गांधीनगर में महात्मा मन्दिर

May 2, 2010

अहमदाबाद का सरदार पटेल स्टेडियम एक विशाल स्टेडियम है। वास्तव में 54000 सीटों की क्षमता वाला यह गुजरात का सर्वाधिक बड़ा स्टेडियम है। यहां मैं पिछली बार दिसम्बर, 2007 में विधानसभा चुनावों में भाजपा की शानदार विजय के बाद श्री नरेन्द्र मोदी और उनके मंत्रिमंडल के शपथ समारोह कार्यक्रम में आया था।

इसलिए, 1 मई को गुजरात राज्य के स्वर्ण जयंती समारोह के अवसर पर जब मैं स्टेडियम स्थित समारोह स्थल पहुंचा तो यह जानकर आश्चर्यचकित रह गया कि न केवल स्टेडियम खचाखच भरा है अपितु स्टेडियम के बाहर काफी लोग हैं जो अंदर आना चाहते हैं।

अहमदाबाद के ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ ने मुख पृष्ठ पर प्रकाशित रिपोर्ट में लिखा है।

”उस पीढ़ी के लिए जो यह जानते हुए जवान हुई कि उनका गृह प्रदेश गुजरात, देश के पश्चिम तट पर स्थित व्यापार प्रमुख राज्य है, के लिए शनिवार का स्वर्णिम शो आंख खोल देने वाला है। एक शानदार भव्य मल्टीमीडिया शो जो अतिशबाजी से शुरु हुआ, प्रागैतिहासिक काल से गुजरात की कहानी-सिध्दराज जयसिंह युग, सुल्तान अहमद शाह, संजन में पारसियों का आगमन और 1960 में बाम्बे स्टेट से पृथक होकर एक नये राज्य के रुप में उदय-को यहां खचाखच भरे सरदार पटेल स्टेडियम में दर्शाया गया, बाहर एक विशाल भीड़ जिसमें नौकरशाह, राजनीतिज्ञ और अन्य अति विशिष्ट व्यक्ति थे, समारोह में सहभागी होने के लिए संघर्ष कर रहे थे जिन्हें सुरक्षाकर्मियों ने वापस भेज दिया क्योंकि स्टेडियम अपनी क्षमता से ज्यादा भरा हुआ था।”

तत्पश्चात् जो घटा वह इससे पूर्व कहीं भी नहीं घटा होगा। उपस्थित जन सैलाब से माफी मांगते हुए मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने घोषणा की कि डेढ़ घंटे का संगीत नृत्य कम लेजर शो 2 मई को उनके लिए पुन: दिखाया जाएगा जो आज कार्यक्रम में भाग नहीं ले सकें हैं!

पिछले साठ वर्षों में मैंने बहुत से सरकारी नेताओं को विभिन्न घटनाओं अथवा संस्थाओं की रजत जयंतियां या स्वर्ण जयंतियां मनाते देखा है। लेकिन नरेन्द्र भाई ने गुजरात में जो किया वह अद्वितीय है। स्वर्णिम गुजरात समारोह केवल सरकारी कार्यक्रम मात्र नहीं था। अपनी कल्पनाशीलता और अभिनव पहलों और अपनी करिश्माई अपील तथा कड़ी मेहनत से उन्होंने इसे व्यापक लोक समारोह बना दिया।

उदाहरण के लिए जयनाद, जिसमें राज्यपाल, मुख्यमंत्री और मैंने 30 अप्रैल को सायं 7:30 बजे प्रवासी भारतीयों और एन आर जी (भारत के अन्य राज्यों से) के यूनिवर्सिटी कार्यक्रम में भाग लिया, ठीक उसी समय गुजरात के सभी शहरों, कस्बों के लगभग 50,000 स्थानों और 18000 गांवों में ऐसे कार्यक्रम सम्पन्न हुए।

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पिछला सप्ताहंत (30 अप्रैल, 1 और 2 मई) मैंने अपने निर्वाचन क्षेत्र गांधीनगर में बिताया। इन दिनों पूरा प्रदेश उत्सव मनाने में लगा था क्योंकि यह राज्य स्थापना का स्वर्ण जयंती वर्ष है।

इस क्षेत्र का प्रतिनिधि होने के नाते मुझे प्रसन्नता हुई कि राज्य सरकार ने इस अवसर पर गांधीनगर को नगर निगम घोषित किया। मुख्यमंत्री नरेन्द्र भाई ने इसे स्वर्णिम उपहार की संज्ञा दी। इस उपहार से क्षेत्र को स्वत: ही केन्द्र सरकार की जवाहर लाल नेहरु अर्बन रिन्यूबल मिशन फण्ड से राशि प्राप्त हो सकेगी। यद्यपि इस बार की यात्रा में मुझे ज्यादा खुशी गांधीनगर में एक नए प्रोजेक्ट- महात्मा मंदिर की शुरुआत से हुई।

135 करोड़ रुपए की अनुमानित लागत से बनने वाला महात्मा मंदिर 34 एकड़ से ज्यादा भूमि में फैला होगा। एक विश्वस्तरीय कन्वेंशन सेंटर के अलावा मंदिर को महात्मा के जीवन और दर्शन के स्मारक या कीर्ति स्तंभ के रुप में विकसित किया जाएगा। वायब्रेंट गुजरात का आगामी वैश्विक सम्मेलन इसी नवनिर्मित कन्वेंशन सेंटर में होना प्रस्तावित है।

दर्शकों को गांधीजी के दाण्डी मार्च का स्मरण कराने के लिए एक गुम्बद को नमक के ढेर के रुप में एक संग्रहालय और मीडिएशन सेंटर बनाया जाएगा, इस परियोजना की पूरी योजना ग्रीष्म कंस्ट्रेक्शन तकनीक के अनुसार होगी।

मंदिर के उद्धाटन समारोह में मुख्य मंच के समीप विशेष रुप से सजाए गए अनेक कलश रखे गए थे। जिनमें दुनिया के पचास देशों से ज्यादा जहां प्रवासी भारतीय रहते हैं, एवं भारत के सभी राज्यों से यहां भाग लेने आए गुजरातियों द्वारा लाए गई मिट्टी और जल थे। इस मंदिर के निर्माण में दुनिया के विभिन्न हिस्सों की मिट्टी और जल के उपयोग ने मुझे 1951 में डा0 कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी का स्मरण करा दिया जिन्होंने सोमनाथ मंदिर के निर्माण में इसी तरह की दृष्टि अपनाई थी, जिसके लिए प्रधानमंत्री नेहरू ने उनकी कटु आलोचना भी की थी।

डा0 मुंशी ने एक मंत्रिमण्डल बैठक में अपनी इस निंदा पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने प्रधानमंत्री को एक लम्बा पत्र लिखा जिसमें उन्होंने इस पर जोर दिया कि सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण मंत्रिमण्डल का फैसला था। सरदार पटेल ने तब महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और गांधीजी ने इस निर्णय को आशीर्वाद दिया।

डा0 मुंशी ने लिखा: ”कल आपने हिंदू नवजागरणवाद का उल्लेख किया था। मंत्रिमंडल में आपने मेरे सोमनाथ से जुड़ाव पर उंगली उठाई। मुझे खुशी है कि आपने ऐसा किया, क्योंकि मैं अपने किसी भी विचार या कार्य को अप्रकट नहीं रखना चाहता हूं।….मैं आपको विश्वास दिला सकता हूं कि भारत का समस्त जनमानस आज भारत सरकार द्वारा प्रायोजित सोमनाथ के पुनरूध्दार की योजना से बहुत प्रसन्न है। इतनी प्रसन्नता उसे अब तक हमारे द्वारा किए या किए जा रहे किसी भी कार्य से नहीं मिली है।”

उन्होंने आगे जोड़ा: ‘भविष्य को ध्यान में रखकर वर्तमान में कार्य करने की शक्ति मुझे अतीत के प्रति अपने विश्वास से ही मिली है। भारत की स्वतंत्रता अगर हमें ‘भगवद्गीता’ से दूर करती है या हमारे करोड़ों लोगों के इस विश्वास या श्रध्दा को तोड़ती है, जो हमारे मंदिरों के प्रति उनके मन में है और हमारे समाज के ताने-बाने को तोड़ती है तो ऐसी स्वतंत्रता का मेरे लिए कोई मूल्य नहीं है। सोमनाथ मंदिर के पुनरूध्दार से हमारे देशवासियों की धार्मिक अवधारणा अपेक्षाकृत और शुध्द होगी तथा इससे अपनी शक्ति के प्रति उनकी सजगता और भी बढ़ेगी, जो स्वतंत्रता के इन कठिनाई भरे दिनों में बहुत आवश्यक है।’

यह पत्र पढ़कर जाने-माने प्रशासनिक अधिकारी, वी.पी. मेनन– जिन्होंने देशी रियासतों के एकीकरण में सरदार पटेल की भरपूर मदद की थी, ने मुंशी को एक लघु सन्देश भेजा – ‘मैंने आपके अद्भुत पत्र को देखा है। जो बातें आपने पत्र में लिखी हैं, उनके लिए मैं तो जीने, और आवश्यकता पड़ने पर मरने के लिए भी तैयार हूं।”

लाल कृष्ण आडवाणी
नयी दिल्ली

२ मई, २०१०

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