फोन टेपिंग, सीबीआई का दुरुपयोग और आपातकाल

May 10, 2010

पिछले पखवाड़े, नई दिल्ली से प्रकाशित ‘आउटलुक’ पत्रिका ने एक सनसनीखेज रिपोर्ट प्रकाशित की थी कि कैसे एक केंद्रीय मंत्री, एक मुख्यमंत्री, एक कांग्रेसी महासचिव और सीपीएम पार्टी के एक प्रमुख नेता के फोन टेप किए जा रहे हैं और उनकी बातचीत को टेप किया गया है।

रिपोर्ट से संसद में हंगामा हुआ। सरकार ने रिपोर्ट का खण्डन नहीं किया। उसने यह कहा कि : निगरानी के लिए किसी को ”अधिकृत” नहीं किया गया था। सरकार ने इतना भी नहीं कहा कि वे पता लगाएंगे कि बगैर अधिकृत किए किसने यह काम किया और ‘अपराधियों’ को पकड़ा जाएगा। स्पष्ट है कि सरकार के सिवाय किसी और का यह काम नहीं है!

यह महत्वपूर्ण है कि सरकार ने ‘आउटलुक’ की केंद्रीय मंत्री शरद पवार से सम्बन्धित रिपोर्ट का खण्डन नहीं किया है जिसमें कहा गया था कि पवार की ललित मोदी से बातचीत को पवार पर मोदी से इस्तीफा देने के दबाव में उपयोग किया गया!

‘आउटलुक’ की रिपोर्ट पर मेरे ब्लाग का शीर्षक था “क्या आपातकाल वापस लौट आया है?” (Is the Emergency back?)। कुछ मित्रों को लगा कि यह मेरी अतिरंजित प्रतिक्रिया है। मेरा मानना है कि लोकतंत्र के प्रति सत्तारुढ़ पार्टी की कटिबध्दता की असली परीक्षा सिर्फ तभी होती है जब लोकतांत्रिक नियमों में निष्ठा सत्ता में बने रहने को खतरा उत्पन्न करती है।

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वाटरगेट कांड पर अपनी सर्वोत्तम पुस्तक ‘द फाल आफ रिचर्ड निक्सन’ में थ्योडोर एच. व्हाईट ने यह अनुबोधक टिप्पणी की है कि:

”रिचर्ड निक्सन का असली अपराध था कि उन्होंने उस विश्वास को तोड़ा जो अमेरिका को बांधे रखता है और इसके लिए उन्हें सत्ता से बाहर होना पड़ा। जो विश्वास उन्होंने तोड़ा वह नाजुक था- कि अमेरिकी जीवन में कहीं न कहीं, कम से कम एक व्यक्ति है जो कानून के लिए खड़ा होता है यह विश्वास मानता है कि सभी मनुष्य कानून के सम्मुख समान है और उसके द्वारा संरक्षित भी; और इससे फर्क नहीं पड़ता कि इस विश्वास का और कहीं रोज किसी बिन्दु पर जीने के लिए भद्दे ढंग से सौदा किया जाता है, लेकिन राष्ट्रपति पद, न्यायिक जोड़-तोड़ की संभावनाओं से कहीं आगे तक है।”

निस्संदेह, वाटरगेट अमेरिकी लोकतंत्र के इतिहास का एक कभी न मिटने वाला कलंक है।

भारतीय लोकतंत्र के संदर्भ में, 1975-77 का आपातकाल इसी तरह का काला धब्बा है। शाह आयोग ने अपनी अकाटय तर्कपूर्ण और अत्यधिक प्रमाण प्रस्तुत करने वाली रिपोर्ट में कहा है:

”देश के किसी भी भाग में कानून और व्यवस्था के असफल होने का कोई साक्ष्य नहीं था-न ही ऐसी कोई आशंका; आर्थिक स्थिति भी अच्छे ढंग से नियंत्रण में थी और किसी भी रुप में उसके बिगड़ने का खतरा नहीं था। कानून और व्यवस्था की स्थिति के गंभीर रुप से असफल होने या आर्थिक स्थिति के बिगड़ने की आशंकाओं की कोई रिपोर्ट किसी सार्वजनिक अधिकारी के पास भी नहीं थी। उस समय के सार्वजनिक रिकार्डस्-गुप्त, विश्वसनीय या सार्वजनिक और समाचार पत्रों में प्रकाशित-एक स्वर से बोलते हैं कि कोई ऐसी अनोखी घटना या उस प्रवृत्ति को दर्शानेवाली चीज भी जिससे आपातकाल की घोषणा का औचित्य सिध्द किया जा सके। राष्ट्र की सुरक्षा को बाह्य या आंतरिक स्रोतों से कोई खतरा नहीं था।

श्रीमती इंदिरा गांधी या किसी अन्य द्वारा कोई साक्ष्य न दिए जाने की स्थिति में यह निष्कर्ष निकलता है कि राष्ट्रपति को ‘आंतरिक आपातकाल’ घोषित करने की अप्रत्याशित सलाह देने के पीछे एक मात्र उद्देश्य था सत्तारुढ़ पार्टी और विपक्ष में सघन राजनीतिक गतिविधियां, जो उस समय की प्रधानमंत्री के चुनाव को इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा भ्रष्ट चुनावी तरीकों के आधार पर रद्द किए जाने से जन्मी थी।

यह सोचने का कोई कारण नहीं है कि यदि लोकतांत्रिक परम्पराओं का पालन किया गया होता, तो समूची राजनीतिक उथल-पुथल सामान्य रुप से शांत हो गयी होती। लेकिन श्रीमती गांधी ने सत्ता में बने रहने की चिंता में ऐसी स्थिति पैदा कर दी जिससे प्रत्यक्ष रूप में वह सत्ता में जमी रहीं पर इससे ऐसी शक्तियां भी पैदा हुईं जिन्होंने कुछ लोगों की महत्वाकांक्षाओं के लिए अनेकों के हितों की बलि चढ़ा दी। हजारों को बंदी बना लिया गया और नितांत गैर-कानूनी तथा अवांछित कार्रवाइयों के चलते मानव कष्टों और कठिनाइयों की श्रंखला बनती गई। किसी भी स्पष्टीकरण के अभाव में यह निष्कर्ष अनिवार्यत: निकलता है कि एक निहित स्वार्थ वाले प्रधानमंत्री ने अपने विरूध्द न्यायिक निर्णय की वैधानिक बाध्यता से अपने को बचाने के लिए हताशा के प्रयासों में एक राजनीतिक निर्णय लिया।”

1977 के लोकसभाई चुनावों ने देखा कि कैसे भारतीय मतदाताओं ने इतिहास बनाया। विपक्ष के हम लोग एक ऐसी लड़ाई में कूद रहे थे जहां पूरे उन्नीस महीनों तक हम लोगों से कटे हुए और मीडिया द्वारा उपेक्षित किए हुए थे। हम देख रहे थे कि जनता कांग्रेस से नाराज थी। लेकिन हम में से किसी को आशा नहीं थी कि जनता का गुस्सा इतनी प्रचंडता से विस्फोटित होगा।

प्रधानमंत्री श्रीमती गांधी स्वयं रायबरेली से पराजित हो गई। लोकसभा की 267 सीटों में से उत्तर प्रदेश (85), बिहार (54), पश्चिम बंगाल (42), मध्य प्रदेश (40), राजस्थान (25), हरियाणा (10), दिल्ली (7) और हिमाचल प्रदेश (4) में से कांग्रेस पार्टी केवल 5 सीटें पा सकी। इन पांच में से तीन पश्चिम बंगाल और एक-एक राजस्थान तथा मध्य प्रदेश से थी।

आपातकाल ने भयानक तरीके से यह जाहिर किया कि लोकतंत्र के प्रति कांग्रेस की निष्ठा कैसे खोखली है। इन दिनों फोन टेपिंग, सीबीआई और गुप्तचर एजेंसियों का दुरूपयोग सांसदों और दलों के विरूध्द करके कटौती प्रस्तावों पर सरकार गिरने से बचाने सम्बन्धी रहस्योद्धाटन किसी को आश्चर्य में नहीं डालते।

जो पार्टी श्री जयप्रकाश नारायण, श्री मोरारजी देसाई, श्री चन्द्रशेखर और श्री अटल बिहारी वाजपेयी को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा मानकर बगैर मुकदमा चलाए महीनों तक जेल में रख सकती है और जिसके शासन में, शाह आयोग द्वारा इकट्ठे किए गए आंकड़ों के मुताबिक कम से कम 1,10,806 राजनीतिक कार्यकताओं को आपातस्थिति में मीसा या भारत सुरक्षा कानून (डिफेंस ऑफ इण्डिया रूल्स) के तहत यातनाएं सहनी पड़ी हों, निश्चित ही फिर से उसे उन लोकतांत्रिक कानूनों और परम्पराओं की धज्जियां उड़ाने से कोई गुरेज नहीं होगा जैसाकि वह पहले करती रही है।

लाल कृष्ण आडवाणी
नयी दिल्ली

10 मई, 2010

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