमारे पर्यटन विभाग इस तथ्य से कितने परिचित हैं कि भारत में घरेलु पर्यटन का बहुत बड़ा वर्ग धार्मिक पर्यटन वाला है। सभी को ध्यान में रखना चाहिए कि कैसे राज्यपाल जगमोहन ने वैष्णो देवी के आस-पास आधारभूत ढांचा, साफ- सफाई व्ययन और अन्य सुविधाओं के मामले में अनुकरणीय विकास किया है जिससें जम्मू में कटरा हमेशा पर्यटको का पसंदीदा क्षेत्र बन गया है। ऐसा ही तिरुपति, हरिद्वार और ऋषिकेश, अमृतसर, और अजमेर के बारे में भी सत्य है।

इस सप्ताह जकार्ता (इण्डोनेशिया) में बसे भारतीयों का एक समूह मुझसे मिला और मुझे अपने देश में एक कार्यक्रम के लिए निमंत्रित किया , मैने सरसरी तौर पर उनसे पूछा ” क्या आप लोग कभी तिरुपति गये है ?” उनमें से एक ने मुझे यह कह कर आश्चर्य में डाल दिया कि : ” मै कम से कम सत्ताईस बार तिरुपति गया हूं।”

केन्द्र और राज्यों की सरकारें अच्छा होगा कि धार्मिक पर्यटन की असीम संभावनाओं को ध्यान में लें और जैसा वैष्णो देवी में जगमोहन जी ने किया है वैसा ही सभी पवित्र स्थलो – हिन्दू, मुस्लिम, या सिख, जैन या ईसाइयों के हों, में भी करें । बिहार में बौधगया या मध्यप्रदेश में सांची जैसे स्थान जापान और चीन से बडी संख्या में बौध्दों को आकर्षित करते है।

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पूर्व में कुम्भ के मौके पर गंगा स्नान में भागीदार बनने वालों की संख्या सदैव अनुमानो पर आधारित रहा है । इस वर्ष उत्ताराखंड सरकार ने भारतीय उपग्रह अनुसंधान संगठन से (इसरो ) सें अनुरोध किया था कि वे 14 अप्रैल 2010 बैसाखी जो कि कुम्भ का अंतिम बड़ा स्नान था, का सर्वे कर बताएं कि कितने तीर्थ यात्रियों ने हरिद्वार में डुबकी लगाई। इसरो ने उत्ताराखंड सरकार को सूचित किया है कि उनके सर्वेक्षण के मुताबिक यह संख्या अनुमानत: एक करोड़ छियासठ लाख रही है।

लाल कृष्ण आडवाणी
नयी दिल्ली

23 मई, 2010

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