नेहरु की विदेशनीति की भयंकर भूल – चीन और पाकिस्तान

February 15, 2010

कांग्रेस पार्टी सदैव पण्डित नेहरू को भारत की विदेश नीति के अनुकरणीय कर्णधार के रूप में प्रस्तुत करती रही है।

दूसरी ओर, हमारे राजनीतिक आन्दोलन के संस्थापक डा0 श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पाकिस्तान और चीन के सम्बन्ध में पण्डितजी की नीति को भयंकर भूल मानते रहे हैं।

दु:ख की बात है कि 1962 में चीन के विश्वासघात से लगे सदमे ने नेहरू की जान ले ली। पाकिस्तान से निपटने में उनकी गलत नीति ने आतंकवाद और कश्मीर जैसे दो घाव बना दिए जो आज तक दु:खदायी बने हुए हैं।

‘न्यूजवीक इंटरनेशनल’ के सम्पादक फरीद जकरिया (जिनके स्वर्गीय पिता निष्ठावान कांग्रेसी थे) ने भारत की विदेश नीति के नेहरू द्वारा संचालन के बारे में कुछ महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं। पेइंगुन द्वारा प्रकाशित ‘दि पोस्ट अमेरिकन वर्ल्ड’ में जकरिया कहते हैं कि आज भारत की मुख्य दुविधा यह है कि ”इसका समाज दुनिया का सामना करने के लिए खुला, उत्साह और आत्मविश्वास से भरा है”, लेकिन इसकी सरकार-सत्ता अधिष्ठान- ”इसके इर्द-गिर्द बदल रही परिस्थितियों के लिए झिझक, भीरूता और संदेहों से भरे है।” न्यूजवीक के सम्पादक आगे कहते हैं : ”और यह तनाव सबसे ज्यादा स्पष्ट विदेश नीति के मामले में देखने को मिलता है जिसकी बड़ी हुई भूमिका और महत्वपूर्ण काम है कि नए विश्व में भारत को उपयुक्त भूमिका में रखना।”

जकरिया की पुस्तक में स्मरण कराया गया है कि जब माऊण्टबेटन ने सुझाया कि एक शक्तिशाली सेनाध्यक्ष (चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ) होना चाहिए तो नेहरू ने इसे ठुकरा दिया।

जकरिया लिखते हैं ”नई सरकार बनने के एक सप्ताह के भीतर ही वे (नेहरू) रक्षा मंत्रालय गए और वहां काम कर रहे सैन्य अधिकारियों को देख कर क्रोधित हो गए (ऐसे अधिकारी दुनिया भर में प्रत्येक रक्षा मंत्रालय में देखे जा सकते हैं)। तब से नई दिल्ली के ‘साउथ ब्लाक’ (रक्षा मंत्रालय का कार्यालय) में सभी सैन्य अधिकारी नागरिक वेश में कार्य करते हैं।’

पण्डित नेहरू 1947 से 1964 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे। इस समूची अवधि में वे अपने विदेश मंत्री भी खुद ही थे। भारत के पहले विदेश सचिव के.पी.एस. मेनन ने अपनी आत्मकथा में लिखा है: ”ऐसा कोई उदाहरण नहीं है कि हम पीछे मुड़कर देखें क्योंकि जब तक भारत स्वतंत्र नहीं हुआ तब तक उसकी अपनी कोई विशेष नीति नहीं थी …….. इसलिए हमारी नीति जबरन एक व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर रही जोकि विदेश मंत्री जवाहर लाल नेहरू थे।”

नेहरू के विदेश नीति प्रबंधन को जकरिया ने इन शब्दों में सारांश रूप में प्रस्तुत किया है:

”नेहरू ने भारत की विदेश नीति की जडें राष्ट्रीय हितों के सामरिक सिध्दान्तों के बजाय अव्यवहारिक विचारों में रखी। उन्होंने गठबंधनों, समझौतों, और संधियों को पुराने विचार मानकर उनको उपेक्षित किया और सैन्य मामलों में अरूचि बरती।”

फरीद जकरिया लिखते हैं, विडम्बना यह रही है कि भारत की नीतियां ”विशेष रूप से नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी के शासन के दौरान कठोर और तेज-तर्रार हुईं।” जैसा हम सभी जानते हैं कि उनके शासन में ही बंगलादेश का निर्माण हुआ और परमाणु हथियारों के क्षेत्र में भारत ने प्रारम्भिक कदम रखे। जो प्रेक्षक भारत को एक पूर्ण परमाणु हथियारों से सम्पन्न देश के रूप में विकसित होते देखते रहे हैं, वे जानते हैं कि पोखरण-I, 1974 में श्रीमती गांधी के शासन में हुआ। तब से शुरू हुई प्रक्रिया को प्रधानमंत्री वाजपेयी ने 11 मई, 1998 में पोखरण-II के माध्यम से तीन भूमिगत सफल परमाणु परीक्षणों से पूरा किया।

भारत के सामरिक हितों के प्रति नेहरूजी का उपेक्षा का इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा कि 1952 में अमेरिका द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में भारत को स्थायी सदस्यता देने के प्रस्ताव को उन्होंने ठुकरा दिया। उन्होंने आग्रह किया कि यह सीट चीन को देनी चाहिए। दिलचस्प यह है कि डा0 मनमोहन सिंह सरकार में विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर ने इस तथ्य का अपनी पुस्तक में उल्लेख किया है।

जब नेहरू ने अमेरिकी प्रस्ताव को अस्वीकार किया तो उनका तर्क था कि वे नहीं चाहते कि अमेरिका चीन को कमजोर करे। इसी प्रकार हमने केवल अपने ही हितों को चोट पहुंचाई है।

सन् 2008 में ‘ब्रिक देशों’ (ब्राजील, रूस, भारत और चीन) के विदेश मंत्रियों का सम्मेलन येकटरिनबुर्ग (रूस) में हुआ। रूस ने आग्रह किया कि इस सम्मेलन को, संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में भारत को स्थायी सदस्यता दिलाने सम्बन्धी भारत के प्रस्ताव का समर्थन करना चाहिए लेकिन रूस का यह प्रयास चीन के मुखर विरोध के कारण असफल रहा!

लाल कृष्ण आडवाणी
नयी दिल्ली

१५ फरवरी, २०१०

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