निर्वाचन आयोग के चयन में विपक्ष को भी सहभागी बनाया जाए

March 6, 2011

इस देश में आखिर हो क्या रहा है(What the hell is going on in this country) यह उत्तेजित टिप्पणी गत् सप्ताह सर्वोच्च न्यायालय ने की जिसमें कथित कालेधन के अपराधी हसन अली खान जैसों के विरुध्द कानूनी कार्रवाई करने में सरकारी गंभीरता के अभाव के प्रति उसकी नाराजगी झलकती थी। सर्वोच्च न्यायालय राम जेठमलानी, सुभाष कश्यप और केपीएस गिल द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था।

 

न्यायमूर्ति बी. सुदर्शन रेड्डी और एस. एस. निज्झर की पीठ ने सरकार को चेतावनी दी कि यदि वह इस मामले को कर चोरी का मामला मानकर और विदेशों में रखे अवैध धन के स्त्रोत का पता लगाने में असफल रही तो उसे कालेधन सम्बंधी जांचों की मॉनिटरिंग करने को बाध्य होना पड़ेगा।

 

पीठ ने सोलिसीटर जनरल सुब्रमण्यम से आगे पूछा कि जांच के लिए हसन अली की क्यों नहीं हिरासत में लिया गया और क्या सरकार न्यायालय की देखरेख में, हिरासत में पूछताछ करना चाहेगी।

supreme-court 

हो क्या रहा है(What the hell!) ऐसा वाक्य सर्वोच्च न्यायालय की पीठ से सामान्य रुप से अपेक्षित नहीं है। लेकिन इन दिनों सरकार का व्यवहार ऐसा असामान्य है कि यदि आप देश के किसी भी भाग में चले जाएं और वंहा सुनी जाने वाली भाषा को सुने तो यह सरकार के कामकाज पर अत्यंत हताशा के सिवाय कुछ नहीं है। मीडिया में भी टिप्पणियां इससे भिन्न नहीं है।

 

उदाहरण के लिए इस शुक्र्रवार को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मुख्य सतर्कता आयुक्त के पद हेतु पी.जे. थॉमस की नियुक्ति को निरस्त करने पर राजधानी के एक अग्रणी दैनिक ने यह शीर्षक दिया है।

 

सर्वोच्च न्यायालय ने लाल झण्डी दिखाई लेकिन सरकार की आंखे बंद है

(SC WAVED RED FLAGS BUT GOVT. HAD EYES WIDE SHUT)

 

****

 

अनेक महीनों से, देश के प्रत्येक कोनों में यदि कोई एक शब्द गूंज रहा है तो वह है भ्रष्टाचार

 

स्वतंत्र भारत में 1952 के पहले आम चुनावों से सन् 2009 तक के पंद्रह आम चुनावों में सक्रिय रुप से भाग लेने का सौभाग्य मुझे मिला है। और इनमें से अधिकांश में विपक्षी दलों ने भ्रष्टाचार को एक महत्वपूर्ण मुद्दा बनाने का प्रयास किया। परन्तु वास्तव में केवल एक बार राष्ट्रीय स्तर पर वे सफल हो सके, और वह 1989 में जब बोफोर्स तोप मुद्दे पर समूचे विपक्ष ने लोकसभा की अपनी सीटों से त्यागपत्र देकर अपने संसदीय विरोध को चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया। इस केस में, भ्रष्टाचार के विरुध्द विद्रोह न केवल विपक्षी नेताओं ने किया अपितु कांग्रेस पार्टी के भीतर श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने भी किया है।

 

इसलिए, गत् सप्ताह अपने एक साक्षात्कार (इण्डियन एक्सप्रेस, नई दिल्ली, 4 मार्च, 2011) में मैने यह टिप्पणी की कि कांग्रेस को अपने आप को सौभाग्यशाली मानना चाहिए कि आज उनके दल में कोई वी0 पी0 सिंह नहीं है। 

***

justice-vermaयद्यपि यह राष्ट्र का सौभाग्य है कि आज एक सर्वोच्च न्यायालय है जो अपने संवैधानिक दायित्वों के प्रति पूर्णतया कर्तव्यनिष्ठ है। तथ्य यह है कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय ने 1998 में पहली बार विनीत नारायण केस में न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा, एस.पी. भरूचा और एस.सी. सेन द्वारा दिये गये ऐतिहासिक निर्णय में किया था।

 

इस निर्णय के प्रभाव से केन्द्रीय सतर्कता आयोग एक संवैधानिक निकाय बना और उसे सी.बी.आई. के कामकाज की जांच के निरीक्षण की जिम्मेदारी सौंपी गई। सर्वोच्च न्यायालय के इसी निर्णय के चलते मुख्य सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति जो तब तक सरकार के कार्यक्षेत्राधिकार में थी, को प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और लोक सभा में विपक्ष के नेता की कमेटी के तहत कर दी गई।

 

मुझे पता चला कि सी.वी.सी. के लिए पी.जे. थॉमस के चयन पर सर्वोच्च न्यायालय की अप्रसन्नता को समझकर सरकार के कुछ लोगों ने प्रयास किया कि थॉमस स्वयं पद छोड़ दें।  हालांकि उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया। नई दिल्ली के राजनीतिक क्षेत्रों में यह कहा जा रहा है कि एक वरिष्ठ मंत्री ने उन्हें न झुकने की सलाह दी है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश वर्मा ने (4 मार्च, 2011 – द इण्डियन एक्सप्रेस) एक लेख लिखा है जिसका शीर्षक  है क्यों मुझे कोई शक नहीं था कि न्यायालय इसे निरस्त करेगा(Why I had no doubt the Court would strike down)। श्री वर्मा लिखते हैं:

 

केंद्रीय सतर्कता आयुक्त का पद सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, इसका काम सार्वजनिक पद पर कार्यरत लोगों के कामकाज पर निगरानी रखना और कहीं भी पाए जाने वाले भ्रष्टाचार से निपटना है। भ्रष्टाचार से निपटने हेतु यह एक महत्वपूर्ण संस्था है। इस संदर्भ में, घटनाओं का यह मोड़ – सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पी जे थॉमस की नियुक्ति को निरस्त करना – वस्तुत: दु:खद है।

 

मुख्य न्यायाधीश वर्मा द्वारा एक महत्वपूर्ण नियुक्ति जो तब तक सत्तारूढ़ दल का विशेषाधिकार माना जाता था, में विपक्ष की भागीदारी ने एक उदाहरण स्थापित कर दिया। जब बाद में संसद ने सूचना के अधिकार का कानून बनाया तो उसमें लोकसभा में विपक्ष के नेता को भी चयन समिति में शामिल किया गया।

 

भारत दुनिया का सर्वाधिक विशाल लोकतंत्र है। इसमें आश्चर्य नही कि संविधान का अनुच्छेद 324 जो निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति, शक्तियों इत्यादि से सम्बन्धित है एक महत्वपूर्ण प्रावधान माना जाता है।

 

अनुच्छेद 324 (2) कहता है:

            निर्वाचन आयोग मुख्य निर्वाचन आयुक्त और उतने अन्य निर्वाचन आयुक्तों से, यदि कोई हों, जितने राष्ट्रपति समय-समय पर नियत करें, मिलकर बनेगा तथा मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति, संसद द्वारा इस निमित्ता बनायी गई विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी।

 

यदि सर्वोच्च न्यायालय के 1998 के निर्णय को सूचना के अधिकार के कानून में पालन किया गया तो यदि इसे निर्वाचन आयोग के मामले में भी शामिल किया जाता है तो यह लोकतंत्र को मजबूत बनाने हेतु उपयुक्त और उस दिशा में एक कदम होगा।

 

अनुच्छेद 324 (2) की शब्दावली दर्शाती है कि इसके लिए किसी संविधान संशोधन की आवश्यकता नहीं होगी । यह एक साधारण संशोधन से किया जा सकता है। जितना शीध्र यह किया जाए उतना ही अच्छा होगा।

 

लालकृष्ण आडवाणी

नई दिल्ली

6 मार्च, 2011

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*