चौदहवां राष्ट्रपतीय चुनाव

June 27, 2012

अगले महीने देश की वर्तमान राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटिल का कार्यकाल पूरा होगा और एक नए राष्ट्रपति शपथ ग्रहण करेंगे। निर्वाचन आयोग द्वारा घोषित चुनाव कार्यक्रम के मुताबिक इस सर्वोच्च पद के लिए 19 जुलाई बृहस्पतिवार को मतदान होगा। यह स्वतंत्र भारत का चौदहवां राष्ट्रपतीय चुनाव है।

 

संविधान सभा ने सन् 1950 में संविधान को औपचारिक रूप से अंगीकृत किया था। संसद और राज्य विधानसभाओं का पहला आम चुनाव 1952 में सम्पन्न हुआ था। पहला राष्ट्रपति चुनाव भी उसी वर्ष हुआ।

 

उसके बाद के बारह चुनाव-1957, 1962, 1967, 1969, 1974, 1977, 1982, 1987, 1992, 1997, 2002 और 2007 में सम्पन्न हुए।

 

विभिन्न चुनावों में निर्वाचित हुए राष्ट्रपति निम्न थे:

dr-rajendra s-radhakrishnan zakir-hussain v-v-giri

 

fakhruddi-ahmad neelam-sanjiva-reddy gyani-zail-singh r-venkatraman

 

shankar-dayal-sharma kr-narayanan apj-abdul-kalam pratibha-patil

 

sangmaआजकल राजनीतिक क्षेत्रों में यह प्रश्न पूछना फैशन सा हो गया है कि क्या इस उच्च संवैधानिक पद के लिए सरकार और विपक्ष के बीच सहमति के आधार पर सर्वसम्मति से चुनाव नहीं हो सकता था? यह प्रश्न भाजपा से ज्यादा पूछा जाता है जैसे मानों दो प्रमुख मुख्यमंत्रियों द्वारा समर्थित श्री संगमा के समर्थन का निर्णय करके हमने कुछ अनुचित सा कर दिया है। मैं मानता हूं कि इस प्रश्न का उत्तर पूरी तरह से सत्तारूढ़ दल के व्यवहार पर निर्भर है।

 

pranab-mukherjeeसोनियाजी द्वारा श्री प्रणव मुखर्जी के नाम की घोषणा करने के कुछ ही मिनटों में प्रधानमंत्री ने मुझे फोन कर बताया कि यूपीए के प्रत्याशी प्रणव होंगे और उन्होंने उनके लिए समर्थन मांगा। मेरी टिप्पणी थी: अब आप हमें सूचित कर रहे हैं। क्या यह अच्छा नहीं होता कि घोषणा करने से पहले आपने विपक्ष से भी सलाह-मशविरा कर लिया होता?” उनका उत्तर था: ठीक है, पर अभी भी इतनी देर नहीं हुई है।

 

इसके कुछ ही देर में मुझे एक और फोन आया: यह प्रणव दा की तरफ से था। उन्होंने मुझे बताया कि उनको प्रत्याशी बनाया गया है। लेकिन उन्होंने समर्थन नहीं मांगा। उन्होंने केवल स्मरण दिलाया कि कैसे 1970 से हम दोनों संसद में हैं और हम दोनों के बीच परस्पर आदर और स्नेह के सम्बन्ध बने हुए हैं। उन्होंने कहा आप शायद भूल गए होंगे लेकिन मुझे अच्छी तरह याद है कि एक दिन जब मैं राज्य सभा से निकला तो आपने आग्रह किया कि हम दोनों सेंट्रल हॉल में इकट्ठे दोपहर का भोजन करेंगे।मुझे अच्छी तरह याद है कि न केवल उस दिन हमारा संवाद गर्मजोशी और स्नेह से भरा था अपितु इन वर्षों में भी रहा है।

 

सभी की जानकारी के लिए यह तथ्य बताना जरूरी है कि अब तक हुए 13 चुनावों में से एकमात्र 1977 ही ऐसा था, जो आपातकाल के दर्दनाक अनुभवों के बाद हुआ था, में जनता पार्टी (सत्तारूढ़) दल के प्रत्याशी श्री नीलम संजीव रेड्डी निर्विरोध निर्वाचित हुए थे! अन्य सभी मौकों पर चुनाव हुए – उस समय भी जब सत्तारूढ़ दल के प्रत्याशी डा. राजेन्द्र प्रसाद, डा.राधाकृष्णन या डा. जाकिर हुसैन जैसे कद्दावर और प्रमुख हस्तियां थीं।

 

भारत के संविधान के अनुसार राष्ट्रपति का चुनाव संसद के दोनों सदनों के सदस्यों और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों (दिल्ली और पुड्डुचेरी जैसी संघ शासित विधानसभाओं सहित) के निर्वाचक मंडल द्वारा किया जाता है।

 

विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधित्व में समानता लाने और उसे व्यवहारिक बनाए रखने के लिए संविधान में एक विशेष प्रक्रिया बनाई गई है। इस प्रक्रिया के परिणामानुसार एक सांसद के वोट की कीमत 708 जबकि विधायकों के वोट की कीमत राज्यानुसार अलग-अलग यानी सिक्किम जैसे प्रदेश में 7 और उत्तर प्रदेश में 208 होती है।

 

आजादी के बाद के अनेक दशकों से इस निर्वाचक मंडल में कांग्रेस पार्टी का वोट शेयर इतना ज्यादा रहा है कि मैं मानता हूं कि इसलिए उन्होंने कभी विपक्ष से सलाह-मश्विरा करने की नहीं सोची।

 

इसकी तुलना में सन् 2002 में जब एनडीए ने डा0 कलाम को राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बनाने का विचार किया तब श्री वाजपेयी ने सोनियाजी और मुलायम सिंह से बात कर उन्हें एनडीए प्रत्याशी के समर्थन हेतु तैयार किया। हालांकि उस समय वाम मोर्चे ने हमारे प्रत्याशी के विरूध्द श्रीमती लक्ष्मी सहगल को खड़ा किया। श्रीमती सहगल को डा0 कलाम को मिले नौ लाख से ज्यादा मतों के मुकाबले लगभग एक लाख मत प्राप्त हुए।

 

अब तक के हुए तेरह राष्ट्रपतीय चुनावों में से मैं 1969 के चुनावों को सर्वथा अलग मानता हूं।

 

1969 में कांग्रेस पार्टी के संसदीय बोर्ड ने निर्णय किया कि पार्टी की तरफ से राष्ट्रपति श्री नीलम संजीव रेड्डी प्रत्याशी होंगे। लेकिन मैं इसे इतिहास का सबसे विषम चुनाव मानता हूं क्योंकि कांग्रेस अध्यक्ष और प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने अंतरात्मा की आवाज पर वोटदेने का आह्वान कर कांग्रेस के प्रत्याशी श्री रेड्डी के विरूध्द एक स्वतंत्र प्रत्याशी श्री वी.वी. गिरी को खड़ा कर दिया था।

 

यही वह चुनाव था जिसको समाजवादी पार्टी की प्रथम पंक्ति के प्रवक्ता श्री रामगोपाल यादव ने उस समय याद दिलाया जब ममताजी के साथ मिलकर उनकी पार्टी के नेता श्री मुलायम सिंह ने देश के राष्ट्रपति के लिए डा0 मनमोहन सिंह का नाम सुझाया था, जिस पर उन पर अनैतिक व्यवहारका आरोप लगाया गया था। यूपीए सरकार के एक केबिनेट मंत्री ने इस बारे में मुलायम सिंह पर सवाल उठाते हुए इस प्रस्ताव को अनैतिकठहराया। इस पर रामगोपाल ने गुस्से भरी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जिस पार्टी ने 1969 में अपने अधिकृत प्रत्याशी को हराने का काम किया हो उसे हमें नैतिकता का पाठ पढ़ाने का कोई अधिकार नहीं है।

 

टेलपीस:

जब श्रीमती गांधी ने अंतरात्मा की आवाज पर वोट देने का आव्हान किया था तब मैंने ब्रिटिश संसदीय इतिहास, जहां अंतरात्मा की आवाज पर वोट विधायी प्रक्रिया का एक स्वीकृत अंग है, से शब्दावली लेकर जो टिप्पणी की थी, उसका मुझे स्मरण आता हैं मैंने कहा था कि एकवचन में अंतरात्मा की आवाज पर वोट सद्गुण है लेकिन बहुवचन में यह एक षड़यंत्र है्!

 

लालकृष्ण आडवाणी

नई दिल्ली

25 जून, 2012