क्या आपातकाल वापस लौट आया है?

April 25, 2010
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‘आऊटलुक’ (3 मई, 2010) पत्रिका के ताजा अंक में एक चौंकाने वाली रिपोर्ट प्रकाशित हुई कि कैसे भारत सरकार नवीनतम फोन टेप तकनीक का प्रयोग करते हुए प्रमुख राजनीतिक नेताओं के टेलीफोन र्वात्तालाप का रिकार्ड तैयार कर रही है। इन नेताओं में बिहार के नीतिश कुमार जैसे मुख्यमंत्रियों, शरद पवार जैसे केंद्रीय मंत्रियों, प्रकाश करात जैसे कम्युनिस्ट नेताओं और कांग्रेस पार्टी के महासचिव दिग्विजय सिंह जैसे पदाधिकारी उल्लेखनीय हैं।

इसने मुझे 25 वर्ष पूर्व हुई एक दिलचस्प मुलाकात का स्मरण करा दिया। 1985 में एक सुबह, एक अजनबी कागजों से भरा ब्रीफकेस लेकर मेरे घर आया। उसने मुझे बताया कि इस ब्रीफकेस में ‘बारुद’ भरा है जो इस सरकार को उड़ा सकता है। उसने अपना ब्रीफकेस खोला और उसमें से लगभग 200 पृष्ठ निकाले जिन पर अनेक महत्वपूर्ण व्यक्तियों के टेलीफोन वार्तालाप का रिकार्ड टाइप किया हुआ था।

मैंने उन दस्तावेजों को जांचा। मैंने पाया कि यह ऐसा ‘विस्फोटक’ नहीं था जैसाकि वह सज्जन बता रहे थे। उनमें से कुछ दस्तावेजों में मेरे और श्री अटल बिहारी वाजपेयी के बीच हुई टेलीफोन वार्ता के रिकार्ड थे। मुझे सबसे ज्यादा आश्चर्य इस पर हुआ कि उन रिकार्डों में न केवल विपक्षी नेताओं के टेलीफोन र्वात्तालाप लिपिबध्द थे अपितु कुछ प्रमुख पत्रकारों और ज्ञानी जैल सिंह जैसे अति सम्मानित महत्वपूर्ण व्यक्ति के वार्तालाप भी शामिल थे।

25 जून, 1985 संयोगवश आपातकाल की दसवीं वर्षगांठ थी। उस दिन एक संवाददाता सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए श्री वाजपेयी ने न केवल आपातकाल की अन्य ज्यादतियों का स्मरण कराया अपितु उन उन्नीस महीनों में व्यापक पैमाने पर हुई फोन टेपिंग का उल्लेख करते हुए प्रेस को बताया:

”मुझे काफी पहले से पता है कि मेरा और मेरे पार्टी सहयोगी आडवाणी के फोन निगरानी सूची में है। लेकिन बाद में मुझे जानकारी मिली कि अनेक वरिष्ठ नेताओं जैसे चौधरी चरण सिंह, जगजीवन राम और चन्द्रशेखर तथा जी.के. रेड्डी, अरुण शौरी, कुलदीप नैय्यर और जी.एस. चावला जैसे पत्रकारों के फोन भी नियमित रुप से टेप किए जा रहे हैं। लेकिन जिससे मैं भौचक्का रह गया वह है इंटेलिजेंस ब्यूरो द्वारा राष्ट्रपति और मुख्य न्यायाधीश के फोन टेप करने का दुस्साहस। यह सब न केवल राजनीतिक रुप से अनैतिक है अपितु असंवैधानिक और गैर-कानूनी भी है।”

1996 में जब श्री देवेगौड़ा प्रधानमंत्री थे तब कांग्रेस का एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमण्डल पूर्व गृह मंत्री शंकर राव चव्हाण के नेतृत्व में उनसे मिला और शिकायत की कि श्री पी.वी. नरसिम्हा राव और अनेक वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं के फोन उत्तर प्रदेश सरकार टेप करा रही है। प्रधानमंत्री ने इन कांग्रेसजनों को बताया कि उनकी शिकायत आधारहीन है। इसके साथ-साथ श्री देवेगौड़ा ने स्वयं बाद में घोषित किया कि सी.बी.आई. को इस मामले की जांच करने को कहा गया है।

1988 में एक प्रमुख फोन टेप कांड ने कर्नाटक में तूफान ला दिया। द टाइम्स ऑफ इंडिया ने डी.आई.जी. (इंटेलीजेंस) के उस आदेश की प्रति प्रकाशित कर दी जिसमें उन राजनीतिक हस्तियों और कुछ संस्थाओं के नाम का उल्लेख था, जिनके टेलीफोन टेप किए जाने वाली सूची में शामिल थे।

उस समय मैं राज्यसभा का सदस्य था और मुझे याद है कि केंद्रीय गृह मंत्री बूटा सिंह ने कर्नाटक सरकार की तीखी निंदा की और दोहराया था कि केंद्र हेगड़े सरकार की भांति किसी राजनीतिज्ञ या पत्रकार का फोन टेप नहीं करा रहा। उनके इस वक्तव्य ने मुझे बोलने को बाध्य किया कि: ”मैं नहीं कह सकता कि आज क्या हुआ है। लेकिन मुझे व्यक्तिगत जानकारी है कि कम से कम 1985 तक आपकी सरकार मेरा टेलीफोन और अनेक अन्य राजनीतिज्ञों और पत्रकारों के फोन टेप करा रही थी।”

दुनिया के अनेक लोकतंत्रों में फोन टेपिंग की वैधानिकता और सीमाएं सतत् बहस का विषय रही है। संयुक्त राज्य अमेरिका में यह विषय वाटरगेट कांड के दिनों तीखे विवाद का बिन्दु बना था। क्रुध्द जनमत और महाभियोग के डर ने रिचर्ड निक्सन को राष्ट्रपति पद से बाहर कर दिया। उनके उत्तराधिकारी गेराल्ड फोर्ड ने उन्हें पूर्ण माफी दे दी। लेकिन तीन वर्ष बाद डेविड फ्रॉस्ट से टेलीविज़न साक्षात्कार में निक्सन (19 मई, 1977) ने सनसनीखेज वक्तव्य दे दिया। उन्होंने माना कि सेंधमारी और अन्य अपराध गैर-कानूनी नहीं हैं बशर्ते कि राष्ट्रपति द्वारा आदेशित हों!

1977 में राष्ट्रपति कार्टर ने कांग्रेस को एक ऐसी योजना को स्वीकृति देने को कहा जिसमें बगैर न्यायपालिका के अनुमोदन के कार्यपालिका द्वारा नागरिकों की निजता (प्राइवेसी) में किसी भी तरह की घुसपैठ असंभव बना दी जाए। कार्टर ने माना कि यह योजना राष्ट्रीय सुरक्षा और एक नागरिक के निजता के मूलभूत अधिकार के बीच के ”अन्तर्निहित संघर्ष” का सफलतापूर्वक समाधान कर देगी। तदन्तर, कानून बनाया गया जिसके तहत एफबीआई सहित सभी सुरक्षा प्राधिकरणों को किसी भी फोन टेप करने से पहले न्यायिक सहमति लेना अनिवार्य होगा।

ब्रिटेन में, टेलिफोन टेपिंग को नियमित करने हेतु कोई कानून नहीं है। परन्तु अनेक संसदीय समितियां इस प्रश्न की गहराई तक गई हैं। 1957 में नॉरमन ब्रिकेट (Norman Brikett) के नेतृत्व में प्रिवी काऊंसिलरों की तीन सदस्यीय समिति गठित की गई जिसे ”इंटर सेप्शन ऑफ कम्युनिकेशन्स” की जांच करनी थी।

ब्रिकेट समिति ने फोन टेपिंग या निजी संवादों में किसी भी प्रकार या रुप में बाधा को ”अन्तर्निहित आपत्तिजनक” निरुपित किया, लेकिन महसूस किया कि इसे निश्चित स्पष्ट तौर पर परिभाषित क्षेत्रों में अनुमति दी जा सकती है मगर वह भी पर्याप्त सुरक्षा उपायों के साथ। इसने सिफारिश की कि फोन टेपिंग की अनुमति पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को सिर्फ अपराधों की जांच या षडयंत्रों या गुप्तचर गतिविधियों के लिए दी जा सकती है। लेकिन इस क्षेत्र के लिए भी समिति ने कठोर मार्गदर्शी सिध्दान्त तय किए। तब से लेकर आज तक, ब्रिटेन में किसी ने अपनी सरकार पर यह आरोप नहीं लगाया कि वह इन शक्तियों का दुरुपयोग कर रही है।

इस सन्दर्भ में, वास्तव में आवश्कता हैं ब्रिकेट समिति की तरह एक संसदीय समिति गठित करने की, जो समस्या के सभी पहलुओं की जांच करे, पुराने पड़ गये इण्डियन टेलीग्राफ एक्ट 1885 को समाप्त कर और उसके स्थान पर एक नये कानून लाने की, जो एक साधारण नागरिक की निजता में अतिक्रमण को समाप्त करे, लेकिन जो औपचारिक रुप से राज्य के अधिकार को मान्यता दे कि वह टेप करने के नवीनतम आई0टी0 उपकरणों का उपयोग सिर्फ अपराध, षडयंत्र और जासूसी से निपटने में कर सके। कानून अवश्य ही ऐसे संवैधानिक सुरक्षात्मक उपबंध उपलब्ध कराए जो राजनीतिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों के विरुध्द इन शक्तियों के दुरुपयोग को असंभव बना दे।

लाल कृष्ण आडवाणी
नयी दिल्ली

अप्रैल 25, 2010

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