नौकरशाह बनाम दिल्ली के विद्यार्थी

September 20, 2010

पिछले सप्ताह जब राष्ट्रमण्डल खेलगांव अनौपचारिक रुप से खोला गया तो जिसने देखा वही उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगा। वेल्स के चे्फ डि मिशन ने जो कहा वह छपा है: अपनी सुविधाओं और वैभव से परिपूर्ण विलेज असामान्य है।

 

इससे मुझे एनडीए सरकार के समय जब पहली बार नई दिल्ली में यह खेल आयोजित करने का निर्णय लिया गया, के प्रस्ताव का स्मरण हो आया।

 

यहां राष्ट्रमण्डल खेल आयोजित करने का फैसला 2003 में लिया गया। उस समय श्री वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार थी।

 

राष्ट्रमण्डल खेलों की मेजबानी के लिए भारत ने 2003 के शुरु में ही दावा किया था। उस वर्ष के अगस्त मास के पहले सप्ताह में खेलों के मूल्यांकन आयोग ( Evaluation Commission ) ने दिल्ली सहित उन अन्य देशों का भी दौरा किया जिन्होंने खेलों की मेजबानी करने का दावा किया था।

 

जिस टीम ने मूल्यांकन आयोग के सम्मुख प्रेजटेंशनदिया था, उसने एनडीए सरकार को दी गई रिपोर्ट में संकेत दिया था कि आयोग के अनुमान में खेलों को हमारे यहां आयोजित करने की क्षमता काफी उंचीहै।

 

खेलों के स्थान का अंतिम फैसला नवम्बर में जमाईका के मोंटंगो बे में हुआ। वहां पर हमारे देश का प्रतिनिधित्व युवा मामलों और खेल मंत्री विक्रम वर्मा और दिल्ली के उप राज्यपाल विजय कपूर ने किया था। हमारा मुख्य प्रतिस्पर्धी कनाडा था।

 

13 नवम्बर को मतदान हुआ। 46 सदस्य देशों ने हमारे पक्ष में और 22 ने विरोध में मत दिए।

 

इस निर्णय के कुछ समय बाद ही दिल्ली के तत्कालीन उप राज्यपाल विजय कपूर ने केंद्र सरकार को सिफारिश की थी कि राष्ट्रमंडल खेलों में भाग लेने वाले धावकों के लिए बनाए जाने वाले आवास इस तरह के होने चाहिए कि बाद में इनका उपयोग दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रावासों के रुप में हो सके। वाजपेयी सरकार इस सुझाव पर तुरंत राजी हो गई। लेकिन नई दिल्ली में सरकार बदलने के साथ ही उन नौकरशाहों का विचार बदल गया, जिनके मन में खेल हो जाने के बाद इन आलीशान आवासों को अपने उपयोग में लाने की बात आयी।

 

मेरे सामने विजय कपूर जो अब दिल्ली के उप राज्यपाल नहीं हैं, का 14 सितम्बर, 2004 को दिल्ली विश्वविद्यालय के उप कुलपति प्रो. दीपक नैय्यर को लिखा गया पत्र है।

 

आगामी राष्ट्रमंडल खेलों के संदर्भ में, उस पत्र को जोकि श्री कपूर ने 8 सितम्बर को उप कुलपति द्वारा उनके कार्यकाल में विश्वविवद्यालय की सहायता करने के लिए धन्यवाद दिया था, के जवाब में लिखे गए पत्र को मैं यहां प्रस्तुत करना समीचीन मानता हूं।

 

14 सितम्बर के इस पत्र में श्री कपूर लिखते हैं:

 

प्रिय दीपक,

 

8 सितम्बर के आपके पत्र के लिए धन्यवाद। यह दिल को छू लेने वाला है। इसलिए भी ज्यादा कि जहां मैंने शिक्षा पायी यह उस विश्वविद्यालय के उप कुलपति की ओर से आया है। मैं आपको आश्वस्त करना चाहता हूं कि मैं जीवन की किसी भी अवस्था में विश्वविद्यालय की सेवा करना अपना परम सौभाग्य समझूंगा।

 

मैं केंद्रीय मंत्रिमंडल से यह स्वीकृति लेने मे सफल रहा हूं कि राष्ट्रमंडल खेलों के 2010 लिए अक्षरधाम के निकट खेलगांव बनाया जाएगा और खेलों के पश्चात् इसे दिल्ली विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के लिए उपयोग हेतु सौंप दिया जाएगा। मैंने सुना है कि कुछ लोग जो हमारे युवाओं के लिए प्रतिबध्द नहीं है, तब से इस निर्णय को बदलवाने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे किसी प्रयास को पलटने से बचाने के लिए मैंने दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) के अधिकारियों को कहा है कि वे शुरु से ही ऐसे डिजाइन बनाएं जो खेलों के बाद में विश्वविद्यालय छात्रावासों के रुप उपयोग हो सकें। विश्वविद्यालय का रुतबा और व्यक्तिगत रुप से आपके प्रभाव का उपयोग इससे सुनिश्चित करने के लिए करना होगा कि पिछली केंद्रीय मंत्रिमंडल के इस प्रशंसनीय निर्णय को कोई बदल न सके। किसी भी स्तर पर आपकी मेरी जरुरत हो तो कृपया मुझे बताएं।

 

शुभकामनाओं सहित,

 

आपका

 

विजय कपूर

 

दिल्ली विश्वविद्यालय के उप कुलपति ने इस पत्र के जवाब में कपूर के सुझावों का धन्यवाद के साथ मामले को उठाने का वायदा किया।

 

स्पष्ट है कि उप कुलपति एनडीए सरकार के निर्णय को बदलने से रुकवाने में सफल नहीं हो सके।

 

इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि अनेक महीनों के बाद समाचार पत्रों में खेलों के बारे में पहली बार सकारात्मक रिपोर्ट आर्इ्र है। और यह खेलगांव में बने आलीशान आवासों से जुड़ी है।

 

17 सितम्बर के द टाइम्स ऑफ इंडिया ने खेलगांव के साफ्ट लांचके बारे में इस शीर्षक से समाचार प्रकाशित किया है: बिग्गर एण्ड बैटर, इट्स ए ग्लोबल विलेज।

 

रिपोर्ट की शुरुआती पंक्तियां इस प्रकार हैं:

 

विशाल और बेहतर। यह राष्ट्रमंडल खेलों में भाग लेने आए प्रतिभागी देशों के प्रतिनिधियों की एक राय थी जब वे गेम्स विलेज से गुजर रहे थे।

 

वेल्स के चीफ ऑफ मिशन ने कहा कि नई दिल्ली के खेलगांव ”ऐसे सामान्य गांव नहीं है जो हमने अब तक देखे हैं।” और यह मेलबार्न से भी ज्यादा बेहतर है। टाइम्स ऑफ इंडिया कहता है कि यह वक्तव्य ”आयोजन समिति के कानों में संगीत की भांति है, जो विलम्ब से चल रही तैयारियों के लिए आलोचना झेल रही है।”

 

सुरेश कलमाडी और उनके सहयोगी भले ही खुश होंगे लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय के विद्यार्थी इस सब के बारे में क्या महसूस करते होंगे? क्या वे अपने को ठगा हुआ महसूस नहीं करते होंगे?

 

लालकृष्ण आडवाणी

नई दिल्ली

20 सितम्बर, 2010 

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