एक महान शहीद को नमन!

June 28, 2012
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आज 23 जून है। यह वह तिथि है जिसे राष्ट्र को कभी नहीं भूलना चाहिए। ठीक 59 वर्ष पूर्व यानी 1953 में इसी दिन डा0 श्यामा प्रसाद मुकर्जी श्रीनगर में रहस्यमय परिस्थितियों में मृत पाए गए थे।

 

अक्तूबर, 1951 में डा0 मुकर्जी ने भारतीय जनसंघ की स्थापना की थी। वे इसके पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष निर्वाचित हुए।

 

syama-prasadसन् 1952 में निर्वाचन आयोग ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के पहले आम चुनाव सम्पन्न कराए। डा0 मुकर्जी कलकत्ता (अब कोलकाता) के एक क्षेत्र से पहली लोकसभा के लिए चुने गए।

 

दिसम्बर, 1952 में जनसंघ का पहला अखिल भारतीय अधिवेशन कानपुर में सम्पन्न हुआ। इसी अधिवेशन में डा0 मुकर्जी ने जम्मू और कश्मीर राज्य के भारत संघ में पूर्ण एकीकरण का आह्वान देश को किया। यह आह्वान एक प्रभावी नारे में यूं  शब्दबध्द किया गया था:

 

एक देश में दो विधान

दो प्रधान

दो निशान

 

नहीं चलेंगे

नहीं चलेंगे

 

कानपुर अधिवेशन इस एक संकल्प के साथ सम्पन्न हुआ: जम्मू और कश्मीर के भारत में पूर्ण एकीकरण के लिए देशव्यापी आंदोलन शुरू किया जाए।

 

आंदोलन से पूर्व जम्मू और कश्मीर के पूर्ण एकीकरण के मुद्दे पर डा0 मुकर्जी और प्रधानमंत्री के बीच पत्राचार भी हुआ था।

 

इससे पूर्व डा0 मुकर्जी इस मुद्दे पर देशव्यापी दौरा कर चुके थे। उनके इस दौरे में श्री अटल बिहारी वाजपेयी उनके साथ थे।

 

उन दिनों मैं राजस्थान के कोटा में था।

 

जब ये दोनों रेल गाड़ी से कोटा जंक्शन से गुजरे उस समय कोटा रेलवे स्टेशन पर इन दोनों महारथियों से हुई भेंट को मैं कभी नहीं भुला सकता।

 

जम्मू और कश्मीर सरकार ने यह आदेश जारी कर दिया था कि राज्य में आने वाले किसी भी व्यक्ति को तभी प्रवेश की अनुमति दी जाएगी जब उसने राज्य सरकार से परमिट लिया हो। डा0 मुकर्जी ने राज्य सरकार के इस आदेश को भारतीय संविधान की अवज्ञा के रूप में माना। इसलिए उन्होंने तय किया कि जिस आंदोलन का आव्हान उन्होंने किया है, वे प्रवेश परमिट आदेश की अवज्ञा कर, आगे रहकर उसका नेतृत्व करेंगे।

 

अपने गंतव्य कश्मीर पहुंचने के लिए डा0 मुकर्जी ने 8 मई, 1953 को अपने साथियों के साथ एक पैसेन्जर रेलगाड़ी से पंजाब की ओर कूच किया। समूचे पंजाब में उन्हें देखने को मानव समुद्र उमड़ पड़ा था।

 

उनका अंतिम पड़ाव रावी नदी के किनारे माधोपुर चेकपोस्ट था, जहां पंजाब की पांच महान नदियों में से एक रावी पंजाब और जम्मू-कश्मीर के बीच सीमा बनाती थी। इस राज्य में उनके प्रवेश का दिन था 10 मई, 1953। रावी के ऊपर एक सड़क पुल था। दो राज्यों के बीच सीमा माधोपुर पुल के बीचोंबीच वाले स्थान पर मानी जाती थी।

 

जब जीप डा0 मुकर्जी को पुल के मध्य बिन्दु पर लेकर पहुंची तो उन्होंने देखा कि जम्मू और कश्मीर पुलिस के दस्ते ने सड़क को घेर रखा है। कठुआ (जम्मू और कश्मीर) के पुलिस अधीक्षक ने डा0 मुकर्जी को राज्य के मुख्य सचिव के हस्ताक्षरों से युक्त एक आदेश थमाया जिसमें डा0 मुकर्जी राज्य में प्रवेश की मनाही दर्ज थी। डा0 मुकर्जी ने घोषणा की कि लेकिन मैं तो राज्य में प्रवेश करने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ हूं।

 

तत्पश्चात् पुलिस अधिकारी ने पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत उनकी गिरफ्तारी का आदेश निकाला और डा0 मुकर्जी को हिरासत में ले लिया। उस समूह में वैद्य गुरूदत्त और टेकचन्द – उनके दो सहयोगियों को डा0 मुकर्जी के बंदी बनाए जाने पर साथ में रहने का दायित्व सौंपा गया था – ये दोनों भी गिरफ्तार कर लिए गए।

 

तब डा. मुकर्जी ने अटलजी को कहा कि तुम वापस जाओ और देशवासियों को बताओ कि डा. मुकर्जी ने प्रतिबंध आदेशों की अवहेलना करते हुए जम्मू और कश्मीर में प्रवेश किया है और वह भी बगैर परमिट के भले ही एक बंदी के रुप में क्यों न हो

 

डा. मुकर्जी को श्रीनगर शहर से दूर निशात बाग के निकट एक छोटे से घर में नजरबंद किया गया। इस घर को एक उप-जेल में बदल दिया गया।

 

23 जून, 1953 को पूरा देश यह जानकर सन्न रह गया कि अपनी नजरबंदी के स्थान पर डा. मुकर्जी की तबियत खराब होने के फलस्वरुप उन्हें लगभग दस मील दूर स्थित अस्पताल में ले जाया गया, जहां उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली।

 

उस दिन मैं जयपुर में था। मुझे अच्छी तरह याद है कि 24 जून की तड़के सुबह लगभग 4.30 बजे चौड़ा रास्ता स्थित हमारे पार्टी कार्यालय के दरवाजे पर कोई (वह एक स्थानीय पत्रकार) जोरों से चिल्ला-चिल्ला कर कुछ कह रहा था, उससे मेरी नींद खुली और मैंने देखा कि वह चिल्लाते-रोते हुए कह रहा था आडवाणीजी, उन्होंने डा. मुकर्जी को मार दिया।

 

तथागत राय पश्चिम बंगाल के हमारे प्रमुख कार्यकर्ताओं में से एक हैं। एक समय वह पार्टी की राज्य इकाई के अध्यक्ष रह चुके हैं। उन्होंने हाल ही में डा. श्यामा प्रसाद मुकर्जी की एक पूर्ण जीवनगाथालिखी है। यह अगले महीने लोकार्पित होगी। भाजपा कें हम, आज भारत की राजनीति में जिस स्थान पर पहुंचे हैं वह हमारे पूर्ववर्ती हजारों कार्यकर्ताओं के त्याग और परिश्रम तथा उससे ऊपर डा. मुकर्जी के विज़न और बलिदान के चलते पहुंचे हैं।

 

हम अपने महान नेता के बारे में उनके अंतिम दिनों में ही ज्यादा जान पाए। तथागत ने शोध और आवश्यक परिश्रम कर इस महान राष्ट्र भक्त के जन्म से लेकर उनके जीवन के बारे में पाठकों को बताकर इतिहास और उन राष्ट्रवादी विचारों की उत्कृष्ट सेवा की है जिसको राजनीति में हम स्थापित करने में लगे हैं। तथागत राय का अभिवादन।

 

डा. श्यामा प्रसाद मुकर्जी की मां श्रीमती जोगमाया देवी के द्वारा

पं0 नेहरु को लिखे गये पत्र का मूल पाठ

 

77, आशुतोष मुखर्जी रोड, कलकत्ता

4 जुलाई 1953

प्रिय श्री नेहरु!

 

आपका 30 जून का पत्र मुझे 2 जुलाई को डा0 विधानचन्द्र राय द्वारा भेजा गया। शोक और सहानुभूति के आपके संदेश के लिए मैं आपका धन्यवाद करती हूं।

 

राष्ट्र मेरे प्रिय पुत्र की मृत्यु के शोक में है। वह एक शहीद की मौत मरा है। उसकी मां होने के नाते यह दु:ख इतना गहरा और गर्वीला है जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। यह पत्र मैं कोई सहानुभूति पाने के लिए नहीं लिख रही हूं। मेरा पुत्र नजरबंदी में मरा – एक ऐसी नजरबंदी जिसे बगैर मुकदमा चलाए की गयी।  अपने पत्र में तुमने यह आभास दिलाने की कोशिश की है कि कश्मीर सरकार ने वह सब किया जो उसे करना चाहिए था। आपकी बातें उन आश्वासनों ओर सूचनाओं पर आधारित हैं जो आपको प्राप्त हुई हैं। मैं पूछना चाहती हूं ऐसी सूचना की क्या अहमियत है जो ऐसे लोगों की तरफ से आई हैं जिन पर मुकदमा चलना चाहिए? आप कहते हैं, मेरे पुत्र की नजरबंदी के दौरान आप कश्मीर गए थे। आपने अपने उस प्रेम की दुहाई दी है जो उसके प्रति आप में है। लेकिन मुझे आश्चर्य है कि वहां उससे मिलने और उसके स्वास्थ्य तथा प्रबंधों के बारे में स्वयं संतुष्ट होने से आपको किसने रोका था?

 

उसकी मृत्यु रहस्यमयी परिस्थितियों में हुई है क्या यह आश्चर्यजनक और शोकपूर्ण नहीं कि उसकी नजरबंदी के बाद से मुझे यानी उसकी मां को कश्मीर सरकार की ओर से पहली सूचना यह मिली कि मेरा पुत्र इस संसार में नहीं रहा और वह भी उसकी मृत्यु के कम से कम दो घंटे बाद? और वह संदेश भी क्रूर ढंग से दिया गया! यहां तक कि मेरे पुत्र द्वारा भेजा गया टेलीग्राम कि उसे अस्पताल ले जाया जा रहा है, भी हमारे पास उसकी मृत्यु के दु:खद समाचार के बाद मिला। इसकी निश्चित सूचना मिली है कि नजरबंदी की शुरूआत से ही मेरे पुत्र का स्वास्थ्य अच्छा नहीं था। निश्चित रूप से वह कई बार बीमार रहा और कुछ न कुछ तकलीफ रही। ऐसे में, मैं क्यों नहीं पूछूं कश्मीर सरकार या तुम्हारी सरकार से क्यों नहीं जो भी जानकारी थी, वह मुझे और मेरे परिवार को दी गई?

 

jogmaya-debiयहां तक कि जब उसे अस्पताल ले जाया गया तब भी यह जानकारी तत्काल हमें या डा0 विधानचन्द्र राय को देने की आवश्यकता नहीं समझी गई। यह भी स्पष्ट है कि कश्मीर सरकार ने श्यामा प्रसाद के स्वास्थ्य के बारे में पूर्ववर्ती जानकारी लेने की जरूरत नहीं समझी और न ही जरूरत के अनुसार उपचार और योग्य इलाज की। उसके बार-बार अस्वस्थ होने को भी चेतावनी के रूप में नहीं लिया गया। नतीजा भयावह रूप में सामने है। मेरे पास यह सिध्द करने हेतु अकाटय प्रमाण स्वयं उसके शब्द हैं कि ”22 जून को मुझे ऐसा लगा कि मानों मैं मृत्यु की ओर बढ़ रहा हूं” – के बावजूद सरकार ने क्या किया? डॉक्टरी सहायता उपलब्ध कराने में अक्षम्य देरी, अस्पताल ले जाने में भी अमानवीय व्यवहार, उनके दो बंदी साथियों को अस्पताल में उनके साथ जाने की अनुमति न देने – ऐसे कुछ उदाहरण हैं जो सम्बन्धित प्राधिकरणों के निर्दर्यी व्यवहार को दर्शाते हैं।

 

सरकार ओर उसके डॉक्टरों की जिम्मेदारी, श्यामा प्रसाद के पत्रों में से अपनी मर्जी से चुनकर उदृत किए जाने वाले वाक्यों – कि वह ठीक हैं – से कम नहीं की जा सकती। ऐसे उद्दरणों की क्या कीमत है? क्या ऐसा सोचा जा सकता है कि नजरबंद कोई व्यक्ति  – दूर बैठे अपने आत्मीयजनों को अपने पत्रों के माध्यम से अपनी तखलीफें या अपनी शिकायत बताएगा? इस सम्बन्ध में सरकार की जिम्मेदारी ज्यादा और गंभीर थी।

 

मैं उन पर आरोप लगाती हूं कि वे अपना दायित्व निभाने में पूरी तरह असफल ओर लापरवाह रहे। आप श्यामा प्रसाद को नजरबंदी में उपलब्ध कराई गई सुविधाओं और सहूलियतों का जिक्र कर रहे हैं। इसकी जांच होनी चाहिए। कश्मीर सरकार ने परिवार के पत्रों के आदान-प्रदान को निर्बाध बनाए रखने की शिष्टता भी नहीं दिखाई। पत्रों को रोका गया, ओर कुछ को रहस्यपूर्ण ढंग से गायब कर दिया गया। विशेष रूप से उसकी बीमार पुत्री ओर मेरे बारे में जैसे घर के समाचारों के बारे में उसकी चिंता को उपेक्षित करना शर्मनाक था। तुम्हें यह जानकर आश्चर्य होगा कि उसके द्वारा 15 जून को लिखा गया पत्र पिछली 27 जून को हमें प्राप्त हुआ जोकि कश्मीर सरकार द्वारा 24 जून को एक पैकेट में भेजा गया उसके शव भेजने के एक दिन बाद? इस पैकेट में मेरे और अन्यों द्वारा श्यामा प्रसाद को भेजे गए पत्र जो 11 और 16 जून को श्रीनगर पहुंचे, भी प्राप्त हुए लेकिन इन्हें उन्हें नहीं दिया गया था। यह मानसिक अत्याचार का मामला था। वह लगातार टहलने के लिए स्थान की मांग कर रहा था। वह बीमार था और उसे टहलने की आवश्यकता थी। लेकिन इसके लिए भी उसे इंकार कर दिया गया। क्या यह शारीरिक प्रताड़ना का ही तरीका नहीं है? तुम्हारे द्वारा यह बताए जाने पर कि उन्हें जेल में नहीं अपितु श्रीनगर में प्रसिध्द डल झील के किनारे एक निजी बंगले में रखा गया है” – मुझे आश्चर्य और शर्म आ रही है। दिन-रात सशस्त्र पहरेदारों के पहरे में एक छोटे आंगन वाले एक छोटे से बंगले में कैद – ऐसा जीवन वह जी रहा था। क्या यह गंभीरता से माना जा सकता है कि एक सोने का पिंजरा एक कैदी को प्रसन्न रखेगा? मैं ऐसे हताशाभरे प्रचार को सुनकर कांप उठती हूं। मुझे नहीं पता कि किस प्रकार का डॉक्टरी उपचार और सहायता उसको उपलब्ध कराई गई। मुझे बताया गया है कि सरकारी रिपोटर्ें भी परस्पर विरोधी हैं। कई प्रसिध्द डॉक्टरों ने अपना मत प्रकट किया है कि कम से कम यह मामला विशुध्द लापरवाही का है। मामले की संपूर्ण और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

 

मुझे मेरे प्रिय पुत्र की मृत्यु का शोक नहीं है। स्वतंत्र भारत का एक निर्भीक पुत्र बगैर मुकदमे के नजरबंदी में अत्यन्त दु:खद और रहस्यमयी परिस्थितियों में मृत्यु को प्राप्त हुआ। मैं, उस दिवंगत की मां मांग करती हूं कि स्वतंत्र और निष्पक्ष व्यक्तियों द्वारा इसकी निष्पक्ष एवं खुली जांच बगैर विलम्ब के की जाए। मैं जानती हूं कि जो चला गया उसे किसी भी तरह से वापस नहीं लाया जा सकता। परन्तु मैं चाहती हूं कि भारत की जनता इस दु:खद त्रासदी के असली कारणों को स्वयं पहचाने जोकि एक स्वतंत्र देश में घटी है और तुम्हारी सरकार द्वारा इसमें क्या भूमिका निभायी गयी है।

 

यदि कहीं भी कुछ गलत हुआ है और किसी भी व्यक्ति – चाहे वह कितना भी बड़ा क्यों न हो – द्वारा किया गया है – तो न्याय को अपना काम करने की छूट होनी चाहिए और लोग सतर्क हो सकें ताकि स्वतंत्र भारत में फिर से किसी अन्य मां को मेरी तरह इस तरह के दु:ख और शोक के लिए आंसू न बहाने पड़े।

 

आपने अपने पत्र में यह सहृदयता दिखाई है कि मैं आपके योग्य कोई सेवा के लिए बगैर संकोच आपको कहूं। मेरी और भारत की माताओं की तरफ से यह मांग है कि परमात्मा तुम्हें इतना साहस दे कि तुम सत्य के प्रकाश को देख सको।

 

अपना पत्र समाप्त करने से पूर्व मैं एक अत्यन्त महत्वपूर्ण तथ्य की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहती हूं। श्यामा प्रसाद की निजी डायरी और उसके अन्य लेखों की पाण्डुलिपि कश्मीर सरकार द्वारा उसके अन्य सामान के साथ नहीं लौटाई गई है। बख्शी गुलाम मोहम्मद और मेरे बड़े पुत्र रामप्रसाद के बीच का पत्राचार संलग्न है। मैं आपकी अत्यन्त आभारी रहूंगी यदि आप वह डायरी और पाण्डुलिपियां कश्मीर सरकार से उपलब्ध करवा सकें। ये निश्चित ही उनके पास हैं।

 

आशीर्वाद सहित,

                                                                शोकमग्न

 

जोगमाया देवी

 

लालकृष्ण आडवाणी

नई दिल्ली

23 जून, 2012

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