हार्ड पॉवर, साफ्ट पॉवर, स्मार्ट पॉवर

January 7, 2012

न् 2011 के अंतिम महीनों में मैं जनचेतना यात्रा पर था। उसके चलते मैंने ब्लॉग लिखने से छुट्टी ले ली थी। सन् 2012 के पहले शुरूआती महीने में मैं फिर से ब्लॉग शुरू कर रहा हूं। यहां यह स्मरण कराना समीचीन होगा कि 1957 में दूसरे आम चुनावों के बाद मैं राजस्थान में स्वतंत्रता के पश्चात् का पहला दशक बिताने के बाद दिल्ली आया था।

 

यही वह चुनाव था जिसमें पहली बार श्री वाजपेयी लोकसभा के लिए चुनकर आए थे।

 

पार्टी के महासचिव और हमारे मुख्य विचारक पण्डित दीनदयाल उपाध्याय चाहते थे कि मैं पार्टी के संसदीय कार्यालय को स्थापित कर उस समय के पार्टी के सांसदों के छोटे समूह की सहायता करूं । तब से मैं पार्टी के संसदीय दल से निकटता से जुड़ा हूं। जो आज भी जारी है।

 

हाल ही में समाप्त हुए वर्ष का सिंहावलोकन करते समय मैंने एक वक्तव्य जारी किया था जिसमें पार्टी के नए अध्यक्ष नितिन गडकरी को बधाई दी थी, जिनके नेतृत्व में पार्टी अपेक्षाकृत रूप से मजबूत और ज्यादा जीवंतबनी है।

 

जहां तक संसद के दोनों सदनों का सम्बन्ध है, जनमत इस पर एकमत है कि हमारी पार्टी के दोनों नेता सुषमा स्वराज और अरूण जेटली सदैव संसद की बहसों में उत्कृष्ट योगदान करते हैं।  इन दोनों सदनों में विपक्ष के नेताओं पर पार्टी को गर्व है।

 

सदन में न केवल उनकी व्यक्तिगत परफोरमेंस के चलते उन्हें प्रशंसा मिलती है और बहस का स्तर बढ़ता है अपितु पार्टियों के साथ उनके प्रबन्धन ने भी संसद में भाजपा को वास्तव में एक प्रभावी विपक्ष बनाया है।

 

जनसंघ के दिनों से ही, संसद सत्र में प्रत्येक मंगलवार को दोनों सदनों से पार्टी के सारे सांसद नियमित रूप से मिलते हैं और बीेते सप्ताह में हुई कार्रवाई पर विचार कर, आगामी सप्ताह में आने वाले विषयों पर मंत्रणा करते हैं। भाजपा सांसदों ने मुझे बताया कि निजी बातचीत में अनेक कांग्रेसी सांसद इससेर् ईष्या करते हैं कि भाजपा सांसद कितनी आसानी से अपने नेताओं से बात कर लेते हैं और इन साप्ताहिक बैठकों में नि:संकोच कोई भी मुद्दा उठाने में उन्हें कोई कठिनाई नहीं होती।

 

1975-77 में आपातकाल के दौरान बंगलौर केंद्रीय कारागार में बंदी के रूप में मुझे एल्विन टॉफ्लर की पुस्तक Future Shock पढ़ने का अवसर मिला, और मैं लेखक का प्रशंसक हो गया। बाद में मैंने उनकी पुस्तक THIRD WAVE और POWER SHIFT पढ़ीं। पॉवर शिफ्टपुस्तक में विस्तार से सत्ता के तीन प्रमुख स्त्रोतों पर फोकस किया गया है: सेना, धन और ज्ञान तथा इसमें सत्ता के एक केन्द्र से दूसरे केन्द्र के बदलने के इतिहास को बताया गया है, और कैसे वर्तमान युग में ज्ञान आधारित समाज अपेक्षाकृत रूप से प्रभावी है।

 

josephपिछले सप्ताह न्यूयार्क के मेरे एक मित्र ने इसी विषय पर एक विद्वान की पुस्तक भेंट की जो आधुनिक विश्व में सत्ता कैसे विकसित होती है, के विशेषज्ञ हैं। पुस्तक का शीर्षक है The Future of Power (दि फ्यूचर ऑफ पॉवर) और लेखक हैं हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के केनेडी स्कूल ऑफ गर्वनमेंट के पूर्व डीन जोसफ एस.न्ये. जूनियर।

 

न्ये लिखते हैं कि केनेडी और ख्रुश्चेव के युग में सत्ता के संसाधन को परमाणु मिसाइल्स, औद्योगिक क्षमता, और पूर्वी यूरोप के मैदान में तुरंत जा सकने वाले शस्त्रधारी सैनिकों और टैंकों की संख्या से मापा जाता था। लेकिन 21वीं शताब्दी का वैश्विक सूचना युग सत्ता के परम्परागत मानकों की लुप्तप्राय व्याख्या कर रहा है, सत्ता के सम्बन्ध पुनर्भाषित हो रहे हैं।

 

कहा जाता है कि यह पुस्तक एक ऐसी नई सत्ता का वर्णन करती है जो बदलाव, नवाचार, प्रमुख प्रौद्योगिकी और नए सम्बन्धों से 21वीं शताब्दी को परिभाषित करेगा।

 

पुस्तक सत्ता को परिभाषित करते हुए बार-बार तीन विशेषणों का उपयोग करती है: कठोर सत्ता, नरम सत्ता और स्मार्ट सत्ता। (Hard Power, Soft Power and Smart Power)

 

पुस्तक की अपनी प्रस्तावना में लेखक रक्षा मंत्री राबर्ट गेट्स को उद्दृत करते हुए अमेरिकी सरकार से कूटनीति, आर्थिक सहायता और संचार सहित सॉफ्ट पॉवर टूल्सके लिए और ज्यादा धन की प्रतिबध्दता करने का अनुरोध करते हैं: वह बताते हैं कि अमेरिका का सैन्य खर्चा 36 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा है। जोसफ न्ये ने एक राष्ट्र की हार्ड और सॉफ्ट पॉवर को मिलाकर विभिन्न संदर्भों में एक प्रभावी रणनीतिकी क्षमता को स्मार्ट पॉवर नाम की नई परिभाषा दी है।

 

पाकिस्तान के परमाणु सम्पन्न बनने के संदर्भ में लेखक ने एक दिलचस्प उदाहरण इस प्रकार दिया है:

 

सत्तर के दशक के मध्य में फ्रांस पाकिस्तान को एक परमाणु रिप्रोसेसिंग प्लांट बेचने को राजी हो गया था जिससे प्लूटोनियम, एक सामग्री जिसका उपयोग शांतिपूर्ण उद्देश्यों या बम बनाने के लिए किया जा सकता है, निकाला जा सकता था। परमाणु हथियारों के प्रसार से चिंतित फोर्ड प्रशासन ने यह प्लांट पाकिस्तान को खरीदने से रोकने के लिए उच्च क्षमता वाले विमान देने का प्रयास किया, लेकिन पाकिस्तान ने यह सौदा नहीं माना। फोर्ड तथा कार्टर प्रशासन ने फ्रांस पर दबाव बनाकर इस बिक्री को रद्द कराने की कोशिश की लेकिन फ्रांस ने इस आधार पर इसे मानने से इंकार कर दिया कि यह सिर्फ शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए किया जा रहा विधिसम्मत सौदा है।

 

जून 1977 तक कुछ होता नजर नहीं आया, जब मैं (लेखक) जिम्मी कार्टर की अप्रसार नीति का प्रभारी था और मुझे फ्रांसीसी अधिकारियों को नए साक्ष्य दिखाने की अनुमति दी गई कि कैसे पाकिस्तान परमाणु हथियार तैयार कर रहा है। फ्रांस के एक उच्च अधिकारी ने मेरी आंखों में देखा और मुझे बताया कि यदि यह सत्य है तो फ्रांस को इस प्लांट को पूरा होने से रद्द करने का रास्ता ढूंढ़ना होगा।

 

इस लक्ष्य को अमेरिका कैसे हासिल कर सका? कोई धमकी नहीं दी गई। कोई भुगतान नहीं किया। कोई प्रलोभन नहीं दिया गया या लाठियां नहीं भांजी गई। समझाने और विश्वास से फ्रांसीसी व्यवहार बदला। मैं वहां था और मैंने इसे होते देखा। यह मुश्किल से सत्ता के प्रचलित ढांचे में फीट बैठती है जोकि अधिकांश सम्पादकीयों या ताजा विदेश नीति संबंधी पुस्तकें समझाने को सत्ता के रुप में नहीं मानती क्योंकि यह अनिवार्य रुप से एक बौध्दिक या भावनात्मक प्रक्रियाहै।

 

टेलपीस (पश्च्य लेख)

seal-bookसन् 2011 की मुख्य घटना वाशिंगटन द्वारा 9/11 के कर्ताधर्ता ओसमा बिन लादेन को पाकिस्तान के एबटाबाद में ढूंढ निकालना और खत्म कर देना रही।

 

इस नव वर्ष पर मुझे, भारतीय विदेश सेवा के एक सेवानिवृत अधिकारी द्वारा चुक पराररकी पुस्तक ‘Seal Target Geronimo’ (सील टारगेट गेरोनिमों) भेंट दी। मैं इस घटनाक्रम की अंदरुनी कहानी बड़े चाव से पढ़ रहा हूं। इस बीच मैंने इंटरनेट पर ये रिपोर्ट देखीं जिनमें अमेरिकी स्पेशल ऑपरेशन्स के हवाले से इस पुस्तक को एक मनगढ़न्तकहा गया है!

 

 

श्री लालकृष्ण आडवाणी

नई दिल्ली

3 जनवरी, 2012

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