भ्रष्टाचार का मुद्दा परिवर्तन का उत्प्रेरक बन सकता है

February 21, 2011

finalभारत को स्वतंत्र हुए अब छ: दशक से ज्यादा हो गए। पहले तीन दशकों में कांग्रेस पार्टी का प्रभुत्व राजनीतिक परिदृश्य पर विशालकाय की भांति छाया रहा। अनेक राज्यों में यह सत्ता में थी। लोकसभा में, गैर -कांग्रेस दल इतनी संख्या नही जुटा पाए थे कि उन्हें मान्यता प्राप्त विपक्ष का पद मिलता और इसके नेता, नेता विपक्ष बन पाते।

 

सत्तार के दशक के मध्य में गुजरात में भ्रष्टाचार के विरुध्द एक सशक्त विद्यार्थी आंदोलन उभरा। इससे प्रेरित होकर जयप्रकाशजी ने भी बिहार में भ्रष्टाचार के विरुध्द विद्यार्थियों को जुटाया। इसी अभियान ने जे0पी0 को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के करीब लाया  और उसके माध्यम से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के। इसके अलावा चुनाव सुधारों में उनकी रुचि के चलते मैं उनसे अलग से मिलता रहता था। उन दिनों वह दोहराते थे कि सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार की जड़ें कांग्रेस सरकारों के अपने भ्रष्टाचार में है। जब तक विपक्षी दल विभाजित रहेंगे तब तक इस बुराई का मुकाबला असरदार ढंग से नहीं किया जा सकेगा।

 

अत: भ्रष्टाचार के विरुध्द जे0पी0 आंदोलन जनसंघ, काग्रेस (ओ), समाजवादी पार्टी, और भारतीय लोकदल को एक साथ लाया। अतत: इन दलों ने कांग्रेस के अजेय गढ़ गुजरात में  जनता मोर्चे के रुप में महत्वपूर्ण विजय प्राप्त की।

 

गुजरात का निर्णय 12 जून, 1975 को घोषित हुआ। ठीक उसी दिन इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने रायबरेली से लोकसभा के लिए चुनी गई प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का चुनाव अवैध घोषित करते हुए भ्रष्ट चुनाव साधनों के आधार पर आगामी वर्षों के लिए चुनाव लड़ने हेतु अयोग्य करार दे दिया। 12 जून को घटित इन दोनों घटनाओं ने आपातकाल, एक लाख से ज्यादा लोगों को बंदी बनाने, प्रेस पर सेंसरशिप इत्यादि जैसी घटनाओं को जन्म दिया जिसकी समाप्ति मार्च 1977 में लोकसभा चुनाव से हुई जब कांग्रेस बुरी तरह पराजित हुई और श्री मोरारजी भाई के नेतृत्व में पहली गैर कांग्रेसी सरकार गठित हुई। नवगठित जनता पार्टी में जनसंघ का विलय हुआ और वह इस सरकार का एक घटक था। आज की द्विधु्रवीय राजनीति के बीज उसी समय पड़ हो गए थे।अत: इससे स्पष्ट होता है कि हमारे राजनीतिक इतिहास में निर्णायक मोड़ का पहला उत्प्रेरक भ्रष्टाचार था।

 

इसलिए यदि  हमारे संविधान के अंगीकृत किए जाने के 6 दशक पश्चात दूसरी बार यदि भ्रष्टाचार परिवर्तन का मुख्य उत्प्रेरक बनने जा रहा है, तो किसी को भी आश्चर्य नहीं होगा।

 

जब सन् 2011 प्रारम्भ हुआ तो मैंने टिप्पणी की थी कि हाल ही में समाप्त हुआ वर्ष घपलों और घोटालो का वर्ष था। वास्तव में लोकसभा के शीतकालीन सत्र के पहले दिन ही भाजपा के नेतृत्व में समूचे विपक्ष ने तीन घोटाले – राष्ट्रमंडल खेल घोटाला, 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला और मुंबई की रक्षा भूमि घोटाले को उठाने का निर्णय किया।  

 

यदि पहले दिन ही विपक्ष को उसकी बात कहने दी जाती तो उस दिन से बना गतिरोध जो पूरे सत्र में बना रहा, शायद नहीं होता। विपक्ष का गुस्सा इससे भड़का कि सत्ताधारी पक्ष ने सामूहिक रुप से विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज को बोलने नहीं दिया। शीघ्र ही, अधिकांश विपक्षी दलों का यह मत बना कि जब तक सरकार इन घोटालों की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति बनाने को तैयार नहीं होती और दोषियों को दण्डित नहीं किया जाता तब तक संसद में और कोई काम नहीं होगा।

 

सरकार और स्पीकर द्वारा आहूत अनेक बैठकें इस गतिरोध का समाधान करने में असफल रहीं। हालांकि ज्यों ही बजट सत्र नजदीक आने लगा और विपक्ष के साथ सरकार की बैठकें हुई, उससे यह अहसास हुआ कि इन परिस्थितयों में जे0पी0सी0 का गठन एक सही कदम होगा। गत् सप्ताह कुछ  प्रमुख पत्रकारों के साथ प्रधानमंत्री का संवाद निराशाजनक रहा। इसमें भ्रष्टाचार पर चिंता कम और नकली गठबंधनीय दवाबों के बारे में ज्यादा जोर दिया गया। 

 

वास्तव में भाजपा इस तथ्य के प्रति सचेत है कि दूसरे दलों के गठबंधन में नीतिगत मामलों में अवरोधी प्रभाव रहता है। पिछले सप्ताह हैदराबाद की एन0डी00 रैली में, मैंने बताया कि वाजपेयी जी के नेतृत्व वाली सरकार की उपलब्धियों में से तीन नए राज्यों – उत्तारांचल, छत्तासगढ, और झारखंड के सहज निर्माण को मैं विशिष्ट उपलब्धि मानता हूं। यदि हमारे गठबंधन की सहयोगी तेलगुदेशम  पार्टी राजी होती तो हम काफी आसानी से तेलंगाना राज्य भी बना सकते थे लेकिन हमारे गठबंधन धर्म ने इसकी अनुमति नही दी। लेकिन न तो वाजपेयी सरकार और न ही राज्यों में अन्य एन0डी00 सरकारों को गठबंधन धर्म को ईमानदारी या सुशासन का बहाना या आड़ नहीं बनने दिया गया।

 

पिछले महीने दि हिन्दूमें प्रकाशित सीबीआई के पूर्व निदेशक आर.के. राघवन का लेख यूपीए सरकार द्वारा भ्रष्टाचार से निपटने के घोषित किए एक्शन प्लानके प्रति काफी तीखा प्रतीत होता है। उन्होंने इस तथाकथित प्लान को असफलके रूप में वर्णित किया है। लेख का शीर्षक है भ्रष्टाचार के विरूध्द हारती लड़ाई। राघवन  ने सीवीसी थामस को सरकार के गले में पड़ा बोझ (एलबेट्राेंस)के रूप में वर्णित किया है। उन्होंने पूर्व सीवीसी विट्ठल के इस कथन से सहमति प्रकट करते हुए उद्दृत किया है कि भ्रष्टाचार भारत में कम जोखिम और ऊंचे लाभ वाली गतिविधि बन गई है।

 

तथापि मैं, सीबीआई के एक दूसरे पूर्व निदेशक सी.वी. नरसिम्हन, जिनकी ईमानदारी और कुशाग्र बुध्दि को सर्वज्ञ प्रतिष्ठा प्राप्त है, द्वारा रखे गए प्रस्ताव का समर्थन करता हूं।

 

नरसिम्हन ने सुझाया है कि सरकार को सार्वजनिक लोगों के अपराधिक दुर्व्यवहार(criminal misconduct of public men) का कानून बनाना चाहिए। वे कहते हैं कि यह कानून भ्रष्टाचार निवारक कानून, 1988 के तहत आने वाले सभी अपराधों के विरूध्द होगा। इसके तहत राजनीतिज्ञ और नौकरशाह भी आएंगे।

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इसी प्रकार विदेशों के टैक्स हेवन्स में काले धन के मुद्दे को भी पूरी शक्ति से आगे बढ़ाए रखना चाहिए। देश, सर्वाच्च न्यायालय में लम्बित राम जेठमलानी की जनहित याचिका को इसकी तार्किक परिणिति तक पहुंचते देखना चाहता है। आज चुनावी कानून के तहत चुनाव लड़ने वाले प्रत्येक प्रत्याशी को अपनी सम्पत्तियां और देनदारियां बतानी पड़ती हैं। विदेशों में जमा भारतीय धन को भारत वापस लाने के मुद्दे को देखते हुए कानून में यह प्रावधान करना चाहिए कि प्रत्येक प्रत्याशी यह शपथ ले कि उसके पास विदेशों में अघोषित सम्पत्ति नहीं है। कानून में सरकार को यह अधिकार देना चाहिए कि यदि ऐसी सम्पत्ति सरकार को पता चलती है तो वह उसे जब्त कर सके।

 

इसी तरह का प्रावधान सभी मंत्रियों, सांसदों और पार्टी पदाधिकारियों तथा देश के प्रभावशाली वर्ग की विशेष श्रेणी के लोगों पर भी लागू किया जाना चाहिए।

 

राजा के स्पेक्ट्रम घोटाले में सी.ए.जी. द्वारा लगाए गए अनुमान 1 लाख 76 हजार करोड़ रूपए की चपत से देश को हतप्रभ कर दिया है। यदि ग्लोबल फाइनेंशियल इंटीग्रेटि द्वारा विदेशों के टैक्स हेवन्स में ले जाए गए भारतीय धन का मूल्यांकन बीस लाख पिचहत्तर हजार करोड़ रूप्ए लगभग बैठता है तो कल्पना की जा सकती है कि यदि सर्वोच्च न्यायालय सरकार को यह सारा धन वापस लाने को बाध्य कर दे तो भारत की गरीबी को मिटाने पर कितना चमत्कारी प्रभाव हो सकता है!

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प्रधानमंत्री के इंटरव्यू पर सुर्खियां

 

मैं इतना बड़ा अपराधी नहीं हूं जितना बताया जा रहा है : प्रधानमंत्री

(I’m not as big a culprit as being made out to be : PM)

                                                Times News Network

 

मनमोहन का अकेलापन

(THE LONELINESS OF BEING MANMOHAN)

OUTLOOK

 

एक प्रधानमंत्री मीडिया को गपशप के लिए इसलिए नहीं बुलाता क्योंकि उसके प्रधान सचिव ने बताया कि उस सुबह उनका कोई कार्यक्रम नहीं है।

(A PM does not invite media over for a chat because his Principal Secretary has told him that he has nothing scheduled that morning½

INDIA TODAY

 

लालकृष्ण आडवाणी

नई दिल्ली

20 फरवरी, 2011

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