यूपीए सरकार की ढुलमुल पाकिस्तान नीति और देश का अपमान

March 1, 2010

जुलाई, 2001 में जब जनरल मुशर्रफ आगरा शिखर वार्ता से खाली हाथ लौटे तो वह भारत सरकार से काफी खफा थे कि एक तो उन्हें निमंत्रित किया गया और उस पर भी उन्हें खाली हाथ लौटा दिया-यहां तक कि कोई संयुक्त वक्तव्य भी जारी नहीं किया गया जिसमें भारत-पाक शांति के बारे में कुछ अच्छी-अच्छी बातें उल्लिखित होतीं।

उनकी शुरुआती प्रतिक्रिया में ऐसा लगा कि उनका सारा गुस्सा मुझ पर केंद्रित है। यद्यपि, बाद में अपनी संस्मरणात्मक पुस्तक ”इन द लाइन आफ फॉयर” में उन्होंने श्री वाजपेयी को भी नहीं बख्शा। उनकी कटुतापूर्ण टिप्पणी थी:

”एक ओर आदमी होता है और एक ओर समय होता है। जब दोनों मिलते हैं तो इतिहास बनता है। वाजपेयी समय को नहीं पकड़ सके और इस प्रकार उन्होंने इतिहास में अपना अवसर खो दिया।”

उनकी टिप्पणियों को ध्यान में रखकर प्रधानमंत्री श्री वाजपेयी ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इस सारे परिप्रेक्ष्य को को यूं स्पष्ट किया:

”आगरा शिखर वार्ता की विफलता पर जनरल मुशर्रफ की कथित टिप्पणियोंसे मैं हैरान हूं। हमारी सरकार में हर कोई इस तथ्य से अवगत था कि जब तक सीमा पार से आतंकवाद-जो अब तक हजारों निर्दोषों की जान ले चुका है- नहीं रोका जाता तब तक भारत-पाक संबंध सामान्य नहीं हो सकते। परंतु बातचीत के दौरान जनरल मुशर्रफ अपनी इस बात पर अड़े रहे कि जम्मू व कश्मीर में जो हिंसा जारी है, उसे ‘आतंकवाद’ नहीं कहा जा सकता। वह लगातार यही कहते रहे कि राज्य में जो खून-खराबा चल रहा है, वह जनता द्वारा लड़ी जा रही आजादी की लड़ाई के सिवाय और कुछ नहीं है। जनरल मुशर्रफ का यह रवैया भारत के लिए स्वीकार्य नहीं था। और आगरा शिखर वार्ता की विफलता का कारण भी यही था।”

वस्तुत: मेरा मानना है कि सीमापार के आतंकवाद के मुद्दे पर श्री वाजपेयी के दृढ़ रुख ने उन्हें बाद में ऐतिहासिक जीत दिलावाई जब जनवरी 2004 में सार्क सम्मेलन के बाद इस्लामाबाद में जनरल मुशर्रफ ने श्री वाजपेयी के साथ जारी संयुक्त वक्तव्य में, आतंकवाद पर आगरा में अपनाए गए अपने रुख से एकदम उलटी लाइन ली और वाजपेयी को आश्वस्त किया कि वह पाकिस्तान के नियंत्रण वाली किसी भूमि का उपयोग किसी भी रुप में आतंकवाद के समर्थन में नहीं होने देंगे।

आगरा में दिखने वाली असफलता इस्लामाबाद में उल्लेखनीय सफलता के रुप में परिवर्तित होकर सामने आई। इसका श्रेय मुख्यता दृढ़ता को जाता है।

दृढ़ता सम्मान अर्जित करती है जबकि इस समय भारत के ढीले रुख ने सिर्फ अपमान दिलाया है।

हमारी विदेश सचिव ने वार्ता को ‘रचनात्मक’ कहा लेकिन पाकिस्तानी विदेश सचिव ने वार्ता का मजाक उड़ाते हुए कहा कि उनका देश ‘बनावटी बातों’ में विश्वास नहीं करता और न ही यह चाहता है कि भारत पाकिस्तान को यह ‘उपदेश दे’ कि ”ये करो या न करो।”

गत् सप्ताह, इन्दौर में सम्पन्न भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय परिषद में ”राष्ट्रीय सुरक्षा और जम्मू-कश्मीर” प्रस्ताव में कहता है:

”एनडीए की नीति थी वार्ता और आतंकवाद साथ-साथ नहीं चल सकते, जबकि यूपीए के लिए ‘वार्ता और आतंक’ दोनों साथ-साथ चल सकते हैं। हम मानते हैं कि जब आतंक भारत पर मंडरा रहा हो तब वार्ता न करना एक वैधानिक कूटनीतिक विकल्प है।”

विदेश सचिव स्तर की वार्ता के बाद संसद में अपने वक्तव्य में विदेश मंत्री श्री एस. एम. कृष्णा ने बैठक को ‘रचनात्मक और उपयोगी’ निरुपति किया लेकिन 500 शब्दों वाले इस वक्तव्य से सिर्फ एकमात्र नतीजा यह निकलता प्रतीत होता है कि विदेश सचिवों ‘में सम्पर्क बनाए रखने पर सहमति है।’

वस्तुत: मंत्री महोदय के वक्तव्य के अंतिम अनुच्छेद के अर्थ को साफ समझा जा सकता है:

”पाकिस्तान के साथ भारत के संबंध निर्णायक होंगे, क्योंकि मुंबई हमले के बाद ये आतंकवाद पर हमारी मुख्य चिताओं के संबंध में पाकिस्तान के जवाब पर निर्भर करते हैं। जैसाकि प्रधानमंत्री ने कहा है हम किसी भी देश से बातचीत करके आतंकवाद को हटाने के लिए अपने संकल्प अथवा स्थिति से पीछे नहीं हटेंगे। आदान-प्रदान व संपर्क ही आगे बढ़ाने का श्रेष्ठ रास्ता है।”

क्या वार्ता, पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद छोड़ने से जुड़ी हो या दोनों का कोई सम्बन्ध नहीं हो जैसाकि हमारे प्रधानमंत्री ने शरम-अल-शेख में कहा? उस वक्तव्य में कम से कम स्पष्टता थी: लेकिन नवीनतम में सिवाय अंतर्विरोधों और अस्पष्टता के कुछ नहीं है।

जैसाकि मैंने पहले कहा था कि पाकिस्तान से वार्ता के मुद्दे पर भारत सरकार का शीर्षासन वाशिंगटन के दबाव का नतीजा दिखता है।

हालही में ओबामा प्रशासन हमारी इस धारणा को अधिकारिक रुप पुष्ट किया है। असिस्टेंट सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर पब्लिक अफेयर पी.जे. क्राउले ने कहा; ”ओबामा प्रशासन काफी समय से दोनों देशों के बीच वार्ता पुन: शुरु कराने को प्रोत्साहित करता रहा है। यह पाकिस्तान व भारत के लिए महत्वपूर्ण कदम है और हम दोनों देशों के राजनीतिक नेतृत्व की सराहना करते हैं।”

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यू.एस. डायरेक्टर ऑफ नेशनल इंटेलीजेंस डेनिस सी. ब्लेयर ने 2 फरवरी, 2010 को इंटेलीजेंस सम्बन्धी सलेक्ट कमेटी के सम्मुख 46 पृष्ठीय इंटेलीजेंस रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें उन्होंने माना है कि अमेरिका के आतंकवाद विरोधी अभियानों में पाकिस्तान का सहयोग सिर्फ उन संगठनों के विरुध्द कार्रवाई तक सीमित है जिन्हें इस्लामाबाद पाकिस्तान के विरुध्द मानता है।

ब्लेयर कहते हैं:

”इस्लामाबाद ने उन आतंकवादियों से निपटने में दृढ़ता और हिम्मत दिखाई है जिनको वह पाकिस्तान के हितों के विरुध्द मानता है। हालांकि वह अभी तक यह मानता है कि जिन समूहों से उसे खतरा नहीं है, उनसे उलझने की जरुरत नहीं, और तालिबान को ऐतिहासिक समर्थन देना जारी रखे हुए है।”

डेनिस ब्लेयर आगे जोड़ते हैं :

”इस्लामाबाद का यह मानना कि भारत के सैन्य और आर्थिक बढ़त का मुकाबला करने हेतु आतंकवादी गुट उसके रणनीतिक हथियारों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, आतंकवाद के विरुध्द पाकिस्तान के प्रयासों को सीमित करते रहेंगे।”

यह रिपोर्ट साफ करती है कि यदि अंतरराष्ट्रीय समुदाय आतंकवाद को परास्त करने हेतु तत्पर है तो उसे न केवल पाकिस्तान को उसके आतंकवादी ढांचे को समाप्त करने को बाध्य करना पड़ेगा अपितु भारत के विरुध्द आतंकवादी संगठनों के प्रयोग को भी रुकवाना पड़ेगा और इन संगठनों पर औपचारिक प्रतिबंध लगाने पड़ेंगे, जैसाकि जनरल मुशर्रफ के सन् 2004 के सार्वजनिक वक्तव्य में कहा गया था।

लाल कृष्ण आडवाणी
नयी दिल्ली

दिनांक: मार्च 01, 2010

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