कुरैशी का अभिनन्दन

April 1, 2012

झारखण्ड राज्य में इस वर्ष राज्यसभा के चुनावों को रद्द करने के लिए मुख्य निर्वाचन आयुक्त डा. एस.वाई. कुरैशी का अभिनन्दन।

 

cec-copyभारतीय चुनावों के इतिहास में यह पहली बार हुआ होगा कि किसी राज्य में राज्यसभा के चुनावों को चुनाव आयोग ने, वोटों की गिनती से पूर्व ही, मतदान को बीच में रोक दिया।

 

जिन आधारों पर आयोग ने यह निर्णय किया, वे निम्नलिखित हैं:

 

1-     संसद के तीन सदस्यों-गुरुदास गुप्ता, बाबूलाल मरांडी और शरद यादव-ने चुनाव आयोग को लिखित ज्ञापन देकर आशंका प्रकट की थी कि झारखण्ड के राज्यसभाई चुनावों में विधायकों के वोट धनशक्ति से खरीदने की कोशिश हो रही है।

 

2-    दो स्वतंत्र प्रत्याशियों के नाम, पंजीकृत राजनीतिक दलों के अनेक विधायकों द्वारा प्रस्तावित किए गए थे जबकि इन दलों के स्वयं के प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे।

 

3-    मतदान के दिन, 30 मार्च, 2012 की सुबह जिला पुलिस अधिकारियों ने एक इनोवा कार पकड़ी जिस पर शक था कि इसमें एक स्वतंत्र प्रत्याशी आर.के. अग्रवाल की तरफ से नकदी बांटने के हिसाब से अवैध धन रखा हुआ है। खोजबीन में कार में से 2.15 करोड़ रुपए नकद मिले। नकदी को सुधांशु त्रिपाठी ले जा रहा था जिसने बताया कि यह धन उन्हें आर.के. अग्रवाल के दामाद ने दिया था। वाहन का पंजीकरण आर.के. अग्रवाल के भाई सुरेश कुमार अग्रवाल के नाम पर था।

 

4-    चुनाव प्रक्रिया को रोकने संबंधी चुनाव आयोग के विस्तृत आदेश में बताया गया है कि जिस कार से बेहिसाब धन बरामद किया गया उसके पीछे दो और कारें चल रही थीं। माना जाता है कि उनमें भी पैसा रखा हुआ था, लेकिन पहले वाहन के पकड़े जाने पर ये दोनों वाहन वापस जमेशदपुर लौट गए।

 

स्वच्छ चुनावों के प्रति चिंतित रहने वालों को सदैव महसूस होता है कि बिना पर्याप्त स्पष्ट समर्थन के जो प्रभावशाली प्रत्याशी राज्यसभा में नामांकन भरते हैं, वे अपनी जीत के लिए येन-केन-प्रकारेण से विधायकों की खरीद-फरोक्त करते हैं।

 

hs-brahma-finalvs-sampath-finalसन् 2003 में एनडीए सरकार ने जन प्रतिनिधित्व कानून में संशोधन कर राज्यसभा के चुनावों में मतदान प्रक्रिया को खुला कर दिया था। इस संशोधन के चलते राजनीतिक दल से जुड़े प्रत्येक विधायक की बैलेट बॉक्स में मत डालने से पहले अपने मतदान पत्र को अपनी पार्टी के अधिकृत प्रतिनिधि को दिखाना आवश्यक कर दिया गया था।

 

 

इस संशोधन को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई। कुलदीप नैय्यर बनाम भारत संघ एवं अन्य मामले में मानीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा:

 

मत की गोपनीयता स्वतंत्र और स्वच्छ चुनावों की आश्वस्ति का एक महत्वपूर्ण सिध्दान्त है। हालांकि इससे उच्च सिध्दांत है चुनावों की स्वतंत्रता और स्वच्छता तथा चुनावों की पवित्रता। यदि गोपनीयता भ्रष्टाचार का स्त्रोत बनती है तो सूर्य की रोशनी और पारदर्शिता में इसे मिटाने की क्षमता है। हम इतना कह सकते हैं कि पारदर्शिता, इस विद्यमान बुराई को मिटा सकती है और आशा है कि स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों के महती उद्देश्यों को पूरा करने में सफल होगी।

 

मैं समझता हूं कि चुनाव आयोग द्वारा जारी किए गए इसके आदेश के लिए उसे विशेष बधाई दी जानी चाहिए। यद्यपि कुछ समाचारों ने इस आदेश को चुनाव रद्द (काऊंटरमंड) करने के रुप में परिभाषित किया है। आयोग द्वारा जारी आदेश में कहीं भी रद्दशब्द का उल्लेख नहीं है। रद्दकरने का अर्थ होता है किसी पूर्व निर्णय या आदेश को पुनर्जीवित करना। लेकिन जब चुनाव प्रक्रिया पूरी ही नहीं हुई हो और अभी तक कोई परिण्ााम नहीं आया हो तो नतीजा कैसे पुनर्जीवित किया जा सकता है?

 

चुनाव आयोग के निर्णय के मुख्य पैराग्राफ निम्न है:

 

स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों को कराने तथा चुनावों की पवित्रता को बनाए रखने के संवैधानिक और कानूनी पक्ष के दायित्व से परिपूर्ण आयोग द्वारा वर्तमान केस के सभी प्रासंगिक तथ्यों और परिस्थियों को ध्यान में रखते हुए आयोग इससे संतुष्ट है कि झारखण्ड में राज्यसभा की वर्तमान चुनाव प्रक्रिया गंभीर रुप से दूषित हो गई है और इसे चालू रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

 

तद्नुसार, आयोग संविधान के अनुच्छेद 324 के साथ जनरल क्ॅलाजेज एक्ट, 1897 के भाग 21 और इसके पास उपलब्ध अन्य सभी शक्तियों के आधार पर सम्मानीय राष्ट्रपति से सिफारिश करता है कि वे 12 मार्च, 2012 को जारी अधिसूचना क्रमांक 318/1/2012(1) को जिसके तहत झारखण्ड विधानसभा द्वारा राज्यसभा के लिए दो सदस्यों का चुनाव होना था, को रोकें।

 

12 पृष्ठीय इस आदेश पर तीनों निर्वाचन आयुक्तों-मुख्य निर्वाचन आयुक्त डा. एस.वाई. कुरैशी, वी.एस. सम्पत और एच.एस. ब्रह्मा के हस्ताक्षर है।

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इस चुनाव में मतदान पूर्ण हो चुका था। सिर्फ मतों की गणना और परिणाम घोषित करना शेष था। यदि यह प्रक्रिया पूर्ण हो गई होती, तो नतीजों को केवल चुनावी याचिका के माध्यम से ही चुनौती दी जा सकती थी। मामला निर्वाचन आयोग के क्षेत्राधिकार से बाहर निकलकर न्यायपालिका के क्षेत्र में चला जाता है!

 

और चूंकि प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई थी तथा 2.15 करोड़ रुपए लेकर जाने वाली कार पकड़ी गई थी, इसलिए चुनाव आयोग ने इन शब्दों में अपना आदेश दर्ज किया:

 

संविधान में चुनाव आयोग को अनुच्छेद 324 के तहत एक स्वतंत्र संवैधानिक प्राधिकार माना गया है जिसका काम संसद और राज्य विधायिकाओं के चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष ढंग से कराने होते हैं जहां चुनावों की पवित्रता को उच्चतम प्राथमिकता दी गई है। मोहिंदर सिंह गिल बनाम मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य (AIR 1978 SL 851) केस में मान्य सर्वोच्च न्यायालय ने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने पर महत्वपूर्ण जोर दिया है और माना है कि संविधान का अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग को स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव कराने हेतु शक्तियों का स्त्रोत है और जहां यह‘ (कानून) नहीं है, और स्थिति से निपटना हो, तो मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हाथ जोड़कर भगवान से दिव्य प्रेरणा प्राप्त कर अपना दायित्व निभाने की शक्ति नहीं मांगनी है या अपना काम करने के लिए किसी बाहरी शक्ति की ओर, स्थिति से निपटने हेतु शक्ति के लिए नहीं ताकना है।

 

मैं मानता हूं कि निर्वाचन आयोग का आज का निर्णय पर्याप्त विश्वसनीय आशंकाओं पर आधारित एक महत्वपूर्ण निर्णय है। सन् 2003 के एनडीए के संशोधन और आज के निर्णय-इन दोनों के चलते बगैर राजनीतिक समर्थन के धन कुबेरों को इस मैदान में कूदने से पहले हजारों बार सोचने पर बाध्य करेंगे।

 

टेलपीस (पश्च्यलेख)

 

सूचना एवं प्रसारण मंत्री के रूप में मुझे बीबीसी द्वारा प्रसारित एक सीरियल की पाण्डुलिपि देखने का अवसर मिला जो सदियों से ब्रिटिश संसद के कामकाज पर आधारित था।

 

इस पाण्डुलिपि में, अठारहवीं शताब्दी में ब्रिटेन में घटित एक उल्लेखनीय घटना के बारे में पढ़ने को मिला।

 

हाउस ऑफ कॉमन्स के एक सदस्य को उसके एक मतदाता का पत्र मिला जिसमें उसने बजट में कुछ एक्साइज़ प्रावधानों के विरूध्द वोट डालने को कहा था। बीबीसी कार्यक्रम के अनुसार, सांसद ने अपने मतदाता को जो तीखा जवाब भेजा, वह कुछ यूं था:

 

श्रीमान्, एक्साइज़ के सम्बन्ध में आपका पत्र मुझे प्राप्त हुआ, और आपके द्वारा यह पत्र लिखने के दु:साहस को देखकर मुझे आश्चर्य हुआ।

 

आप जानते हैं और मैं जानता हूं कि मैने इस निर्वाचन क्षेत्र को खरीदा है।

आप जानते हैं और मैं जानता हूं कि अब मैंने इसे बेचने का दृढ़ निश्चय कर लिया है।

और तुम्हें क्या लगता है कि मुझे पता नहीं कि आप किसी दूसरे खरीददार को तलाश रहे हो।

और मुझे पता है कि निश्चित रूप से तुम्हें यह मालूम नहीं कि मैंने दूसरा निर्वाचन क्षेत्र खरीदने हेतु खोज लिया है।

 

ब्रिटेन में संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों को खरीदा और बेचा जाना तब कोई अपवाद नहीं था। यह नियम था, अक्सर निर्वाचन क्षेत्रों की सार्वजनिक रूप से नीलामी होती थी – और कभी पूरी तरह बेचा जाता या वार्षिक आधार पर लीज़ पर दिया जाता था। स्टर्थन गोरडॉन द्वारा लिखित एक संसदीय प्रकाशन, अवर पार्लियामेंट में बताया गया है:

 

”1812 और 1832 के बीच संसदीय सीट को खरीदनेकी साधारण कीमत 5000 से 6000 पौण्ड पर एक वर्ष के लिए किराएपर उपलब्ध थी

 

लेकिन आज, ब्रिटेन में चुनाव कुल मिला कर साफ-सुथरे हैं। ब्रिटेन में चुनाव सुधारों का इतिहास-भारत में फैली इस सामान्य मानसिकता कि चुनावों में बढ़ती धनशक्ति के प्रभाव का कोई सही इलाज नहीं है या जिस प्रकार हमारे कम्युनिस्ट मित्र कहते हैं कि एक बुर्जुआ लोकतंत्रमें यह तो अपरिहार्य है – से निपटने में सहायक हो सकता है।

 

लालकृष्ण आडवाणी

नई दिल्ली

1 अप्रैल, 2012

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