स्वामी रंगनाथानंद के श्रीचरणों में

March 2, 2009

मित्रो, मेरी उद्धाटन पोस्ट पर दी गई उत्साहजनक प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद।

मैं सोच रहा था कि आज मैं आप लोगों के समक्ष कौन-से विचार रखूं क्योंकि आपके साथ बांटने के लिए मेरे पास बहुत से विचार हैं। 15वीं लोकसभा के लिए चुनाव काफी नजदीक आ गए हैं। स्वाभाविक है कि मेरा अधिकांश संवाद राजनैतिक और चुनावी होगा। फिर भी, मैं यह मानता हूं कि राजनीति हमारे राष्ट्रीय जीवन का अंतिम परिणाम नहीं है बल्कि राजनीति सार्वजनिक जीवन में हर कहीं तभी सार्थक तथा परिपूर्ण होती है जब वह भारत की आध्यात्मिक परम्परा में निहित मूल आदर्शों तथा उच्च मूल्यों द्वारा निर्देशित हो। ऐसा बहुत कुछ है जिसे राजनीतिज्ञ तथा अन्य व्यवसायों से जुड़े लोगों को भारत के आध्यात्मिक गुरूओं-प्राचीन तथा आधुनिक – से सीखना होगा।

कुछ दिन पहले एक नई पुस्तक मेरी मेज पर रखी हुई थी-‘द मॉन्क विदआउट फ्रंटियर्स-रेमिनीसेंसिज ऑंफ स्वामी रंगनाथानन्द’। यह रामकृष्ण मिशन का नवीनतम प्रकाशन है और स्वामीजी की जन्मशती (2008) पर उनको श्रध्दाजंलि देने के लिए प्रकाशित की गई है। स्वामी रंगनाथानन्द, जैसाकि मैंने अपनी आत्म-कथा (”मेरा देश मेरा जीवन” जिसे पिछले वर्ष रूपा एंड कम्पनी द्वारा प्रकाशित किया गया है) में लिखा है ”हमारे समय के भारतीय समाज में सर्वाधिक चमकते हुए आध्यात्मिक पुंज थे।” मुझे यह देखकर बहुत खुशी हुई थी कि इस पुस्तक में मेरी आत्म-कथा से एक अंश उध्दृत किया गया है जो मैंने कराची, जहां मैंने अपने जीवन के पहले बीस साल (1927-47) बिताए थे, में इस पवित्र आत्मा के साथ अपने घनिष्ठ साहचर्य के विषय में लिखे हैं। इस पुस्तक में मेरे एक भाषण से एक संक्षिप्त उध्दृरण भी दिया गया है जो मैंने 15 मई, 2005 को रामकृष्ण मिशन, नई दिल्ली में एक स्मृति सभा में दिया था। प्रधानमंत्री डा0 मनमोहन सिंह तथा पूर्व प्रधानमंत्री श्री इन्द्रकुमार गुजराल भी स्वामी जी जिनका 26 अप्रैल 2005 को देहावसान हो गया था, को श्रध्दांजलि देने के लिए इस अवसर पर उपस्थित थे।

इन उध्दरणों को देखकर, मैंने सोचा कि मुझे अपने अनुभव और विचार अपने ब्लॉग पर आपके साथ बांटने चाहिए। कृपया आप अपनी टिप्पणी/प्रतिक्रिया से मुझे अवगत कराएं।

कराची में अपने जीवन के अंतिम तीन वर्षों में एक और परिवर्तनकारी प्रभाव मेरे जीवन में आया। ‘भगवद्गीता’ पर स्वामी रंगनाथानंद के प्रवचन सुनने के लिए मैं हर रविवार की शाम को रामकृष्ण मिशन जाने लगा। मैं स्वामीजी के व्यक्तित्व से जितना प्रभावित था, महाभारत के युध्द के मैदान में, स्पष्ट और आधिकारिक भाषा में, योध्दा अर्जुन से भगवान् श्रीकृष्ण के सम्मोहक दार्शनिक संवाद की, उनके द्वारा की गई व्याख्या से भी उतना ही मंत्रमुग्ध हो जाता था।

स्वामीजी उस समय कराची, जहाँ पर उन्होंने छह वर्ष तक रामकृष्ण परमहंस और उनके शिष्य स्वामी विवेकानंद की शिक्षाओं का प्रचार किया, में रामकृष्ण मिशन के प्रमुख थे। वे कई वर्ष तक सुदूर बर्मा (अब म्याँमार) स्थित रामकृष्ण मिशन की सेवा करने के बाद कराची आए थे। वे केरल के रहनेवाले थे। स्वामीजी, जिन्होंने बहुत छोटी आयु से ही सत्य की खोज और मानव-सेवा का मार्ग अपना लिया था, बडे सादगीपूर्ण और मिलनसार व्यक्ति थे। कुछ ही दिनों में उन्हें मुझसे गहरा स्नेह हो गया। देखते-ही-देखते उनका समर्पित, लक्ष्योन्मुख और बौध्दिक रूप से विशाल व्यक्तित्व से मैं आकर्षित हो गया।

मैंने स्वयं से कहा, ‘मुझे भी इन जैसे ही गुण विकसित करने चाहिए।’

कराची में रामकृष्ण मिशन

आरंभ में गीता प्रवचन के श्रोताओं की संख्या कमलगभग 50 से 100 के बीचथी। लेकिन यह संख्या सप्ताह-दर-सप्ताह बढ़ते हुए जल्दी ही 1,000 हो गई। चूँकि आश्रम मुस्लिम बस्ती में स्थित था, कुछ मुसलमानों, ईसाई और पारसियोंजिनमें जमशेद नसरवानजी मेहता, जो कराची के पूर्व मेयर थे, ने भी भाग लेना शुरू कर दिया। आश्रम स्वैच्छिक सामाजिक सेवा का एक स्थल बन गया, जिसमें मैंने भी अपना योगदान दिया। मुझे 1943 में बंगाल में पड़े अकाल की याद आती है, जिसमें लाखों लोगों की जानें अंग्रेजों की युध्दकाल की नीति के कारण चली गईं। स्वामीजी ने एक अपील जारी कर अकालग्रस्त लोगों के लिए भोजन तथा अन्य राहत सामग्री की व्यवस्था की। इसकी उदार प्रतिक्रिया रही और जल्दी ही लगभग 5 लाख रुपए इकट्ठा हो गए। स्वामीजी ने उन रुपयों से चावल खरीदे और सिंध सरकार से अनुरोध किया कि उन्हें स्टीमर के द्वारा श्रीलंका से होते हुए बंगाल भेजने की अनुमति दी जाए। एक अधिकारी ने उन्हें बताया, ‘आपको अपनी बारी की प्रतीक्षा करनी होगी। मुस्लिम लीग भी इसी उद्देश्य से एक्सपोर्ट परमिट चाहती है। हम उनका कोटा खत्म होने के बाद आपको कोटा देंगे।’ कुछ सप्ताह बाद अधिकारी ने स्वामीजी को बताया, ‘मुस्लिम लीग ने केवल 6 टन चावल भेजा है, शेष कोटा आपका है।’ आश्रम ने 1,240 टन चावल भेजा।

स्वामीजी कई विशिष्ट हस्तियों को आश्रम का दौरा करने के लिए आमंत्रित करते थे। मुझे डॉ. एस. राधाकृष्णन* की एक यादगार यात्रा का स्मरण आता है, जो एक महान् दार्शनिक थे। वे अक्तूबर 1945 में बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (बी.एच.यू.) के कुलपति थे। उन्होंने दो व्याख्यान दिएएक आश्रम में और दूसरी डी.जे. सिंध कॉलेज में; दोनों में ही बड़ी संख्या में भीड़ जुटी। डॉ. राधाकृष्णन ने स्वामीजी से अनुरोध किया कि वे बी.एच.यू. के लिए कुछ चंदा एकत्रित करें। कराची के निवासियों ने उन्हें 50 हजार रुपए दिए, जो उन दिनों बहुत बड़ी धनराशि थी।

* डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन (1888-1975) अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त भारत के बीसवीं शताब्दी के एक महान् दार्शनिक और शिक्षाविद् थे। वे भारत के पहले उपराष्ट्रपति (1952-62) और भारत के दूसरे राष्ट्रपति (1962-67) थे।

मैंने सितंबर 1947 में कराची छोड़ दिया था, जबकि स्वामीजी कुछ महीने और उस समय तक वहाँ और रहे, जब उस शहर में रामकृष्ण मिशन की गतिविधियाँ चलाना असंभव हो गया। भरे मन से उन्होंने मिशन बंद कर दिया और सन् 1948 के आरंभ में कराची छोड़ दिया। उनसे मेरी संबध्दता अट्ठानबे वर्ष की आयु में फरवरी 2005 मेंलगभग उनके निधन तकजारी रही। ’60 के दशक में जब वे दिल्ली में रामकृष्ण मिशन के प्रमुख थे और उस अवधि में भी, जब उसके बाद लंबे समय तक वे हैदराबाद में मिशन के प्रमुख रहे, मैं उनसे नियमित रूप से मिलता रहा। उनसे मेरी आखिरी मुलाकात वर्ष 2003 में हुई थी, जब मैं किसी समारोह में भाग लेने के लिए कोलकाता गया था और स्वामीजी रामकृष्ण मिशन के अखिल भारतीय अध्यक्ष बनने के बाद शहर में मिशन के मुख्यालय बेलूर मठ में रह रहे थे।

इस आखिरी मुलाकात में हमारी बातचीत कराची में बिताए समय, विभाजन से उत्पन्न हुए दु:खद घटनाक्रम और मोहम्मद अली जिन्ना की भूमिका पर केंद्रित रही। स्वामीजी ने विशेष रूप से मेरा ध्यान 11 अगस्त, 1947 को पाकिस्तान की कांस्टिटुएंट असेंबली में जिन्ना के ऐतिहासिक भाषण की ओर दिलाया और कहा, ‘पंथनिरपेक्षता के अर्थ की सही व्याख्या इस भाषण में पाई जा सकती है।’ मई-जून 2005 में जब मैं पाकिस्तान गया था तब जिन्ना पर की गई मेरी अपनी टिप्पणी के पीछे मेरे अवचेतन मन में स्वामीजी के साथ हुई अंतिम बातचीत की एक निर्णायक भूमिका रही।

स्वामी रंगनाथानंद हमारे समय में भारतीय समाज को आलोकित करनेवाले सर्वाधिक तेजस्वी नक्षत्रों में से एक थे। वे एक विराट् आत्मा थे और एक ऐसे व्यक्ति, जिसने अपने जीवन की शुरुआत रामकृष्ण मठ में एक रसोई और बरतन धोनेवाले के रूप में की। उन्नति कर रामकृष्ण और विवेकानंद की शिक्षाओं का भारत और विदेशों में प्रचार करनेवाले सर्वाधिक श्रध्देय व्यक्तियों में से एक बने। वे एक परंपरागत आध्यात्मिक उपदेशक नहीं थे। वे व्यक्ति के आत्मज्ञान की खोज में झुकाव नहीं रखते थे। उनका आदर्श वाक्य था’ईश्वरीय उत्साह को मानवीय प्रेम में बदलना।’ उनका आजीवन मिशन था’दुनिया को यह बताना कि उनके सामने आनेवाली बाधाओं के पहाड़ और चुनौतियों का सामना केवल मानवीय मामलों में मूल आध्यात्मिक पुनरुन्मुखता से किया जा सकता है।’

स्वामीजी बोलने और लिखने दोनों में प्रवीण थे। इस भ्रमणशील साधु ने भारत और विश्व भर के शहरों में हजारों व्याख्यान दिए। एक आध्यात्मिक नेता, जोकि पूरी तरह से भौतिक विश्व से अलग था, उनके व्याख्यानों और लेखन में विभिन्न विषय, जिनमें शिक्षकों, प्रशासकों, वैज्ञानिकों और व्यवसायियों की राष्ट्र-निर्माण में क्या भूमिका होनी चाहिए, यह सब समाहित था। उन्होंने विविध पृष्ठभूमियोंवाले राजनीतिक व सामाजिक नेताओं से भी परिचर्चाएँ कीं और उन सभी पर सकारात्मक प्रभाव छोड़ा। उनके द्वारा चार अंकों में लिखी गई पुस्तक ‘एटरनल वैल्यूज फॉर ए चेंजिंग सोसाइटी’ में उन्होंने सभी धर्मों की शिक्षाओं का वर्णन किया है।

मैंने हाल ही में स्वामीजी का ‘भगवद्गीता’ पर लिखा चार अंकों का एक संक्षिप्त संस्करण पढ़ा। ‘द चार्म ऐंड पावर ऑफ द गीता’ नामक पुस्तक में उन्होंने स्वामी विवेकानंद द्वारा वर्णित मानव-निर्माण तथा राष्ट्र-निर्माण के लिए गीता के प्रति नवीन दृष्टि और पारंपरिक दृष्टि के बीच अंतर बताने के लिए एक उदाहरण दिया है। स्वामीजी ने लिखा है’अतीत में ज्यादातर लोग गीता को एक पवित्र कार्य के रूप में और मन की थोड़ी शांति के लिए पढ़ते थे। लेकिन हमने इस पुस्तक की गहन व्यावहारिकता को कभी महसूस नहीं किया। हमने गीता की शिक्षाओं की व्यावहारिक उपयोगिता को कभी नहीं समझा। यदि हमने ऐसा किया होता तो हमें हजार वर्षों तक विदेशी हमले, आंतरिक जातीय संघर्ष, सामंती अत्याचार और व्यापक निर्धनता का सामना नहीं करना पड़ता। हमने गीता को कभी गंभीरता से नहीं लिया। पर अब हमें ऐसा करना पड़ेगा। हमें ऐसे दर्शन की जरूरत है, जो हमें एक नए कल्याणकारी समुदाय के निर्माण में मदद दे सके; जो मानवीय सम्मान, स्वतंत्रता और समानता पर आधारित हो। गीता का यह महत्त्व, यह व्यावहारिक महत्त्व, पहली बार आधुनिक युग में स्वामी विवेकानंद ने प्रदान किया।’

सितंबर 2007 में मुझे केरल के त्रिचूर जिले के परनाट्टुकारा स्थित रामकृष्ण मठ, जोकि उनके जन्मस्थल से अधिक दूर नहीं था, में स्वामी रंगनाथानंद की जीवनी का विमोचन करने के लिए आमंत्रित किया गया। इस जीवनी में मैंने डॉ. टी.आई. राधाकृष्णन द्वारा लिखित एक निबंध पढ़ा। वे स्वामीजी के पुराने सहयोगी थे। इसमें उनसे संबंधित एक रोचक घटना का उल्लेख था। एक बार स्वामीजी जब कराची में इस्लाम और पैगंबर मुहम्मद पर व्याख्यान दे रहे थे, तब एक व्यक्ति हॉल में आया और अंतिम पंक्ति में बैठ गया। वह मोहम्मद अली जिन्ना थे। इस व्याख्यान के बाद जिन्ना तेजी से मंच की ओर गए और कहा, ‘स्वामीजी, अब तक मेरा मानना था कि मैं एक सच्चा मुसलमान हूँ। आपका भाषण सुनने के बाद मैंने समझा कि मैं ऐसा नहीं हूँ। लेकिन आपके आशीर्वाद से मैं एक सच्चा मुसलमान बनने का प्रयास करूँगा।’ इस निबंध के लेखक ने कहा कि स्वामीजी को ऐसा ही अनुभव उस समय भी हुआ, जब वे ‘द क्राइस्ट वी एडोर’ पर भाषण दे रहे थे।

वर्तमान युग के आदि शंकराचार्य

जब मैंने पढ़ा कि स्वामी रंगनाथानन्द जी का जन्म 1908 में त्रिचुर (केरल) में हुआ था, मेरे मस्तिष्क में एक विचार आया कि उनका जन्म-स्थान आदि शंकराचार्य के जन्म-स्थान कलाड़ी से अधिक दूर नहीं है। मैं सोचता हूं कि स्वामी रंगनाथानन्द जी वर्तमान युग के आदि शंकराचार्य हैं। आदि शंकराचार्य एक महान संत होने के साथ-साथ एक महान विद्वान भी थे जोकि भगवद्गीता, उपनिषद्, पुराण और अन्य धर्मग्रंथों के तात्विक दर्शन की सुन्दर और स्पष्ट व्याख्या कर सकते थे। स्वामी रंगनाथानन्द जी आदि शंकराचार्य से कई सदियों के बाद आए जिनमें उनके उत्तराधिकारी वाले सभी गुण एवं असाधारण विशिष्टताएं मौजूद थीं। प्रत्येक दृष्टि से स्वामीजी में आदि शंकराचार्य से काफी समानताएं मिलती थी।

जब स्वामीजी कराची से दिल्ली स्थित रामकृष्ण मिशन मठ में एक प्रमुख के रूप में आए तो मैं उनके प्रवचन सुनने के लिए जाया करता था। बाद में, उनकी नियुक्ति हैदराबाद में कर दी गई लेकिन जब कभी वे दिल्ली आते तो मुझे उनसे बातचीत करने का सौभाग्य प्राप्त होता था। यह एक अद्वितीय बात है कि वे सभी प्रमुख हस्तियां – पंडित जवाहरलाल नेहरू, श्रीमती इंदिरा गांधी, श्री राजीव गांधी, श्री वाजपेयी और अन्य गणमान्य व्यक्ति – उनसे प्रेरणा तथा उचित परामर्श लेने के लिए उनके पास जाया करते थे। इससे स्वामी जी की महानता तथा उत्कृष्ट व्यक्तित्व का आभास होता है।

यह श्री आडवाणी द्वारा रामकृष्ण मिशन, नई दिल्ली में 15 मई, 2005 को एक स्मृति सभा में स्वामी रंगनाथानन्द पर दिए गए भाषण का एक चुनिन्दा अंश है। इसका अनुवाद मोनिका सेनगुप्ता द्वारा किया गया।