यू.पी.ए. सरकार की विश्वसनीयता तार-तार हुई

March 13, 2011

लगभग दो दशक पूर्व कोलकाता से प्रकाशित टेलीग्राफ ने मेरा एक लम्बा इंटरव्यू प्रकाशित किया था। उस समय मैं भाजपा का अध्यक्ष था। इंटरव्यू लिया था उनकी विशेष संवाददाता मानिनी चटर्जी ने। आज वह इसी समाचार पत्र की करंट अफेयर्स की सम्पादक हैं।

 

उस इंटरव्यू के दौरान मानिनी ने मुझसे एक असामान्य सा प्रश्न पूछा कि एैसा कौन सा शब्द है जो आपके जीवन में आपको सबसे ज्यादा अपील करता है?’ मेरा उत्तार था विश्वसनीयता (क्रेडिबिलटी)। आज मैं जो भी हूं और जो कुछ भी मैं अपने देश के लिए और अपनी पार्टी के लिए कर पाया हूं, वह है जीवन में अर्जित विश्वसनीयता के चलते।

 

27 और 28 दिसम्बर, 1992 को इण्डियन एक्सप्रेस में दो किश्तों में प्रकाशित लेख में मैंने अयोध्या आंदोलन की उत्पत्ति और मूल्यांकन का वर्णन किया था और इसी में मैंने 6 दिसम्बर, 1992 जिस दिन अयोध्या में विवादास्पद ढांचा गिरा था को मैंने अपने जीवन का सर्वाधिक दुखद: दिनवर्णित किया था।

 

मेरे इस वक्तव्य के लिए मेरे कुछ सहयोगियों ने आलोचना करते हुए कहा था इस घटनाक्रम के लिए आप इतने क्षमायाचक क्यों बने हो ? ”मेरी प्रतिक्रिया थीमैं इस पर क्षमायाचक नहीं हूं। वस्तुत: अयोध्या आंदोलन से जुड़े होने पर मुझे गर्व है। लेकिन मैं इसलिए उदास हूं कि 6 दिसम्बर की घटनाओं से हमारी पार्टी की विश्वसनीयता पर बुरी तरह से बट्टा लगा है।

 

मैंने अपने लेख में लिखा था: मुझे इसलिए दु:ख हो रहा है कि एक सुविचारित ढंग से तैयार की गई कार्ययोजना, जिसके तहत  यू.पी. सरकार किसी कानून का उल्लंघन किए बगैर या किसी भी कोर्ट के आदेश के प्रति अनादार दिखाते हुए, मंदिर निर्माण के प्रति अपने जनादेश को पूरा करने की ओर बढ़ रही थी, विफल हो गई (ढहने के कारण)। यदि इस कार्रवाई की अपेक्षा होती और इसे पूर्णतया अनजाने ढंग से टाल दिया गया होता तो इसमें संलग्न संगठन की यह गलती निकाली जा सकती कि वह आंदोलन में भाग लेने वाले लोगों की अधीरता को भांपने में असफल रहा, लेकिन उस दिन जो घटा उसके लिए निश्चित रुप से उसे जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

***

गत् वीरवार को राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त के रुप में पी.जे. थॉमस की नियुक्ति आदेश को आधिकारिक रुप से रद्द कर दिया। शायद राष्ट्रपति को यह कदम इसालिए उठाना पड़ा कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सी.वी.सी की नियुक्ति को रद्द करने और थॉमस की नियुक्ति के उनके आदेश को कानून की परिभाषा में non-estठहरा देने के बावजूद यह महोदय अपना पद छोड़ने को तैयार नहीं थे।

 

किसी भी व्यक्ति अथवा संगठन के लिए सर्वाधिेक महत्वपूर्ण तत्व विश्वसनीयताको रेखांकित करने के बाद मैं यह कहना चाहूंगा कि आज मनमोहन सिंह सरकार की विश्वसनीयतासमाप्त हो चुकी है।

thomas 

इण्डिया टुडेके नवीनतम अंक में भावना विज आरोरा द्वारा क्रेडिबिलटी क्रेशशीर्षक से प्रकाशित एक विश्लेषण प्रकाशित हुआ है, जिसमें भावना लिखती है: 

   

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 3 मार्च को केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त (सीवीसी) पी.जे. थॉमस की नियुक्ति को रद्द कर देने का आदेश सरकारी मनमानीमाना गया। यह उस व्यक्ति के बजाय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और गृहमंत्री पी. चिदम्बरम की आलोचना अधिक है। यह आदेश सरकार के लिए सबसे बड़ा धक्का है जो सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बार-बार की जा रही निंदा और सवालों के बावजूद थॉमस का बचाव कर रही थी। दागी सीवीसी से छुटकारा पाने में पूर्णतया असहाय दिखती, सत्ता के गलियारों में यह चर्चा थी कि थॉमस 10 जनपथ से शक्ति पा रहे हैं और कोई भी उनका कुछ नहीं कर सकता। अंतत:, सर्वोच्च न्यायालय ने वह किया जो सरकार को करना चाहिए था।

 

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एस.एच. कपाड़िया की पीठ ने इसकी जिम्मेदारी प्रधानमंत्री के द्वार पर सीधे रख दी जिन्होंने चिदम्बरम और विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज वाली तीन सदस्यीय उच्चाधिकार समिति की अध्यक्षता की थी। चिदम्बरम थॉमस का बचाव कमजोर आधारों पर कर रहे थे और स्वराज पर भी कटाक्ष कर रहे थे, जिन्होंने इस नियुक्ति का विरोध किया था। वह बार-बार एक ऐसे व्यक्ति की अनुपयुक्त नियुक्ति पर आपत्ति उठा रही थीं जो एक भ्रष्टाचार के केस में आरोपी है और उसे देश के भ्रष्टाचार-विरोधी तंत्र का प्रमुख बनाया जा रहा था जो सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय जैसी जांच एजेंसियों के कामकाज पर निगरानी रखता है।

 

इण्डिया टूडेबिल्कुल सही है जब वह यह कहता है कि सी.वी.सी. के सम्बन्ध में सर्वोच्च न्यायालय को जो करना पड़ा है वह सरकार को करना चाहिए था। हालांकि ज्यादा बड़ी त्रासदी यह है कि गलतियों को पहले ही रोकने के मामले में घोटालेबाज सरकार द्वारा अपनी जिम्मेदारी को पूरी तरह से तिलांजलि दे दी गई।

 

अत: चाहे थॉमस का केस हो या राजा का, हसन अली या राष्ट्रमण्डल खेल अधिकारियों का, सरकार के बजाय सर्वोच्च न्यायालय को ही बार-बार कदम उठाने पडे। यह इस तथ्य को दर्शाता है कि यू.पी.ए. सरकार में शासन के अभाव (governance deficit) से ज्यादा नैतिकता का अभाव (ethical deficit)  ज्यादा गंभीर है।

 

पिछले सप्ताह शनिवार (12 मार्च) को आई.आई.टी. दिल्ली एल्युमनी एसोसिएशन की ओर से आयोजित एक सम्मेलन में मुझे बुलाया गया। सम्मेलन का विषय चुना गया था – गवर्निंग इण्डिया – द राइट वे(Governing India – The Right Way)

 

एसोसिएशन के अध्यक्ष श्री शशि मुंजाल द्वारा मुझे भेजा गया निमंत्रण इस प्रकार था:

 

वर्ष 2010 को घोटाले के वर्षकी कुख्यात विशेषता से नवाजा जा रहा है। राष्ट्रमण्डल खेलों से 2जी लासेंसिंग, देश के जीएनपी के बराबर स्विस खातों में रखी गई भारतीयों के धन के बारे में रहस्योद्धाटन, विसंगतियों की भयावहता ने सभी को हतोत्साहित कर दिया है। इस सभी का एक पंक्ति का उत्तर है सरकार में सुधार।

 

मैंने एसोसिएशन की इस पहल के लिए बधाई दी और उन्हें बताया: आप सभी अपने व्यवसाय और पेशे में सफलतापूर्वक सक्रिय हैं। सामान्य परिस्थितियों में आप जैसे लोग राजनीति और सरकार के मामलों में ज्यादा रूचि रखने वाले नहीं माने जाते। लेकिन इस सम्मेलन ने प्रदर्शित किया है कि आप भी रूचि रखते हैं। मैं इसे शिक्षित भारतीयों में बढ़ती इस प्रवृति का संकेतक मानता हूं जो वर्तमान में देश की हालातों के प्रति चिंतित हैं और इसे ठीक करने के लिए कुछ करना चाहते हैं।निमंत्रण में उल्लिखित भ्रष्टाचार का संदर्भ देते हुए मैंने कहा: यदि वर्ष 2010 घोटालों का वर्ष था, आईए हम 2011 को जवाबदेही का वर्षबनाने में जुटें।

 

लालकृष्ण आडवाणी

नई दिल्ली

13 मार्च, 2011

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