गुजरात में होगी दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति

October 31, 2010
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आज सरदार पटेल जयंती है। वास्तव में यह हमारे देश के लिए देवीय आशीर्वाद था कि स्वतंत्रता के समय एक राज नेता और सरकार के सदस्य के रुप में वल्ल्भभाई पटेल जैसा महामानव हमारे पास था।

 

अगस्त 1947 चुनौती भरा महीना था। एक ओर सदियों की दासता से मुक्त होकर भारत माता स्वतंत्र हुई थी लेकिन यह खुशी खूनी विभाजन की त्रासदी से ग्रसित हो गई और लाखों लोगों को अपने परिवारों और घरों से विस्थापित होना पड़ा।

 

सरदार पटेल ने पण्डित नेहरु के मंत्रिमण्डल में अगस्त, 1947 में उप-प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के रुप में दायित्व संभाला। लेकिन उनका कुशल और निपुण नेतृत्व देश  को साढे तीन वर्षों से भी कम समय मिला। दिसम्बर, 1950 में उनका निधन हो गया। परन्तु फिर भी जितना काम वह निपटा सके वह अपने आप में अद्भुत था। जैसाकि सरदार पटेल के घनिष्ठ सहयोगी वी.पी. मेनन ने अपनी पुस्तक इण्टीगरेशन ऑफ द इण्डियन स्टेट में लिखा है:

 

”(भारत), अपनी सीमांओं के भीतर 554 देशी रियासतों की अनसुलझी सर्वाधिक बड़ी समस्या का सामना कर रहा था। ब्रिटिश सरकार ने घोषित कर दिया था कि उनके जाने के बाद ये राज्य स्वतंत्र हो जाएंगे। सर्वत्र यह आशंका थी कि क्या देश इसी के चलते टुकड़ों में बट जाएगा।   

 

वी.पी. मेनन की जिस पुस्तक से उपरोक्त अनुच्छेद उद्दृत किया गया है उसी में  लेखक पर एक विस्तृत आलेख वी.पी.मेनन: एन अपरिसिएशनशीर्षक से समाहित हैं। यह प्रसिध्द पत्रकार एम.वी. कामथ द्वारा लिखा गया है। इसमें वह लिखते हैं :

           

ध्यान रखना चाहिए कि ब्रिटिश के अंतर्गत भी भारत एक एकक राजनीतिक ईकाई नहीं था। देश दो विभिन्न भागों में विभक्त था: एक ब्रिटिश भारत; दूसरा रजवाड़ों का भारत; यद्यपि यह अंग्रजों को सर्वोच्च अधिकार समपन्न शक्ति मानता था।

 

राजकुमार अपनी गद्दी अधिकार के रुप में वसीयत में नहीं अपितु इस महत्वपूर्ण शक्ति से तोहफे के रुप में पाते थे।

 

यह सर्वोच्च अधिकार सम्पन्नता तब समाप्त होने वाली थी जब ब्रिटिश भारत छोड़ने वाले थे। उस मोड़  पर वह ऐतिहासिक समय था जब पहली बार भारत को एक छाते के नीचे पूरी तरह एक करने, पूर्णतया और र्निविवाद रुप से प्रयास किए गए। जिस व्यक्ति ने यह कार्य किया वह सरदार वल्ल्भभाई पटेल थे।

 

इस महान आत्मा की स्मृति में गुजरात ने 392 फीट उंची एकता की मूर्ति(Statue of Unity) स्थापित करने कर निर्णय लिया है जोकि पूरी दुनिया में और न्यूयार्क की स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी से भी विशालतम होगी।

Sardar Vallabhabhai Patel 

इस समय गुजरात अपनी स्थापना की 50वीं जयंती मना रहा है। एकता की मूर्तिको स्वर्णिम गुजरात के इस वर्ष में ही स्थापित किया जाएगा। इसके स्थान का चयन मुख्यमंत्री नरेन्द्रभाई मोदी ने नर्मदा बांध से करीब 3.2 किलोमीटर दूर साधुबेट में किया है।

 

गुजरात में नरेन्द्रभाई के नेतृत्व का एक विशिष्ट गुण है उनकी कल्पनाशीलता। गत् सप्ताह गुजरात के सभी सांसदों और विधायकों ने मुख्यमंत्री आवास पर वांचे गुजरात अभियानशीर्षक वाला स्लाइड शो देखा। यह स्वर्णिम गुजरात के लिए राज्य सरकार के अभिनव कार्यक्रम की नयी अभिव्यक्ति है।

 

अभियान का उद्देश्य इससे नागरिकों में पढ़ने की आदत डालना और इस ज्ञान की सदी की जरुरत के लिए उन्हें अच्छे ढंग से तैयार करना है।

 

इस आंदोलन का विस्तार  पुस्तक जो मुझे पसंद है‘, सर्वोतम पाठक प्रतियोगिता, पुस्तक मार्च (ग्रंथ यात्रा) इत्यादि पर चर्चाओं के माध्यम से किया जा रहा है। यह कार्यक्रम स्कूल और कॉलेजों में संचालित किए जाएंगे। राज्य के 26 जिलों और 8 नगर निगमो में समितियों का गठन कर दिया गया है जिसमें शिक्षकों, प्राध्यापकों, लेखकों और अन्य विद्वानों को सदस्य बनने के लिए आमंत्रित किया जा रहा है। 30-40 सदस्यों वाली एक समिति है जिसमें स्कूल प्रधानाचार्य, कॉलेज प्रधानाचार्य, सचिवों और प्रसिध्द लेखकों इत्यादि को शामिल किया गया है। मुख्यमंत्री इसके प्रमुख हैं और उप-प्रमुख शिक्षा मंत्री। इस पहल को आगे बढ़ाने के लिए वर्तमान में 54 स्वयंसेवी संस्थाएं गुजरात सरकार के भागीदार बने हैं।  

 

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तैरती पुस्तकके नाम से एक नये विचार की पहल की गई है। लोगों से एक पुस्तक खरीदने, उसे पढ़ने और उस पर अपना नाम लिखकर दूसरों को आगे देने के लिए कहा गया है। जैसे ही पुस्तक 12 व्यक्तियों द्वारा पढ़ ली जाएगी तो उसे पुस्तकालय को दे दिया जाएगा जो इसे तैरती पुस्तकके रुप में वर्णित करेंगे। इसके शुरु होने से लेकर अभी तक करीब 50000 तैरती पुस्तकें (Floating Books) दान कर दी गई है।

 

नए सामुदायिक पुस्तकालय स्थापित किए गए हैं। इस अभियान के हिस्से के रुप में पुराने और बन्द पड़े पुस्तकालयों को पुनर्जीवित किया गया है और वर्तमान पुस्तकालयों को मजबूत बनाया जा रहा है। संभवतया पहली बार स्कूलों में विद्यार्थियों को इस दीवाली के अवकाश के दौरान पुस्तक लेने की अनुमति दी जाएगी। अधिक से अधिक नागरिकों को अपने घरों में ग्रंथ मंदिर (पुस्तकालय) विकसित करने को प्रोत्साहित किया गया है।

 

लालकृष्ण आडवाणी

नई दिल्ली

31 अक्टूबर, 2010

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