चुनाव अभियान : पर्चे (हैंडबिल) से लेकर इंटरनेट तक

February 26, 2009

मित्रो, मेरे ब्लॉग में आपका स्वागत है। मेरे युवा सहयोगियों ने जिन्होंने इस वेबसाइट को तैयार किया है, मुझसे कहा कि राजनीतिक पोर्टल बगैर ब्लॉग के उसी प्रकार है जिस प्रकार बगैर हस्ताक्षर के पत्र होता है। मैंने उनके इस अकाटय तर्क को तुरन्त स्वीकार कर लिया।

इंटरनेट का उपयोग राजनीतिक संवाद के मंच के रूप में और खासकर, चुनाव प्रचार के लिए प्रयोग किए जाने के विचार से मैं काफी उत्साहित हूं। मुझे सन् 1952 के प्रथम आम चुनाव से लेकर आज तक हर चुनाव में प्रत्याशी या प्रचारक के तौर पर शामिल होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। इस दौरान मैंने संवाद के तौर-तरीकों को विकसित होते देखा है। जहां तक संवाद का सम्बन्ध है, मैं प्रौद्योगिकी (टेक्नालॉजी) का हिमायती हूं। मैं सीधे तौर पर यह मानता हूं कि कोई भी चीज जो काम की है, उसका स्वागत किया जाना चाहिए। मैंने छह दशक के अपने लम्बे राजनीतिक जीवन में सभी प्रकार की नयी संवाद टेक्नोलॉजी को अपनाया है-कैसियो की डिजीटल डायरी से लेकर आई-पॉड और आई फोन तक।

पहले आम चुनाव में, जब मैं 25 वर्ष का था, मैंने भारतीय जनसंघ के लिए राजस्थान में एक राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में प्रचार किया था। जनसंघ की स्थापना डा0 श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा उससे एक वर्ष पहले की गई थी। उस समय सामान्य सी पर्ची का छापना भी एक नई बात थी। मैं एक रोचक घटना का जिक्र करना चाहूंगा। मेरी पार्टी ने मुझे कोटपुतली में प्रचार-प्रसार के प्रबंधन की जिम्मेदारी सौंपी थी। उस क्षेत्र की समस्याओं का अध्ययन करने के बाद मैंने कुछ साहित्य तैयार किया। यह वर्णन करते हुए कि यदि हमारी पार्टी के प्रत्याशी चुनाव जीत गए तो वे उन समस्याओं का किस तरह से समाधान करेंगे। मैं राजस्थान के लिए पार्टी के घोषणा-पत्र की प्रतियां भी लाया था।

मैं चुनाव से करीब महीने भर पहले क्षेत्र में पहुंच गया था और वहां तब तक रहने का प्रण लिया था जब तक चुनाव समाप्त नहीं हो जाए। जब मैं चुनाव से जुड़ी पुस्तिकाएं जो जयपुर से लाया था, को उतार रहा था तो हमारा प्रत्याशी दूर खड़े होकर मुझे आश्चर्य से देख रहा था। हालांकि, मैं उनसे आधी उम्र का था-लेकिन उन्होंने मुझे आदर से आडवाणी जी सम्बोधित करते हुए पूछा – क्या आप मुझे और मेरे कार्यकर्ताओं से इन पुस्तिकाओं को क्षेत्र में बंटवाना चाहते हैं? लेकिन इसकी जरूरत कहां है? यह घोषणा-पत्र और पुस्तिकाएं हमारी चुनाव रणनीति के लिए पूरी तरह बेकार है। हम लोगों को अपना काफी समय और ऊर्जा, दोनों इन्हें वितरित करने में लगाना होगा। फिर भी, अगर आप कहेंगे तो हम लोग इसे करेंगे। लेकिन इससे हमें एक भी अतिरिक्त वोट की बढ़ोतरी नहीं होगी।

उन्होंने आगे कहा – आडवाणीजी, मैं आपको एक बात बता दूं कि इस चुनाव में मुझे कोई भी नहीं हरा पाएगा। यह गुर्जर बाहुल्य क्षेत्र है और मैं अकेला गुर्जर इस चुनाव में खड़ा हूं। उसके आगे के वाक्य ने मेरी आंखें खोल दीं और भारत में चुनाव की वास्तविकता सामने ला दी। उन्होंने कहा,”सबसे पहले, हर गुर्जर जो चुनाव बूथ पर वोट डालने जाएगा, वह मुझे ही वोट देगा क्योंकि मैं गुर्जर समुदाय का अकेला प्रत्याशी हूं। दूसरी बात यह है कि अधिकांश गैर-गुर्जर भी मुझे ही वोट देंगे क्योंकि वे जानते हैं कि इस चुनाव क्षेत्र में मेरी जीत की अधिक संभावना है। वे अपने वोट हारने वाले प्रत्याशी को देकर बर्बाद नहीं करेंगे।

वर्षों तक अधिकतर सन् 1980 के दशक के अंत तक, समाचार-पत्र, पत्रिकाएं और आकाशवाणी ही राजनीतिक संवाद तथा प्रचार का अकेला माध्यम हुआ करती थी। तब तक प्रिंट मीडिया सरकारी स्वामित्व में नहीं थे। वे स्वतंत्र थे और समाचारों और विचारों के लिए वे गैर-कांग्रेसी पार्टियों पर निर्भर हुआ करते थे। हालांकि, रेडियो पर पूरी तरह से सरकार का नियंत्रण था और कांग्रेस निर्लज्जतापूर्वक अपने प्रचार (प्रोपेगेंडा) के लिए इसका इस्तेमाल करती थी। मुझे याद है कि किस प्रकार 1982 में आन्ध्रप्रदेश के विधानसभा चुनावों में पूरे अभियान के दौरान ऑल इंडिया रेडियो पर श्री एन.टी.रामाराव का एक बार भी नाम नहीं लिया गया जबकि उन्होंने भारी बहुमत से चुनावों में जीत हासिल की थी। पहली बार आकाशवाणी पर उनके नाम का प्रसारण तब हुआ जब राज्यपाल ने उन्हें शपथ लेने हेतु आमंत्रित किया था।

श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा लगाये गये आपातकाल के समाप्त होने के बाद बनी जनता पार्टी की सरकार (1977-79) में सूचना एवं प्रसारण मंत्री बनने के बाद, मेरे ऊपर न केवल उस आधारभूत संरचना को समाप्त करने की बल्कि उस मनोवृति को भी खत्म करने की मुख्य जिम्मेदारी थी जिसे सत्तासीन पार्टी अपने हित के लिए इस्तेमाल करती थी। मेरा एक निर्णय जिस पर मुझे गर्व है और जिसका काफी स्वागत किया गया था, वह यह है कि 1952 से लेकर अब तक पहली बार विपक्षी पार्टियों को विधानसभा और लोकसभा चुनावों की पूर्व संध्या पर जनता के समक्ष अपने संदेश को प्रसारित करने का समय आबंटित किया गया।

इंटरनेट की कई आकर्षक खूबियां हैं। लेकिन उन सब में सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इस पर न तो सरकार का स्वामित्व है और न ही किन्हीं प्राइवेट लोगों का। यह सबके लिए खुला मंच है और अब तक संवाद के लिए खोजे गए माध्यमों में सबसे अधिक लोकतांत्रिक माध्यम है। इंटरनेट पर राजनीतिक संवाद पर सेंसरशीप लगाना असंभव और सोच से परे है – कम्युनिस्ट और तानाशाही व्यवस्था को छोड़कर।

सन् 1952 से भारत में चुनाव हो रहे हैं और तब से हम लोग एक लम्बा समय तय कर चुके हैं। मतदाता अकेले और सामूहिक तौर पर, दोनों तरह से अधिक परिपक्व हो चुका है। वोट की शक्ति के बारे में लोकतांत्रिक जागरूकता और चेतना कई गुना बढ़ चुकी है। अब कोई भी राजनीतिक पार्टी और प्रत्याशी उन्हें अपनी जेब में पड़ा नहीं मान सकते हैं। मतदाता वर्तमान सरकार को उनके कार्य-निष्पादन पर तोलते हैं, वहीं विपक्षी/प्रतिद्वंध्दी पार्टी को उसके स्टैंड और अपनी अपेक्षाओं पर खरे उतरने की क्षमताओं से परखता है। दूसरे शब्दों में, चुनावी प्रचार काफी महत्वपूर्ण होता है। खासकर उन दिनों की अपेक्षा जब मुझे राजस्थान में कोटपुतली से खड़े हमारे उम्मीदवार ने मुझे मुद्रित चुनावी साहित्य का इस्तेमाल करने की मनाही कर दी थी।

पुरानी प्रिटिंग प्रेस जहां जिस टाइप का प्रयोग किया जाता था, में परचे छापने का प्रचलन अब लगभग खत्म हो चुका है। आज मैं इंटरनेट पर ब्लॉग लिख रहा हूं। चुनावी प्रचार के लिए इस टेक्नालॉजी का इस्तेमाल करने का मेरा यह लम्बा सफर रहा है।

मेरे पहले ब्लॉग को पढ़ने में आपने अपना जो बहुमूल्य समय लगाया, उसके लिए धन्यवाद। मैं वादा करता हूं कि मैं शीघ्र ही लौटूंगा। तब तक के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएं।

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