नेहरु का सेकुलरिज्म भी हिन्दू मूल सिध्दांतों पर आधारित है

January 12, 2013
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इन दिनों मुझे हार्वर्ड की विद्वान डायना एल एक्क की एक उत्कृष्ट पुस्तक पढ़ने को मिली। पुस्तक का शीर्षक है: इण्डिया: ए सेक्रिड जियोग्राफी

 

कुछ इतिहासकार कहते हैं कि भारतीयों में इतिहास बोध की कमी है। पुस्तक के अध्याय 2 में व्हाट इज इण्डिया?” शीर्षक वाले अध्याय में लेखक, अनेकानेक शोधों पर आधारित पुस्तक में इस टिप्पणी का संदर्भ देते हैं लेकिन यह भी स्वीकारोक्ति करते हैं कि यद्यपि यह पाकर अनूठा लगा कि उनके (भारतीयों) पास भूगोल का विस्तृत ज्ञान है।डायना आगे लिखती हैं:

 

dianaउस समय जब इस भूमि की लम्बाई और चौड़ाई में घूमना अवश्य रुप से बहुत कठिन रहा होगा,, तब भी भौगोलिक ज्ञान की परम्पराएं दर्शाती हैं कि ऐसी यात्रा वस्तुत की जाती थीं। और यह भी उल्लेखनीय है कि उस समय जब इस उपमहाद्वीप में कोई राजनीतिक एकता नहीं थी तब भी जो इस क्षेत्र को सिकन्दर के साथ जोड़ते थे और इसे एक एकल भूमि….निरुपित करते थे….

 

वे भी सत्यापित करते हैं कि पश्चिमी सीमा पर सिंधु नदी, हिमाचल और उत्तर तक फैला हिन्दूकुश, और अन्य दोनों दिशाओं में विस्तारित समुद्र के साथ भारत आकार में चर्तुर्भुजीय था। यहां तक कि उन्होंने इस माप को भी उदृत किया है: सिंधु नदी की लम्बाई; सिंधु से पाटलिपुत्र की दूरी और वहां से गंगा मुख; पूर्वी और पश्चिमी तटों से इसकी दूरी के साथ।

 

ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के निदेशक बने एलेक्झेडर कन्नींघम ने 1871 में लिखा:

 

इन आयामों का सुगठित प्रबन्धन जोकि सिकन्दर के गुप्तचरों ने दिया था,  विशेषकर देश के वास्तविक आकार के साथ अपने आप में उल्लेखनीय है, यहां तक कि उनके इतिहास के प्रारम्भिक काल में उन्हें अपनी मातृभूमि के रुपों और विस्तार का सही-सही ज्ञान था।

 

जब देश पर अंग्रेजों का शासन था तब तथाकथित विद्वानों का एक वर्ग इसे प्रोत्साहित करने का इच्छुक था कि ब्रिटिश शासन इस विचार के प्रति घृणा करता है कि भारत एक देश था और भारतीय एक जन थे।

 

इस वर्ग का एक प्रमुख प्रतिनिधि था ब्रिटिश सिविल अधिकारी, सर जॉन स्ट्राचे। सन् 1888 में कैंम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में बोलते हुए सर स्ट्राचे ने कहा भारत नाम का क्या महत्व है? अनेक बार यह उत्तर दिया जाता रहा जोकि असत्य सा है,” मगर यह भी सत्य है, उन्होंने कहाऐसा कोई देश नहीं है, और यह भारत के बारे में पहला तथा सर्वाधिक जरुरी तथ्य समझ लेना चाहिए। भारत एक नाम है जिसे हम ने अनेक विभिन्न देशों सहित एक बड़े क्षेत्र का नाम दिया है।

 

सर जॉन स्ट्राचे तर्क देते थे कि भारत की तुलना में यूरोप में ज्यादा समान संस्कृति है। स्कॉटलैण्ड स्पेन की तरह ज्यादा है बनिस्पत बंगाल के पंजाब की तरह की तुलना में…. सभ्य यूरोप में ऐसा कोई देश नहीं है जहां लोग भिन्न हों जैसे कि बंगाली सिखों से भिन्न है, और बंगाल की भाषा लाहौर में उतनी ही अबोधगम्य है जितनी कि यह लंदन में होगी।

 

diana-l-eckइस पुस्तक की लेखक डायना एक्क हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में कम्पैरेटिव रिलीजन एण्ड इण्डियन स्टडीज की प्रोफेसर हैं। उनकी पुस्तक बनारस, सिटी ऑफ लाइटअपने विषय की उत्कृष्ट पुस्तक मानी जाती है, तो 559 पृष्ठों की कड़ी मेहनत से तैयार यह ग्रंथ बताता है कि कैसे हिन्दू पौराणिकता भारत के भूगोल से गुथी है और इस ब्रिटिश शासन के सिध्दांत कि भारत एक देश नहीं है और भारतीय एकजन नहीं हैं, को सशक्त और समाधानपूर्वक ठुकराती है।

 

पुस्तक में अहमदनगर किले का स्मरण किया गया है जहां पण्डित नेहरु ने अपने कारावास के दौरान अपनी पुस्तक डिस्कवरी ऑफ इण्डियालिखी थी। अपनी इस पुस्तक में वह लिखते हैं कि स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान देश भर की उनकी यात्रा ने उन्हें देश की एकता के बारे में धारणा को पुष्ट किया। नेहरु लिखते हैं:

 

यद्यपि बाह्य रुप से हमारे लोगों के बीच विभिन्नता और बेहद विविधता थी, तब भी सर्वत्र एकात्मताका प्रबल भाव था जिसने भले ही हमारा राजनीतिक भाग्य हो या दुर्भाग्य रहा हो, युगों से हम सब को बांधे रखा है, भारत की एकता मेरे लिए मात्र एक बौध्दिक धारणा नहीं रही: यह एक भावनात्मक अनुभव था जिसने मुझे पूर्णतया हावी हुआ।

 

डायना लिखती हैं: नेहरु के भारत के विज़न में निश्चित रुप से सभी जातियों और क्षेत्रीय समुदायों सहित इसकी मजहबी विविधता समाहित थी। सन् 1930 के दशक में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में अपने नेतृत्व के उदय से लेकर अपनी मृत्यु तक भारत के पहले प्रधानमंत्री के रुप में उन्होंने एक कट्टर सेकुलरिज्म का पक्ष लिया, यह सेकुलरिज्म गहरे, हिन्दू आधारों पर निर्मित था, जिनका वर्णन हम कर रहे हैं।

 

भाजपा और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ भारतीय राष्ट्रवाद का आधार हमारी संस्कृति को ही मानते हैं। अक्टूबर 1961 में जब मदुरै में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का सम्मेलन हुआ तब पण्डित नेहरु ने टिप्पणी की थी कि भारत युगों-युगों से तीर्थ-यात्राओं, तीर्थ स्थानों का देश रहा है। उन्होंने आगे लिखा समूचे देश में आपको प्राचीन स्थान मिलेंगे। हिमालय की बर्फ से ढकी चोटियों पर बदरीनाथ, केदारनाथ तथा अमरनाथ से दक्षिण में कन्याकुमारी तक आपको तीर्थस्थल मिल जाएंगे। दक्षिण से उत्तर तक तथा उत्तर से दक्षिण तक कौन सी प्रेरणा-शक्ति लोगों को इन महान तीर्थस्थलों की ओर आकर्षित करती आ रही है? यह एक राष्ट्र की भावना तथा एक संस्कृति की भावना है और इस भावना से हम परस्पर बंधे हुए हैं। हमारे प्राचीन ग्रंथों में कहा गया है कि भारत भूमि उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में समुद्र तक फैली है। सदियों से भारत की यह संकल्पना चली आ रही है तथा इसने हमें परस्पर बांध रखा है। इस महान धारणा से प्रभावित होकर लोगों ने इसे पुण्यभूमिमाना है। जबकि हमारे यहां अनेक सम्राज्य हुए हैं तथा यहां हमारी विभिन्न भाषाएं प्रचलित रही हैं। यह कोमल बंधन ही हमें अनेक तरीकों से बांधे रखता है।

 

पण्डित नेहरु का मदुरै भाषण भारत की प्राचीनता परन्तु सतत् स्वउर्जित संस्कृति को उस कोमल बंधनवर्णित करता है जो हमारी विविधताओं को एक देशके रुप में जोड़ता है।

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उमाश्री भारती की उनके गंगा समग्र अभियानके पहले चरण के सफलतापूर्वक सम्पन्न होने पर हार्दिक अभिनन्दन, जिसके तत्वाधान में गत् 7 जनवरी, 2013 को कांस्टीटयूशन क्लब में एक औपचारिक कार्यक्रम सम्पन्न हुआ।

 

uma-bharatiइस अभियान के दो हिस्से थे: एक, 20 सितम्बर, 2012 से 28 अक्टूबर, 2012 तक गंगासागर से गंगोत्री तक की पांच सप्ताह की यात्रा और दूसरा, 2 दिसम्बर, 2012 को गंगा के सभी किनारों पर एक मानव श्रृंखला बनाना।

 

साध्वी उमा भारती के अभियान के दो उद्देश्य थे। (1) शुध्द गंगा, (2) अविरल गंगा।

 

श्रोताओं से खचाखच भरे इस कार्यक्रम में भारतीजी ने इस अभियान में समाज के सभी समुदायों और वर्गों के उत्साह भरे समर्थन का प्रभावी ब्यौरा प्रस्तुत किया।

 

विट्ठलभाई पटेल हाउस में सम्पन्न इस कार्यक्रम में, मेरी सुपुत्री प्रतिभा द्वारा तैयार की गई तीस मिनट की अत्यन्त दिलचस्प और शिाक्षाप्रद फिल्म गंगादिखाई गई।

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सेक्रिड जियोग्राफी पुस्तक में दि गंगा एण्ड दि रिवर्स ऑफ इण्डियाशीर्षक से एक अलग अध्याय है।

 

इस अध्याय में डायना कहती हैं: हिन्दू भारत अपनी विविधताओं के बावजूद कुछ चीजों पर एक स्वर से बोलता है जैसाकि गंगा माता के बारे में। यह नदी हिन्दुओं, चाहे वे उपमहाद्वीप के किसी भी भाग को अपना घर कहते हों, या चाहे उनका अपना कोई सम्प्रदाय हो, के लिए विशाल सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व रखती है। जैसाकि एक हिन्दी लेखक ने लिखा है, ”यहां तक कि कट्टर नास्तिक हिन्दू भी जब गंगा के तट पर पहली बार पहुंचेगें तो उसके मन में ऐसे भाव उमड़ेगे जो पहले कभी नहीं उमड़े थे; ”या, हम इसमें जोड़ सकते हैं, ‘जब गंगा उनके पास पहुंची।विभिन्न क्षेत्रों और बहुविध हिन्दू परम्पराओं के लोगों में एकता भाव लाने के लिए गंगाजल का उपयोग पूर्णतया अनुकुल होना चाहिए। आखिरकार, यह प्रतीक है सिर्फ उपकार, सिर्फ भरे हुए जल कलश और कमल का।

 

उमाश्री के अभियान के स्वयंसेवक गंगाजल के कलशों को लेकर सभी सांसदों, विधायकों और हजारों जनप्रतिनिधियों को देने गए थे, स्वयं उमाजी राष्ट्रपति, सम्मानीय लोकसभाध्यक्ष और अनेक अन्य गणमान्य महत्वपूर्ण व्यक्तियों को गंगाजल देने गई।

 

इस गंगाजल भेंट कार्यक्रम में हिस्सा ले चुके सभी इस पर एकमत थे कि जिस श्रध्दा से यह कलश ग्रहण किए गए वह न केवल हिन्दुओं तक सीमित भी अपितु हिन्दुओं, मुस्लिमों, ईसाइयों, सिखों में भी देखने को मिली।

 

लालकृष्ण आडवाणी

नई दिल्ली

11 जनवरी, 2013

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