नाना चुडासमा : मुंबई के पहले ट्वीटर

June 22, 2010

पिछले कुछ दर्शकों में मैं अनेक पुस्तक लोकार्पण कार्यक्रमों में गया हूं। लेकिन गत् सप्ताह मुंबई में हुआ कार्यक्रम सचमुच में अद्भुत था।

पुस्तक की विषय वस्तु अनोखी थी और उसी तरह वह व्यक्ति भी जिसने इस पुस्तक को जन्म दिया।

मैं नाना चुडासमा को सत्तर के दशक के प्रारम्भ से तब से जानता हूं जब मेरे मित्र और गुजरात में पार्टी के सहयोगी स्वर्गीय मकरन्द देसाई ने उनसे मेरा परिचय कराया था। तब से अक्सर अनेक बार हम मिले और परस्पर सम्मान हमको एक-दूसरे से बांधे रखे हुए है। विश्वविद्यालय का कन्वोकेशन हॉल उस दिन खचाखच भरा था। हॉल इतना भरा था कि उस शाम मेरे साथ गई मेरी बेटी प्रतिभा को करीब आधे घंटे तक खड़ा ही रहना पड़ा।
The Book cover
पुस्तक का शीर्षक है ‘हिस्ट्री ऑन ए बैनर’। सुप्रसिध्द लेखिका शोभा डे ने टिप्पणी की मुंबई के आम आदमी की आशाओं और कुण्ठाओं को ठीक से अभिव्यक्त करने वाले सिर्फ दो महत्वपूर्ण स्वर रहे हैं- आर.के. लक्ष्मण और नाना चुडासमा। आर.के. लक्ष्मण अपने कार्टूनों के लिए प्रसिध्द हुए। नाना अपने बैनरों के कारण।

तीन दशक से अधिक समय-समय पर मुंबई जाने वाले मेरे जैसे के लिए मरीन ड्राइव पर घूमना उतना ही आकर्षक रहा है जितना ताजा स्थिति पर वहां लगे नाना के नवीनतम बैनर।

मुझे वह दिन सदैव स्मरण रहता है जब बाबा साहेब भौंसले को ए.आर. अंतुले के उत्तराधिकारी के रूप में महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनाया गया। राजधानी के राजनीतिक क्षेत्रों में सभी पूछ रहे थे: ”भौंसले कौन हैं?” अगले दिन मैंने नाना का बैनर देखा जिस पर लिखा था ”कम्प्यूटर ने वर्णमाला के अनुसार मुख्यमंत्री चुना: ए.आर. अंतुले, बाबा साहेब भौंसले”. ( Computer selects C.M. alphabetically : A.R. Antulay, Babasaheb Bhosale: )

नाना की पुस्तक का लोकार्पण 17 जून को हुआ। कार्यक्रम में उपस्थित लोगों को नाना चुडासमा के फोटो और पुस्तक के शीर्षक : ”हिस्ट्री ऑन ए बैनर” वाला निमंत्रण पत्र मात्र एक या दो सप्ताह पूर्व मिला होगा। लेकिन मैं यह नहीं भूल सकता कि नाना की पत्नी मुनीरा एक वर्ष से ज्यादा पहले मुझसे मिली थीं और उन्होंने अपनी यह योजना बताई कि मरीन ड्राइव पर नाना द्वारा लगाए गए बैनरों के सभी चुटीली और बुध्दिमत्तापूर्ण टिप्पणियों को एकत्र करके पुस्तक प्रकाशित करने तैयारी है। मुनीरा ने कहा था कि जब भी पुस्तक तैयार हो जाएगी, हमारा परिवार चाहेगा कि मैं ही इसे लोकार्पित करुं।

विश्वविद्यालय सभागार में आए लोग केवल पुस्तक के लिए ही नहीं आए थे बल्कि नाना का 77वां जन्मदिवस मनाने भी आए थे।

पुस्तक की प्रस्तावना में, एम.जे. अकबर ने स्टालिन के प्रसिध्द प्रश्न का स्मरण किया है: ”पोप के पास कितनी बटालियनें हैं?” अकबर लिखते हैं धार्मिक (नैतिक) नेता शस्त्रागार में हथियारों की गिनती नहीं करते। ”वे अपने मूल्यों और चुनौतियों को, अपने दृढ़ विश्वास के शक्तियुक्त अधिकारों से तौलते हैं।”

वस्तुत: नाना इसी कारण से सभी के सम्मान के पात्र हैं।

उस दिन उपस्थित विशिष्ट श्रोताओं को सम्बोधित करते हुए मैंने कहा कि जून का महीना सदैव मुझे जून 1975 की याद दिला देता है। और मैं इस मत का हूं कि लोकतंत्रप्रेमियों को भी यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि पैंतीस वर्ष पूर्व जून में क्या हुआ था। यहां तक कि ब्रिटिश शासन में भी सरकार के विरोधियों और प्रेस को ऐसे कठोर दमन का सामना नहीं करना पड़ा था। एक लाख से ज्यादा लोगों को जेलों में बंदी बना दिया गया था।

इस दिन नाना के बेजोड़ विनोदी स्वभाव और कार्टूनिस्ट आर.के. लक्ष्मण के संदर्भ ने मुझे स्मरण कराया कि आपातकाल में न केवल सत्ता विरोधी पत्र-पत्रिकाएं बंद होने को बाध्य हुईं अपितु देश के एकमात्र कार्टून साप्ताहिक को भी प्रकाशन बंद करना पड़ा।

शंकर्स वीकली [Shanker’s weekly] के अंतिम सम्पादकीय का शीर्षक था ”फेयरवेल” (अलविदा)। अपने इस लेख में शंकर ने आपातस्थिति का नाम तक नहीं लिया। लेकिन आपातस्थिति की इससे ज्यादा कटु निंदा और नहीं हो सकती थी। वहां श्रोताओं के लिए मैंने इसे उध्दृत किया :

“हमारे पहले सम्पादकीय में हमने रेखांकित किया था कि हमारा काम हमारे पाठकों को हंसाना होगा – दुनिया पर, आडम्बरपूर्ण नेताओं, कपटपूर्ण आचरण, कमजोरियों और अपने पर। पर ऐसे हास्य को समझने वाले और विनोदी स्वभाव रखने वाले लोग कैसे होते है ? ये ऐसे लोग हैं जो व्यवहार में निश्चित सभ्यता व लोकाचार रखते हैं तथा जहां सहिष्णुता और दयालुपन का भाव होता है। अधिनायकवाद हंसी को नहीं बर्दाश्त करता क्योंकि लोग तानाशाह पर हसेंगे और वह नहीं चलेगा। हिटलर के सभी वर्षों में, कभी प्रहसन नहीं बना, कोई अच्छा कार्टून नहीं था, न ही पैरोडी थी या मजाकिया नकल भी नहीं थी।

इस दृष्टि से, दुनिया और दु:खद रुप से भारत असंवेदनशील, गंभीर और असहनशील होता जा रहा है। हास्य जब भी हो तो संपुटित होता है। भाषा अपने आप में काम करने लगती है, प्रत्येक व्यवसाय अपनी शब्दावली विकसित कर रहा है। अर्थशास्त्री बंधुओं के समाज से बाहर एक अर्थशास्त्री अजनबी है, अनजाने क्षेत्र में हिचकिचाकर बोल रहा है, अपने बारे में अनिश्चित, गैर-आर्थिक भाषा से भयभीत है। यही वकीलों, डाक्टरों, अध्यापकों, पत्रकारों और उनके जैसों का हाल है।

इससे ज्यादा खराब यह है कि मानवीय कल्पना वीभत्स और विकृत में परिवर्तित होती प्रतीत होती है। पुस्तकें और फिल्में या तो हिंसा या सेक्स के भटकाव पर हैं। अनचाही घटनाओं और कृत्यों से लगने वाले झटके के बिना लोग जागरूक होते नहीं दिखते। लिखित शब्दों और समाज पर सिनेमा का अर्न्तसंवाद हो या न हो, समाज इन प्रवृत्तियों को अभिव्यक्त करता है। लूट-मार, अपहरण आदि अपराध नित्य हो रहे हैं और राजनीतिक कलेवर चढ़ा कर इन्हें सामाजिक स्वीकार्यता भी दी जा रही है।”

***

मुकेश अंबानी ने नाना को शहर का मूल ट्वीटर कहकर नवाजा। आपातकाल में उनके कुछ ट्वीट्स यूं थे:

22 सितम्बर, 1975

1975 वाज वूमैनस इयर
बट आल इर्य्स आर हर्स

14 मार्च, 1976

न्यू पैक ऑफ कार्डस
वन क्वीन
फ्यू जैक्स
रेस्ट ब्लैंक

21 मार्च, 1977

व्हेन मिसेज ‘I’
बीकेम आल ‘I’
पीपुल सेड गुड-बाई

लाल कृष्ण आडवाणी
नयी दिल्ली

२२ जून, २०१०

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