क्या यह वाशिंगटन का दबाव है?

February 15, 2010
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सन् 2008 में राष्ट्रपति पद के चुनाव अभियान के दौरान बराक ओबामा ने टिप्पणी की थी कि यदि वे राष्ट्रपति चुन लिए जाते हैं तो ”कश्मीर संकट के समाधान के लिए पाकिस्तान और भारत के साथ मिलकर गंभीरता से कार्य करना” उनके प्रशासन के महत्वपूर्ण कार्यों में से होगा। ‘टाइम’ पत्रिका के जे केलिन से बातचीत में, ओबामा ने विस्तार से इसे यूं कहा:

“कश्मीर में इन दिनों जैसी दिलचस्प स्थिति है उसमें इस मसले को कब्र से निकालकर हल करने की एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती है। इसके लिए एक विशेष दूत नियुक्त करना, आंकड़ेबाजी के बजाय सही मायने में प्रयास और खास तौर पर भारतीयों को यह समझाना और इसके लिए तैयार करना होगा कि आज जब आप एक आर्थिक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर हैं तब इस मसले को हल कर इससे क्यों नहीं मुक्त हो जाते\ इसी तरह पाकिस्तानियों को यह समझाना होगा कि भारत आज कहां है और आप कहां हैं। आपके लिए कश्मीर मसले पर फंसे रहने से ज्यादा जरूरी है अफगान सीमा की बड़ी चुनौतियों से जूझना। मैं जानता हूं कि यह सब करना और इसमें कामयाब होना इतना आसान नहीं होगा, मगर मुझे उम्मीद है कि यह हो जाएगा।”

गत् सप्ताह नई दिल्ली की इस अचानक घोषणा कि भारत, पाकिस्तान से विदेश सचिव स्तर की वार्ता के लिए तैयार है-से देश के अनेक राजनीतिक विश्लेषकों द्वारा स्वाभाविक रुप से यह पूछा जा रहा है कि : क्या यह ओबामा के उपरोक्त दावे को अमल में लाने का नतीजा है?

लोग सीधे और साफ तौर पर यह पूछ रहे हैं कि मुंबई पर 26/11 हमले के बाद भारत पाकिस्तान से तब तक वार्ता शुरु करने से इंकार करता रहा है जब तक इस्लामाबाद मुंबई हमले के अपराधियों को पकड़कर उन्हें दण्डित नहीं करता तथा उसकी भूमि से संचालित हो रहे आतंकवादी समूहों पर कड़ी कार्रवाई नहीं करता : तो वार्ता के मुद्दे पर उलटबाजी करना क्या वाशिंगटन का शक्तिशाली दबाव नहीं है?

इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि पिछले शुक्रवार को ही पाकिस्तानी प्रधानमंत्री युसूफ रजा गिलानी ने पाक अधिकृत कश्मीर में शेखी बघारी कि अंतराष्ट्रीय दबाव ने भारत को वार्ता की मेज पर आने को बाध्य किया है!

नई दिल्ली में बैठी कोई भी सरकार 22 फरवरी 1994 को लोकसभा द्वारा जम्मू कश्मीर पर पारित सर्वसम्मत प्रस्ताव को अनदेखा नहीं कर सकती।

जिस समय पाकिस्तान, भारत -पाक वार्ता के मुद्दे पर यूपीए सरकार के एकदम बदले हुए रुख पर प्रसन्न होता दिख रहा है, तब यह स्मरण करना महत्वपूर्ण होगा कि यह संसदीय संकल्प कितना स्पष्ट और साफ है।

”यह सभा (लोक सभा) भारत में अशान्ति, वैमनस्य और विध्वंस पैदा करने के स्पष्ट उदेश्य से पाकिस्तान तथा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में स्थित शिविरों में आतंकवादियों को प्रशिक्षण देने, हथियार और धन उपलब्ध कराने, जम्मू और कश्मीर में भाड़े के विदेशी सैनिकों सहित प्रशिक्षित जंगजुओं की घुसपैठ में सहायता देने में पाकिस्तान की भूमिका पर गहरी चिंता व्यक्त करती है;

इस बात को दोहराती है कि पाकिस्तान में प्रशिक्षित जंगजू लोगों की हत्या, लूटपाट तथा अन्य घृणित अपराध कर रहे हैं। पाकिस्तान द्वारा भारत के राज्य जम्मू और कश्मीर में विध्वंसक और आतंकवादी गतिविधियों के निरन्तर समर्थन और प्रोत्साहन की कड़ी निंदा करती है ;

पाकिस्तान से आतंकवाद को अपना समर्थन देना तत्काल बंद करने कर मांग करती है क्योंकि यह शिमला समझौते तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत अन्तर्राज्यीय आचरण के प्रतिमानों का उल्लघन है और दोनो देशों के बीच तनाव की जड़ है,

इस बात को दोहराती है कि भारतीय राजनीतिक और लोकतांत्रिक व्यवस्था तथा संविधान समस्त नागरिकों के मानवाधिकारों के संवर्धन एवं संरक्षण की पक्की गांरटी देते हैं,

पाकिस्तान के भारत -विरोधी मिथ्या और झूठे प्रचार अभियान को अस्वीकार्य एवं निंदनीय मानती है ; पाकिस्तान से उद्भूत होने वाले अत्यन्त भड़काने वाले बयानों पर चिंता व्यक्त करती है और पाकिस्तान से अनुरोध करती है कि वह ऐसे बयानों से बाज आये जिनसे वातावरण दूषित होता है और जनता उत्तेजित हो ।

भारत के राज्य जम्मू और कश्मीर के पाकिस्तान के अवैध कब्जे के अधीन की जनता की दयनीय परिस्थितियों और मानवाधिकार हनन और उनके लोकतांत्रिक अधिकारों से उन्हें वंचित रखने पर खेद और चिन्ता व्यक्त करती है।

यह सभा भारत की जनता की ओर से यह दृढ़ घोषणा करती है –
”जम्मू और कश्मीर राज्य भारत का अविभाज्य अंग रहा है और रहेगा तथा उसे शेष भारत से अलग करने के किसी भी प्रयास को सभी आवश्यक साधनों से विरोध किया जायेगा।

भारत की एकता, प्रभुसत्ता और क्षेत्रीय अखंडता के विरूध्द हर तरह के षड़यंत्रों का प्रतिरोध की इच्छा शक्ति और क्षमता भारत में है; और मांग करती है कि-

पाकिस्तान को भारत के राज्य जम्मू और कश्मीर के सभी क्षेत्र खाली कर देने चाहिये जिन्हें उसने अतिक्रमण कर हथिया लिया है।

भारत के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप करने के किसी भी प्रयास का डट कर मुकाबला किया जायेगा।”

यह सर्वाधिक उचित होगा कि सरकार, देश एवं दुनिया इस प्रस्ताव को ध्यान में रखें।

लालकृष्ण आडवाणी
फरवरी 08, 2010

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