भारत के लिए चेतावनी भरे शब्द

April 30, 2012
print this post

मेरे निजी पुस्तकालय में हाल ही में एक नई ग्लॉसी पिक्चर पुस्तक जुड़ी है- ”100 सिटीज़ ऑफ दि वर्ल्ड: ए जर्नी थ्रु दि मोस्ट फेसिनेटिंग सिटीज़ अराउण्ड दि ग्लोब

 

इस सौ की सूची को मैं देख रहा था तो महाद्वीपानुसार भारत की राजधानी दिल्ली का नाम न देखकर मैं दंग रह गया। एशिया के 20 शहरों की सूची में जिन दो भारतीय शहरों का उल्लेख था वे हैं कोलकाता और मुंबई।

 

copy-of-ruchirभारतीय पाठकों के लिए एक ज्यादा रोचक पुस्तक इस सप्ताह मेरे पुस्तकालय में और जुड़ी है, यह पुस्तक है रूचिर शर्मा की, जो मॉरगन स्टानले निवेश प्रबन्धन के इमर्जिंग मार्केट इक्वटीज़ एण्ड ग्लोबल माक्रो के प्रमुख हैं। ब्रेकआऊट नेशन्स शीर्षक की इस पुस्तक में, न्यूयार्क स्थित लेखक ने लिखा है पिछले दशक में आश्चर्यजनक रूप से विश्व के शानदार उभरते बाजारों की तेजी से वृध्दि अपनी समाप्ति की ओर है। आसान धन और आसान वृध्दि का युग समाप्त हो गया है। विशेष रूप से चीन शीघ्र ही सुस्त पड़ जाएगा, लेकिन जरूरी नहीं कि उसका स्थान ब्राजील, रूस या भारत लेगा, सभी की अपनी कमजोरियां और कठिनाइयां पिछले दशक में बढ़ी हुई अपेक्षाओं और उभरते बाजार उन्माद (मार्केटमेनीअ) में अक्सर उपेक्षित हो जाती हैं।

 

यह पुस्तक घूस-चालित मुद्रास्फीतिऔर क्रोनी कैपिटल्ज़म की उन कमजोरियों और कठिनाइयों को रेखांकित करती है जो भारत की उच्च अपेक्षाओं के लिए अवरोधक हो सकती हैं।

 

यूपीए शासन में सामने आए एक के बाद एक घोटालों की श्रृंखला का संदर्भ देते हुए लेखक लिखते हैं कि जब उन्होंने न्यूजवीक की कॅवर स्टोरी में इनके बारे में लिखा तो उन्हें खेल बिगाड़ने वाला‘ (पार्टी स्पायलर) वर्णित किया गया। उच्चस्तरीय सरकारी अधिकारियों ने शर्मा को बताया इस तरह का क्रोनिज्म विकास के लिए एक सामान्य कदम है। साथ ही उन्नीसवीं शताब्दी के अमेरिका के लुटेरे शक्तिशाली उद्योगपतियों का उदाहरण बताया गया।” ”प्रधानमंत्री सिंह से निजी तौर पर भ्रष्टाचार समस्या के बारे में पूछा गया तो बताते हैं उन्होंने लोगों को बताया कि वे इस बारे में बातें कर भारत की छवि न बिगाड़ें।

 

हमारी समस्याओं से जुड़ा यह विशेष अध्याय यूरोप की उन्नीसवीं शताब्दी के सम्मोहन के साथ भारत के चिर-परिचित जादू शो – दि रोप ट्रिकसे शुरू होता है। उल्लेखनीय है कि इस अध्याय का शीर्षक दिया गया दि ग्रेट इण्डियन होप ट्रिक

 

भारतीय उद्यमियों द्वारा विदेशों में किए जा रहे बढ़ते निवेश का संदर्भ देते हुए, रूचिर शर्मा लिखते हैं: जैसे-जैसे उभरते राष्ट्रों की कम्पनियां विदेशों में अपने हितों के विस्तार की शुरूआत करती हैं, जो इसे सामान्यतया समूचे देश द्वारा एक बड़े कदम के रूप में माना जाता है। लेकिन भारत में यह कदम बताता है कि अनेक कम्पनियां जो विदेशों में जा रही हैं वे देश के बाजार में व्यापार करने की बाधाओं को टालने के उद्देश्य से जा रही हैं: दिल्ली और मुंबई में व्यवसायी कड़वाहट से भारत में नया व्यवसाय शुरू करने की कीमतों में व्यापक बढ़ोत्तरी की शिकायत कर रहे हैं जोकि समय के साथ सरकार को चढ़ावे में हुई बेतहाशा वृध्दि के फलस्वरूप हुई है। भारतीय व्यवसायियों द्वारा किए जाने वाला निवेश सन् 2008 के जीडीपी का 17 प्रतिशत था जो अब 13 प्रतिशत रह गया है।

 

ऐसे समय में जब भारत को जरूरत है कि उसके व्यवसायी देश की 8 से 9 प्रतिशत (विदेशी निवेश कुल अपेक्षित से काफी कम है) वृध्दि दर के लिए उत्साहपूर्वक अपने देश में निवेश करें, वे बाहर की ओर देख रहे हैं। विदेशों में सभी भारतीय कम्पनियों का कारोबार कम्पनियों के कुल मुनाफे में पांच वर्ष के मात्र 2 प्रतिशत की तुलना में आज 10 प्रतिशत है। घरेलू बाजार की संभावनाओं के चलते भारतीय कम्पनियों को विदेशों में विकास के लिए भागने की जरूरत नहीं है। सन् 2010 में प्रत्येक तीसरे भारतीय परिवार की स्थानीय स्तर के अनुसार, एक मध्यमवर्गीय आय 2,000 और 4,200 डॉलर के समान थी, जोकि 2002 से 22 प्रतिशत से ऊपर थी, लेकिन भारत की शीर्ष पचास कम्पनियों की आधी से ज्यादा आय अब बाहरी(outward facing) या निर्यात, वैश्विक जिंस मूल्यों और अंतरराष्ट्रीय अधिग्रहणों पर निर्भर है।

 

हालांकि प्रमुख आर्थिक विचारकों के समूह के साथ अपने संवाद (आज के इण्डियन एक्सप्रेस में प्रकाशित) में रूचिर शर्मा भारत के बारे में ज्यादा आशावादी हैं।

****

इन दिनों विशेष रूप से एक सेक्टर ज्यादा खराब हालत में है, और वह है एयरलाइन्स सेक्टर – आप एयर इण्डिया स्टाफ-पायलट, एयर होस्टेस या किसी अन्य से बात करिए- तो अंतहीन शिकायतें सुनने को मिलेंगी। और यह वही एयरलाइन है जिसमें सांसद बनने के बाद पहली बार जब 1970 में मैंने यात्रा की थी तो पूरी दुनिया में इसकी शानदार प्रतिष्ठा थी। किंगफिशर जैसी प्राइवेट एयरलाइन्स भी गम्भीर संकट का सामना कर रही है।

 

अत: यह जानकर हर्ष हुआ कि हाल ही में बना इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा को विश्व में छठा अच्छा हवाई अड्डा और एक निश्चित विशेषीकृत श्रेणी में दूसरा अच्छा हवाई अड्डा माना गया हैं। यह मूल्यांकन एयरपोर्ट काऊंसिल इंटरनेशनल नाम की विश्वव्यापी संस्था ने किया है जिसके 575 सदस्य 179 देशों में 1633 से ज्यादा हवाई अड्डों का संचालन करते हैं।

 

इस नवनिर्मित हवाई अड्डे जो घरेलू और विदेश जाने वाले यात्रियों द्वारा उपयोग किया जाता है, से गुजरते हुए वहां पर 12 मुद्राओं, जो सूर्य नमस्कार की सर्वविदित क्रियाएं हैं, को अपने में समेटी हुई शिल्प कृति को देखकर मैं अत्यन्त प्रभावित हुआ। यह शिल्पकार जयपुर के आयुष कासलीवाल हैं। जी.एम.आर. के जी. सुब्बाराव, जिन्होंने इसे लगवाने तथा उस कलाकार जिसने इसे बनाया – का हार्दिक अभिनन्दन।

 

इससे मुझे स्मरण आया कि जब मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने प्रदेश के विद्यालयों में सूर्य नमस्कार के व्यापक कार्यक्रम को शुरू किया तो कुछ संकुचित राजनीतिज्ञों ने कैसा बवाल किया था। इस अभ्यास का विरोध करने वालों का कहना था कि राज्य सरकार का कदम सेकुलर विरोधीहै। ऐसा माना जाता है कि इस वर्ष के जनवरी से लेकर अब तक प्रदेश के 6000 विद्यालयों में लाखों से ज्यादा विद्यार्थियों ने सूर्य नमस्कार किया है।

surya-namaskar 

टेलपीस

 

इस ब्लॉग की शुरूआत रूचिर शर्मा की पुस्तक ब्रेकआउट नेशन्स के संदर्भ से हुई है। इस पुस्तक की प्रस्तावना फूहड़ पतनोन्मुखता पर एक कटु टिप्पणी है, जो लगता है यहां के धनाढयों की जीवन शैली को संक्रमित कर रही है। इस शुरूआती पैराग्राफ का नमूना निम्न है:

 

बहुत समय पहले दिल्ली के फार्म हाऊसोंको किसानों ने छोड़ दिया है और यद्यपि उनके नाम अभी भी हैं, इन्हें अब उच्च वर्ग के सप्ताहांत एकांत स्थान (रिट्रीट) के रूप में वर्णित किया जाता है, शहर की सीमाओं पर प्लेग्राऊण्ड जहां बेतरतीब गर्दभरी गलियां गरीब गांवों की हवाएं और अचानक फैले हुए गार्डन और फव्वारों से युक्त ठाठदार बंगले हैं; एक मामले में, मैंने एक ऐसे गार्डन को देखा जहां छोटी रेलनुमा दौड़ रही हैं यह दिल्ली का हैम्पटनहै, जहां शहर की पार्टियों को इवेंट प्लानर्स ऑस्कर नाईट, ब्रॉडवे, लास वेगास, यहां तक कि घर की याद करने वालों के लिए पंजाबी गांव, वहीं की वेशभूषा वाले वेटरों सहित फिर से बना देंगे।

 

सन् 2010 की एक धुधली देर रात को मुझे ऐसी ही एक प्रसिध्द ह्रासोन्मुख जश्न में जाने का मौका मिला, जहां वलेट्स (चाकर) ब्लैक बेन्टलेस और रेड पोर्सिच को संभाल रहे हैं, और मेजबान ने मुझे जापान से मंगाए गए कोबे गोमांस, इटली के कुकरमुत्ते, अजरबैजान से सफेद व्हेल को चखने का निमंत्रण दिया। धड़कते संगीत में बात कर पाना कठिन था, लेकिन मैंने किसी तरह बीस वर्ष की आयु के एक नौजवान-फार्महाऊस के किसी वाशिंदे के पुत्र से गपशप करनी शुरू की, जो अलग ही किस्म का, अपने पिता के एक्सपोर्ट बिजनेस में कार्यरत, तंग काली कमीज, ‘जैलसे जमे बाल वाला था। यह सुनिश्चित करने पर कि मैं न्यूयार्क स्थित निवेशक हूं और यहां निवेश अवसरों की तलाश में आया हूं, उसने कंधे झटकते हुए टिप्पणी की – ठीक है, और पैसा कहां जाएगा?”

 

और पैसा कहां जाएगा?” आधी रात के आसपास मुख्य भोजन लेने से पूर्व मैं पार्टी से निकला, लेकिन उक्त टिप्पणी मेरे साथ थी।

 

लालकृष्ण आडवाणी

नई दिल्ली

30 अप्रैल, 2012

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*