प्रधानमंत्री ने अवसर गंवाया

January 7, 2012

दो दिन पूर्व प्रधानमंत्री डॉ0 मनमोहन सिंह ने, देश के अग्रणी हिन्दी दैनिक जागरण के संस्थापक पूर्णचन्द्र गुप्त की जन्म शताब्दी के अवसर पर एक डाक टिकट जारी किया। अवसर था: 2 जनवरी, 2012, श्री गुप्त की जयन्ती का।

 

प्रेस की आजादी भारतीय लोकतंत्र की वृध्दि के लिए अनिवार्य है, प्रधानमंत्री ने इस पर जोर देते हुए मीडिया संगठनों से ऐसा तंत्र स्थापित करने को कहा जो निष्पक्षता को प्रोत्साहित और सनसनी को समाप्त करे। डा0 मनमोहन सिंह ने कहा मेरे विचार से हमारे देश में यह आम सहमति है कि मीडिया पर कोई बाहरी नियंत्रण नहीं थोपा जाना चाहिए।

 

प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर पूर्णचन्द गुप्त की जीवनी का भी विमोचन किया। 

 

puran-chandजीवनी में स्मरण किया गया है कि कैसे आपातकाल का विरोध करने के कारण पूर्णचन्द्र गुप्त को जेल जाना पड़ा। जब 26 जून, 1975 को प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने आपातकाल लागू करने की घोषणा की और प्रेस पर सेंसरशिप थोपा तो किसी समाचारपत्र को बंदी बनाए गए नेताओं या उन्हें कहां बंदी बनाकर रखा गया है सम्बन्धी समाचार प्रकाशित करने की अनुमति नहीं दी गई।

 

पिछले सप्ताह डा0 मनमोहन सिंह द्वारा लोकार्पित की गई पुस्तक में मैंने 27 जून, 1975 के जागरण के मुखपृष्ठ को देखा। शीर्षक था: राष्ट्रीय आपातस्थिति घोषित, सभी विपक्षी नेता बंद। इस मुखपृष्ठ पर समाचार के साथ में आठ विपक्षी नेताओं – चरण सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी, जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, लाल कृष्ण आडवाणी, पीलू मोदी, राजनारायण और चन्द्रशेखर के फोटो प्रकाशित किए गए थे। साथ ही में सम्पादकीय स्तम्भ खाली था, जिस पर शीर्षक था ए न्यू डेमोक्रेसी?” (एक नया लोकतंत्र)। जहां तक मुझे याद है कि कोई अन्य समाचार पत्र इस तरह का समाचार प्रकाशित कर अपने पाठकों को बांट पाया हो।

 

मुझे नहीं पता कि प्रधानमंत्री को इस पुस्तक को देखने का अवसर मिला या नहीं, या किसी ने उनको बताया कि जागरण के सम्पादकों को आपातकाल का विरोध करने के लिए बंदी बनाया गया था। यदि उन्हें इसके बारे में बताया गया होता, और यदि उन्होंने जागरण के संस्थापक की प्रशंसा में इस तथ्य का भी उल्लेख किया होता तो उन्होंने लोकतंत्र की अनुकरणीय सेवा की होती। ऐसा न करके उन्होंने स्वतंत्र भारत के इतिहास में प्रेस की आजादी पर हुए हमले से खुद को अलग करने का अवसर गंवा दिया।

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आपातकाल के दौरान हुई ज्यादतियों की जांच करने के लिए मोरारजी भाई सरकार द्वारा गठित शाह आयोग ने उल्लेख किया है कि गीता और गांधी के उद्दरणों को देने की अनुमति नहीं दी गई और उन पर भी सेंसर लागू था। आपातकाल के दौरान सूचना एवं प्रसारण मंत्री रहे विद्याचरण शुक्ल से शाह आयोग ने पूछताछ की थी। आयोग की अंतरिम रिपोर्ट के पृष्ठ 37 पर आयोग कहता है:

jagran-cutting 

श्री शुक्ल ने बताया कि इन उद्दरणों को इसलिए अनुमति नहीं दी गई क्योंकि इन्हें ब्रिटिश राज के संदर्भ में उपयोग किया गया था, और इन्हें संदर्भ से हटाकर उपयोग करने से इससे गलतफहमियां फैल सकतीं थी, इसलिए इन्हें टालने को कहा गया था। 

 

समाचारपत्रों को अपने सम्पादकीय स्तम्भ खाली छोड़ने की अनुमति तक नहीं थी। श्री शुक्ल के अनुसार यदि सम्पादकीय स्थान खाली छोड़े जाते तो इसका अर्थ होता था विरोध और सरकार की नीति के अनुसार इस सम्बन्ध में किसी भी प्रकार के विरोध की अनुमति प्रस्तावित नहीं थी। उन्होंने आगे बताया कि समाचारपत्र में खाली स्थान आपातकाल के विरूध्द एक विरोध ही था। इसलिए यह गैरकानूनी था और इस कारण सरकार को यह कहने का अधिकार था कि खाली स्थान नहीं छोड़ा जाना चाहिए।    श्री राजमोहन गांधी और श्री निखिल चक्रवर्ती दोनों का ही मानना था कि सम्पादकों द्वारा समाचारपत्रों में खाली स्थान छोड़ने पर सरकार को इसलिए आपत्ति थी कि वह यह आभास देना चाहती थी कि देश में कोई सेंसरशिप नहीं है।

 

टेलपीस:

शाह आयोग की रिपोर्ट पढ़ते हुए मैने पाया कि पूर्णचन्द्र गुप्त जो पी.टी.आई. के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के चेयरमैन थे, आयोग के सम्मुख पेश हुए और आपातकाल के दौरान सरकार द्वारा मीडिया को तंग करने की गवाही दी।

 

पी.सी. गुप्ता ने आरोप लगाया कि भारत सरकार द्वारा शुरू की गई समाचार न्यूज एजेंसी से स्वतंत्र रूप से काम कर रही पीटीआई और यूएनआई पर दवाब डाला गया। यह दवाब इस प्रकार डाला गया:

 

           टेलीप्रिंटर लाईनें काट कर,

           ऑल इण्डिया रेडियो द्वारा भुगतान न करके,

           उनकी कथित देनदारी के बारे में प्रेस में उनके विरोध में प्रचारित करके।

 

आयोग ने सूचना एवं प्रसारण मंत्री की बेबाक सफाई को इस रूप में दर्ज किया है:

 

श्री वी.सी. शुक्ल ने स्वीकारा कि 13 दिसम्बर, 1975 से 24 जनवरी, 1976 तक केबिनेट ने उन्हें निर्देशित किया कि अन्य तरीकोंसे एजेंसियों को बाध्य, लालच या तथाकथित अन्य तरीकोंसे मनाया जाए कि वे विलय को तैयार हो जाएं (समाचार में)।

 

 

श्री लालकृष्ण आडवाणी

नई दिल्ली

5 जनवरी, 2012

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