भारत से आजादी हमारा लक्ष्य है : गिलानी

September 5, 2010

पिछले सप्ताह मैंने डिफेंस सर्विसेज वेटरन्स की संगोष्ठी में भाग लिया। इसमें भाग लेने वाले इस पर व्यथित थे कि 1947 से, जब पाकिस्तान ने जम्मू एवं कश्मीर राज्य पर पहला हमला किया था तब से सेना ने भारत के इस अविभाज्य अंग की रक्षा के लिए अधिकतम बलिदान दिए, इसके बावजूद इन दिनों जम्मू एवं कश्मीर के बारे में ने केवल पृथकतावादियों अपितु सरकार के नेताओं द्वारा दिए जाने वाले बयानों में सुरक्षा बलों की जमकर निंदा की जाती है।

 

जनरल एस. के. सिन्हा ने इस संगोष्ठी में मुख्य भाषण दिया। उन्होंने शुरुआत ऐसे की: कश्मीर पिछले 63 वर्षों से नासूर समस्या बनी हुई है। हम केवल यह दावा करते हैं कि कश्मीर भारत का एक अभिन्न अंग है और समाधान वार्ता के माध्यम से होगा। एक राष्ट्र के रुप में हम पानीपत सिनड्रोम से पीड़ित हैं जिसमें रणनीतिक दूरदृष्टि का अभाव, संकटों का सामना न करने की तैयारी और अतीत से सबक न सीखना प्रमुख है।

 

उन्होंने आगे कहा: कश्मीर पर हम एक के बाद एक भूलें और बार-बार स्वयं ही गोल कर रहे हैं।

 

जनरल सिन्हा को यह अद्वितीय विशिष्टता प्राप्त है कि राज्य में सन् 1947 में वह, पाकिस्तान द्वारा कश्मीर में भेजे गए कबाइलियों को मार भगाने के लिए सफदरजंग हवाई अड्डे से नई दिल्ली से कश्मीर भेजे जाने वाले जवानों के युवा मेजर थे, से लेकर 2008 तक उन्होंने जम्मू एवं कश्मीर के राज्यपाल के रुप में अमरनाथ विवाद को सुलझाया- और; अनेकों भूलों के प्रत्यक्षदर्शी रहे।

 

1. शत्रु श्रीनगर के निकट आता जा रहा था। महाराजा हरि सिंह जम्मू भाग गए और भारतीय सहायता पाने की कोशिशों में लगे। उन्होंने विलय समझौते पर हस्ताक्षर किए लेकिन पत्रों के आदान प्रदान में, कश्मीर को विशेष स्थिति दी गई जोकि भारत या पाकिस्तान में किसी रियासत को नहीं मिली थी।

 

2. इसलिए, हमने कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में ले जाने की मुख्य भूल की।

 

3. 14 नवम्बर, 1947 को जब सेना शत्रुओं को खदेड़ रही थी और उरी पहुंच चुकी थी लेकिन उसे मुजफ्फराबाद बढ़ने से रोक कर पुंछ की ओर भेज दिया गया।

 

4. हमने अपना ग्रीष्मकालीन हमला 22 मई 1948 को किया और 1 जून, 1948 तक हमने तिथबाल को मुक्त करा लिया। हम मुजफ्फराबाद के काफी निकट पहुंच गए। यूएन द्वारा भारत और पाकिस्तान से हमले रोकने की अपील के चलते ऑपरेशन रोक दिया गया।

 

5. दिसम्बर, 1948 में लद्दाख और पुंछ में हमारी शानदार विजय के बाद हम पाक अधिकृत कश्मीर को आजाद कराने की पूरी तैयारी में थे कि हम युध्द विराम के लिए राजी हो गए।

 

6. 1965 के युध्द में हमने भारी कीमत चुकाकर जीते, सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हाजीपीर दर्रे को ताशकंद में पाकिस्तान को थाल में सजाकर सौंप दिया।

 

7. 1972 में शिमला में हमें चालाकी से मात दे दी गई और हमने कश्मीर समस्या का समाधान किए बगैर अपनी जीत को लुटा दिया।

 

8. हमारी संसद ने एक सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित कर दोहराया है कि पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर का क्षेत्र भारत का अविभाज्य अंग है। अपने इस अधिकार को जताने के लिए हमने कुछ नहीं किया। यहां तक कि गिलगिट-बाल्टीस्तान में व्यापक असंतोष है, तब भी हमने इन कानूनन भारतीय नागरिकों के साथ अपनी सहानुभूति तक भी व्यक्त नहीं की।

 

9. हम श्रीनगर-मुजफ्फराबाद मार्ग खोलने पर राजी हो गए लेकिन कारगिल-स्कूर्दू को खुलवा नहीं पाए।

 

10. प्रेस की आजादी के नाम पर हमने घाटी की प्रेस को लगातार भारत-विरोधी मिथ्या प्रचार करने की अनुमति दे रखी है। देशद्रोह का कानून कश्मीर में लागू नहीं दिखता।

 

जनरल सिन्हा के मुताबिक हमारी भूलों की सूची अंतहीन है।

 

राज्य से बाहर के अनेक लोगों को राज्य की विविध जनसांख्यिकी का पता नहीं है। सामान्यतया जिन कश्मीरी मुस्लिमों से पृथकतावादी भावनाएं और पृथकतावादी हिंसा जोड़कर देखी जाती है, राज्य में वे अल्पसंख्यक हैं। हिन्दू, सिख, बौध्द और गैर कश्मीरी मुस्लिम जैसे गुर्जर, बकरवाल और कारगिल शिया करीब राज्य की जनसंख्या का 60 प्रतिशत हैं। वे भारत विरोधी भावनाओं के साथ नहीं हैं।

 

ज्यादा आश्चर्य नहीं है कि कुछ वर्ष पूर्व, पाकिस्तान समर्थक एक चिरपरिचित  अंग्रेज लार्ड एवेब्युरी द्वारा कराए गए जनमत सर्वेक्षण में उन्होंने पाया कि मात्र 6 प्रतिशत कश्मीरी पाकिस्तान के साथ जाना चाहते हैं, 61 प्रतिशत भारत के साथ ही रहने के पक्षधर हैं तथा 33 प्रतिशत अनिर्णय की स्थिति में है।

 

मई, 2010 में किंग कॉलेज ऑफ लण्डन यूनिवर्सिटी में लीबिया के कर्नल गद्दाफी के पुत्र द्वारा कश्मीर में कराए गए ऐसे सर्वेक्षण के मुताबिक मात्र 2 प्रतिशत कश्मीर के लोग ही पाकिस्तान के साथ जाना चाहते हैं।

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पिछले पखवाड़े, संसद के मानसून सत्र के दौरान लोक सभा में जम्मू एवं कश्मीर की स्थिति पर पूरे दिन बहस हुई। मैंने अपने पिछले ब्लॉग में उल्लेख किया था कि इस बहस में डा. मुरली मनोहर जोशी ने उल्लेखनीय योगदान दिया। गृहमत्री पी. चिदम्बरम अगले दिन इसका जवाब देने वाले थे: लेकिन दिनों के बाद दिन बीत जाने के बाद भी सदन की कार्यसूची में इस अधूरी बहस का कोई उल्लेख नहीं आया। जब कि अफवाहें गर्म रहीं कि राजनीतिक समाधान की आड़ में कुछ रियायतों का पैकेज दिए जाने की तैयारी चल रही है। सत्र के अंतिम दिन डा0 जोशी ने यह मु्द्दा उठाया कि क्यों गृहमंत्री इस महत्वपूर्ण बहस का जबाब देने से कतरा रहे हैं।

 

इस मुद्दे पर मचे हंगामे पर संसदीय कार्यमंत्री ने कहा कि वे, गृहमंत्री से जोकि दूसरे सदन में हैं, से पता करेंगे कि क्या वे इस सदन में आ सकते हैं, लेकिन गृहमंत्री नहीं आए, तथा सदन शाम को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो गया। सरकार द्वारा संसद को यह बताये बगैर कि उसने आजादी चाहने वालों के लिए किस किस्म का पैकेज तैयार किया है।

 

पिछले सप्ताह श्रीनगर में एक संवाददाता सम्मेलन में हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के प्रमुख सैयद अली शाह गिलानी ने साफ कहा कि विरोधके साधन समय-समय पर बदल सकते हैं मगर लक्ष्य एक ही है यानी भारतीय शासन से आजादी।

 

गिलानी ने घाठी में फैली अराजकता को जन्म देने वाले वर्तमान आंदोलन पर पांच न्यूनतम पूर्व शर्तो पर ही पुनर्विचार करने की बात की ।

 

1-  भारत को यह स्वीकार करना चाहिए कि जम्मू एवं कश्मीर एक विवादास्पद क्षेत्र है।

2-  विसैन्यीकरण शुरु करें; आर्म्ड र्फोसेस स्पेशल पॉवर एक्ट रद्द करें।

3-  प्रधानमंत्री गारण्टी दें कि अब कोई पुलिस फायरिंग नहीं होगी और न ही गिरफ्तारी।

4-  संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने फांसी की सजा दी है सहित सभी राजनीतिकबंदियो को अवश्य रिहा किया जाए।

5-  पृथकतावादियों के विरुध्द कार्रवाई करने वाले सुरक्षाकर्मियों और पुलिसकर्मियों को दण्डित किया जाए।

 

कश्मीर में पृथकतावादियों का नेतृत्व हुर्रियत कॉन्फ्रेंस कर रही है, लेकिन इन दिनों उग्र पत्थरबाजी वाले आंदोलन को हुर्रियत के बजाय पी0डी0पी से ज्यादा शक्ति मिल रही हैं।

 

और जहां तक हुर्रियत के प्रमुख का सवाल है, उनके अतीत के बारे में यह तथ्य बताते हैं कि वे किस किस्म के व्यक्ति हैं।

 

सन् 2002 में सैयद अली शाह गिलानी रांची जेल में गंभीर रुप से बीमार हो गये थे। सरकारी विमान से उन्हे उपचार के लिए मुबई भेजा गया। वहां पर एक डॉक्टर जो संयोग से कश्मीरी पंडित थेडा. समीर कौल ने उनकी कठिन सर्जरी की और उनकी जान बचाई।

 

 2007 में लिवर में कैंसर से पीड़ित गिलानी का इलाज किया गया। वह इलाज के लिए अमेरिका जाना चाहते थे, लेकिन आतंकवादियों से संबंधों के चलते अमेरिका ने उन्हें वीजा नहीं दिया। वह पाकिस्तान नहीं जाना चाहते थे। उन्होंने फिर से मुंबई जाना बेहतर समझा और वहां डाक्टरों ने उनका ऑपरेशन कर जान बचाई।

 

श्रीनगर लौटने पर उनके समर्थकों ने उनका स्वागत् कार्यक्रम आयोजित किया। इसमें उन्होंने कहा कि कश्मीर भारत के अवैध कब्जे में है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से भारत के विरुध्द आर्थिक प्रतिबंध लगाने का आग्रह किया। 

 

लाल कृष्ण आडवाणी

नई दिल्ली

4, सितम्बर 2010

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