पाकिस्तान नीति : अस्त-व्यस्त, वाजपेयी सरकार की नीति से उलट

July 25, 2010
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भारत की स्वतंत्रता के साथ ही पाकिस्तान का जन्म हुआ। विभाजन के अनेक त्रासद परिणाम हुए :लाखों निर्दोष पुरुष, महिलाएं और बच्चे मारे गए तथा करोड़ों बेघर हुए।

इसलिए,स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही भारत सरकार की विदेश सम्बन्धी मामलों के संचलन को परखने की महत्वपूर्ण कसौटी इसकी पाकिस्तान नीति बनी हुई है।

और वर्तमान में, नई दिल्ली की पाकिस्तान नीति वास्तव में अस्त-व्यस्त बनी हुई है।

शर्म-अल-शेख में प्रधानमंत्री की भयंकर भूल जिसमें उन्होंने भारत-पाक वार्ता को सीमापार के पाकिस्तानी आतंकवाद से अलग करने की घोषणा की थी, से शुरु होकर हाल ही में पाकिस्तान में विदेश मंत्री की भूमिका तक-भारत की पाकिस्तानी नीति आज तक कभी भी जनमत के इतनी विपरीत नहीं रही जितनी की आज है। यहां तक की सरकार के मंत्रियों में भी इस नीति को लेकर मतभेद हैं।

मैं व्यक्तिगत रुप से गृह सचिव जी. आर. पिल्लई को जानता हूं, वे एक जिम्मेदार और योग्य अधिकारी हैं और जब इस्लामाबाद में संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में पाकिस्तान के विदेश मंत्री कुरैशी ने उन्हें लांछित किया तथा आतंकवादी हफीज कुरैशी के समकक्ष रखा, तब मैं यह देखकर आश्चर्यचकित रह गया कि कैसे हमारे विदेश मंत्री ने इस अपमान को चुपचाप सहा।

मेरा यह आश्चर्य उस समय क्षोभ में बदल गया जब कुछ दिनों बाद हमारे मंत्री ने ही सार्वजनिक रुप से पिल्लई की निंदा कर पाकिस्तान द्वारा किए गए अपमान के घावों पर और नमक छिड़का; और उनका (पिल्लई) अपमान किसी गलती के लिए नहीं अपितु 26/11 को मुंबई पर हुए आतंकी हमले में आई.एस.आई. की भूमिका को उजागर कर देश की सेवा करने के लिए किया गया !

श्री वाजपेयी 1998 में प्रधानमंत्री बने और 6 वर्षों तक शासन किया। अब डा. मनमोहन सिंह ने भी 2004 से 2010 तक प्रधानमंत्री के रुप में 6 वर्ष पूरे किए हैं।

राजग (एनडीए) की पाकिस्तान नीति का संचालन सुस्पष्ट रुप से इससे भिन्न था।

भाजपानीत सरकार की शुरुआत प्रत्यक्षतः प्रतिकूल परिस्थितियों में हुई थी। पाकिस्तान इसे अपनी शत्रु सरकार मानता था। लेकिन इस पाकिस्तान विरोधी समझे जानी वाली सरकार ने पूरे विश्व की प्रशंसा हासिल की जब प्रधानमंत्री ने लाहौर की बस यात्रा की और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से गर्मजोशी से वार्ता की। इस पहल की गंभीरता के बारे में किसी के मन में कोई शंका नहीं थी।

परन्तु बदले में पाकिस्तान की तरफ से की गई दो कार्रवाईयों ने सभी को विस्मित कर दिया।

पहला था कारगिल, प्रधानमंत्री की जानकारी के बिना पाक सेना द्वारा किया गया ऑपरेशन; और दूसरा, सैन्य विद्रोह जिसने जनरल मुशर्रफ को राष्ट्रपति के रूप में पदारुढ़ किया। नवाज शरीफ को न केवल सत्ताच्युत किया गया अपितु उन्हें देश निकाला दे दिया गया।

आत्म-विश्वास से भरी कोई सरकार ही इन सभी का उस ढंग से जवाब दे सकती थी जैसा वाजपेयी सरकार ने दिया।

उन्होंने पहले सेना को पूर्ण शक्ति से कारगिल ऑपरेशन, जो कि जनरल (मुशर्रफ) का अपना किया धरा था, को कुचलने दिया और इसके बाद जनरल को आगरा वार्ता का निमंत्रण देकर दूसरा साहसपूर्ण कदम उठाया ।

इसका उद्देश्य यह संभावना तलाशना था कि पाकिस्तान आतंकवाद का रास्ता, जो उसने अनेक सैन्य मुकाबलों में बुरी तरह हारने के बाद अपना रखा है, को त्याग सके।

जनरल आगरा आए, बातचीत की और खाली हाथ लौट गए।

जनरल खाली हाथ इसलिए लौटे क्योंकि उनका निर्लज्ज रूख यह था कि पाकिस्तान भारत में कुछ नहीं कर रहा, और वस्तुत: भारत में आतंकवाद नाम की कुछ चीज नहीं है; जो यहां हो रहा है वह जम्मू-कश्मीर के लोगों की स्वतंत्रता की लड़ाई है और कुछ नहीं!

आगरा ने इस्लामाबाद को साफ दर्शा दिया कि सीमापार के आतंकवाद पर भारत कोई समझौता नहीं करेगा। इसी दृढ़ रुख के चलते जनरल को अपने रुख को छोड़ना पड़ा और जनवरी 2004 में इस्लामाबाद में वाजपेयीजी के साथ संयुक्त वक्तव्य में उन्होंने हस्ताक्षर किए कि : ”वह पाकिस्तान के नियंत्रण वाले किसी भी क्षेत्र से, किसी भी रुप में आतंकवाद को समर्थन देने के लिए अनुमति नहीं देंगे।”

हम आशा करते हैं कि डा. मनमोहन सिंह और एस.एम. कृष्णा इसे ध्यान में रखेंगे कि उद्देश्य की दृढ़ता चरित्र का अत्यंत आवश्यक अंग है और सफलता का एक सर्वोत्तम उपकरण। आज,भारत की पाक नीति का मुख्य उद्देश्य अवश्य ही यह होना चाहिए कि हम अपने इस पड़ोसी को आतंकवाद को समाप्त करने हेतु बाध्य कर सकें।

लाल कृष्ण आडवाणी
नयी दिल्ली

२५ जुलाई, २०१०

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