हैदराबाद में ‘ऑपरेशन पोलो’

July 2, 2013

मेरे पिछले दो ब्लॉग मुख्यतया जम्मू एवं कश्मीर और डा. श्यामा प्रसाद मुकर्जी के बारे में थे। जिन्हें देश ने राष्ट्रीय एकीकरण के लिए स्वतंत्र भारत के पहले शहीदके रुप में सराहा। इन दोनों के लिए मुझे वी. शंकर द्वारा लिखित वल्लभभाई पटेल की जीवनी-माय रेमिनीसेंसेज ऑफ सरदार पटेलपर काफी आश्रित होना पड़ा।

 

sardar-patelसरदार पटेल पर राजमोहन गांधी की जीवनी में लिखा है: यद्यपि शंकर की सेवाएं बहुमूल्य थीं, परन्तु ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका वपल पनगुन्नी मेनन ने निभाई

 

सरदार पटेल ने स्वतंत्र भारत के गृहमंत्री के रुप में अपने मंत्रालय में एक स्टेट्स डिपार्टमेंटका गठन किया जिस पर देश की 564 देसी रियासतों को एक करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। सरदार पटेल ने वी.पी. मेनन को स्टेट्स डिपार्टमेंट का सचिव नामांकित किया। जब भारत पर ब्रिटिश शासन था तब ये देसी रियासतें देश का लगभग आधा क्षेत्र बनती थीं।

 

दिसम्बर, 2000 में नई दिल्ली में श्री वी.पी. मेनन की स्मृति में सम्पन्न एक कार्यक्रम में लीला गु्रप ऑफ होटल्स के प्रमुख कैप्टन सी पी कृष्णानायर ने स्वर्गीय मेनन की बहुमूल्य पुस्तकों का एक सेट मुझे भेंट किया था, इन पुस्तकों के बारे में माना जाता है कि वीपी ने यह स्वयं सरदार पटेल की तरफ से लिखीं: पहली का शीर्षक है दि ट्रांसफर ऑफ पॉवर इन इण्डियाऔर दूसरी का इंटीग्रेशन ऑफ दि इण्डियन स्टेट्स। दूसरी वाली वास्तव में एक अद्भुत और स्वतंत्र भारत के पहले गृहमंत्री की महानतम उपलब्धि की अत्यन्त अधिकृत गाथा है।

 

महत्वपूर्ण रियासतों में से चार ने भारत में विलिनीकरण के प्रति अपनी अनिच्छा प्रदर्शित की थी। इनमें हैदराबाद, जम्मू एवं कश्मीर, भोपाल और ट्रावनकोर थे। इनमें से हैदराबाद एकमात्र ऐसा राज्य था जिसके सम्बन्ध में भारत सरकार को बल प्रयोग करने हेतु बाध्य होना पड़ा।

 

वी.पी. मेनन की पुस्तक में 87 पृष्ठों में फैले तीन अध्याय पूरी तरह से हैदराबाद पर केंद्रित हैं: यदि मैं संक्षेप में इसे समेटूं तो वीपी के स्वयं के शब्दों में, पण्डित नेहरु की हिचक के बावजूद क्यों सरदार पटेल ने निजाम के विरुध्द सेना का उपयोग किया, तो वीपी लिखते हैं:

 

स्टैन्ड्स्टिल एग्रीमेंट (जिसे निजाम ने नई दिल्ली के साथ किया था) के अनुच्छेद II के अनुसार भारत सरकार ने के.एम. मुंशी को अपना एजेंट-जनरल नियुक्त किया। मैं तब तक मुंशी को अच्छी तरह से नहीं जानता था। लेकिन 1937 से 1939 में बॉम्बे के गृहमंत्री के रुप में उनके द्वारा साम्प्रदायिक स्थिति का सामना करने के तरीके से मैं विशेष रुप से प्रभावित था। जब हमने हैदराबाद सरकार को मुंशी की नियुक्ति के बारे में सूचित किया तो निजाम ने कुछ निश्चित शर्तें रखीं। सबसे पहले वह चाहते थे कि मुंशी व्यापार एजेंट से ज्यादा कुछ नहीं होने चाहिएं। मैंने लाइक अली (जिसे निजाम ने कासिम रिज़वी की सलाह पर अपनी एक्जीक्यूटिव कांउसिल का अध्यक्ष नियुक्त किया था) का ध्यान समझौते के अनुच्छेद II की ओर दिलाया जिसके तहत एजेंट-जनरल के काम निश्चित रुप से व्यापार तक सीमित नहीं थे।

 

vp-menonएक छोटा परन्तु फिर भी महत्वपूर्ण विवाद मुंशी को हैदराबाद में रहने की सुविधा देने पर उत्पन्न हुआ निजाम ने यहां तक कि जब तक कहीं और आवास नहीं मिल जाता तब तक अस्थायी रुप से भी कोई आवास देने से मना कर दिया। अतंतोगत्वा, भारतीय सेना के दो भवन मुंशी और उनके स्टाफ के लिए उपलब्ध कराए गए।

 

इससे पहले कि स्टैन्ड्स्टिल एग्रीमेंट की स्याही सूखती, निजाम सरकार ने एक के बाद एक, दो अध्यादेश तुरंत जारी किए।

 

पहले में हैदराबाद से भारत को निर्यात किए जाने वाली बहुमूल्य धातुओं पर प्रतिबंध लगा दिया। दूसरे में राज्य में भारतीय करेंसी के चलन को अवैध करार दे दिया गया।

 

25 दिसम्बर, 1947 को मैंने हैदराबाद सरकार को लिख कर यह बताया कि थे दोनों अध्यादेश स्टैण्डस्टील एग्रीमेंट का उल्लंघन करते हैं।

 

इसके अलावा, भारत सरकार को यह सूचना मिली कि हैदराबाद सरकार ने पाकिस्तान को 20 करोड़ रुपए का कर्जा भारत सरकार की प्रतिभूति की समतुल्य कीमत में दे दिया है।

 

यही काफी नहीं था। हैदराबाद की सरकार ने हमें अधिकृत रुप से सूचित किया कि उनकी मंशा अनेक विदेशी देशों में एजेंट नियुक्त करने की है। उन्होंने बिना भारत सरकार को सूचित किए पहले ही एक जनसम्पर्क अधिकारी कराची में नियुक्त कर दिया था।

 

इसके बाद विचार-विमर्श हुआ। मैंने जोर दिया कि हैदराबाद सरकार को विवादों में आए दोनों अध्यादेशों को वापस लेना चाहिए और पाकिस्तान सरकार से 20 करोड़ रुपए का कर्ज वापस देने के लिए कहना चाहिए। रजाकरों की गतिविधियों का संदर्भ देते हुए मैंने कहा कि उनके द्वारा हैदराबाद में उत्पन्न की गई स्थिति पर भारत सरकार ने गंभीर रुख लिया है। भारत सरकार को ऐसा प्रतीत होता है कि हैदराबाद की सरकार द्वारा इस प्रतिक्रियावादी और साम्प्रदायिक संगठन को हर तरह से प्रोत्साहन दिया जा रहा है। मद्रास सरकार से भी इन रजाकरों द्वारा उनकी सीमा पर की जा रही गतिविधियों सम्बन्धी बेचैन करने वाली रिपोर्टें प्राप्त हो रही हैं।

 

इस बीच निजाम की एक्जीक्यूटिव कांऊसिल के अध्यक्ष लाइक अली दिल्ली आए और सरदार से मिले। सरदार ने उन्हें दृढ़ता से बताया कि भारत और हैदराबाद में संतोषजनक समझ की पहली अनिवार्यता है कि राज्य में आंतरिक निपटान होना चाहिए और उनसे इस दिशा में कार्य करने का अनुरोध किया। 30 जनवरी की शाम गांधीजी की हत्या के चलते वार्तालाप पूरा नहीं हो सका। लाइक अली और हैदराबाद प्रतिनिधिमण्डल तत्काल हैदराबाद लौट गया।

 

लार्ड माऊंटबेटन ने अपना निजी मत दिया कि यदि निजाम एक जिम्मेदार सरकार बनाने का अपना इरादा घोषित करते हैं तो दुनिया की नजरों में हैदराबाद की स्थिति और मजबूत हो जाएगी तथा इससे निजाम और उसके उत्तराधिकारियों के राज्य का संवैधानिक शासन सदैव के बनने का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा। यदि सही समय गंवा दिया या यदि समय बीत गया, तो इसकी संभावना है कि निजाम अपना सिंहासन मात्र घटनाक्रम से बाध्य होकर गंवा देगा।

 

km-munshiके.एम. मुंशी को अत्यन्त नाजुक और कठिन भूमिका निभानी थी। जबकि भारत सरकार और दिल्ली में निजाम के एजेंट-जनरल (नवाब जेन यार जंग) के सम्बन्ध सौहार्दपूर्ण थे, उधर हैदराबाद की सरकार मुंशी के साथ पक्षपातपूर्ण व्यवहार कर रही थी और उसके उनके साथ सम्बन्ध एकदम तनावपूर्ण थे। उनके प्रति हैदराबाद सरकार के संदेह के चलते एक तरह से वह अपने ही घर में कैदी जैसे थे।

 

इस बीच, हैदराबाद सरकार ने मानी गई एक बात भी लागू नहीं की। लाइक अली द्वारा किए गए वायदे के बावजूद पाकिस्तान से कर्जा वापस लेने सम्बन्धी कोई घोषणा नहीं की गई; करेंसी अध्यादेश को नहीं सुधारा गया, जबकि बहुमूल्य धातु और तिलहन के निर्यात पर पाबंदी जारी रही। लाइक अली द्वारा किए गए वायदे के अनुसार निजाम की एक्जीक्यूटिव काऊंसिल के पुनर्गठन की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया। रजाकरों पर प्रतिबंध लगाना तो दूर उल्टे वे असहनीय सिरदर्द बन रहे थे। सीमाओं पर छापामारी रूकने के कोई लक्षण नहीं थे। अब तक हम अपनी बातों को हैदराबाद सरकार के सामने अनौपचारिक रूप से उठा रहे थे। लेकिन अब भारत सरकार ने तय किया कि स्टैन्ड्स्टिल एग्रीमेंट के उल्लंघन की बातें अधिकारिक रूप से उनके संज्ञान में लाई जाए। तद्नुसार, 23 मार्च को मैंने निजाम की एक्जीक्यूटिव काऊंसिल के अध्यक्ष को सम्बोधित एक पत्र मुंशी को भेजा ताकि वह निजी रूप से इसे लाइक अली को दे सकें।

 

रजाकरों के समर्थन से हैदराबाद में सत्तारूढ़ गिरोह अब आक्रामक मूड में था। जैसाकि मुझे बताया गया कि निजाम के सलाहकारों ने उन्हें आश्वस्त किया कि यदि भारत आर्थिक प्रतिबंध थोपता है यह प्रभावी नहीं हो पाएंगे तथा आगामी कुछ महीनों तक हैदराबाद अपने पांवों पर खड़ा रह सकेगा, और इस अवधि में दुनियाभर में जनमत को अपने पक्ष में खड़ा किया जा सकेगा। भारत को काफी कमजोर और उस समय तथा कभी भी सैन्य कार्रवाई हेतु अक्षम ठहराया गया। सभी मुस्लिम देश हैदराबाद के साथ दोस्ताना थे और वे उसके विरूध्द किसी सैन्य कार्रवाई को नहीं होने देंगे। हैदराबाद रेडियो तो इस घोषणा करने की हद तक चला गया कि यदि हैदराबाद के विरूध्द युध्द छेड़ा गया तो हजारों पाकिस्तानी भारत की ओर मार्च कर देंगे।

 

5 अप्रैल, 1948 को लाइक अली ने सत्रह पृष्ठों का टाइप किया हुआ एक बहुत लम्बा पत्र नेहरू को भेजा, जिसमें स्टैन्ड्स्टिल एग्रीमेंट की शर्तों के उल्लंघन के आरोपों को नकारा और उल्टे भारत पर आरोप मढ़ दिए।

 

उसी दिन, निजाम ने लार्ड माऊंटबेटन को पत्र लिखकर कहा कि स्टेट मंत्रालय का पत्र दोस्ताना सम्बन्धों के खुले उल्लंघन के अल्टीमेटम के रूप में पूर्व भूमिका जैसा है।

 

16 अप्रैल को लाइक अली की सरकार से बातचीत हुई जिसमें मैं भी उपस्थित था। सरदार ने कहा: आप भी जानते हो और मैं भी कि शक्ति किसके हाथों में है और हैदराबाद में वार्ताओं को अंतिम रूप से सिरे चढ़ाने का अधिकार किसके पास है। वह महाशय (कासिम रिज़वी) जो हैदराबाद पर हावी हैं, ने अपना जवाब दे दिया है। उसने साफ तौर पर कहा कि यदि भारतीय रियासत हैदराबाद आती है तो उसे डेढ़ करोड़ हिन्दुओं की हड्डियों और राख के सिवाय कुछ नहीं मिलेगा। यदि यह स्थिति है तो यह गंभीर रूप से निजाम और उनके खानदान के समूचे भविष्य को खोखला कर देगी। मैं आप से इसलिए साफ-साफ बोल रहा हैं क्योंकि मैं नहीं चाहता कि आप किसी गलत आशंका में रहें। हैदराबाद समस्या का भी उसी तरह से समाधान किया जाएगा जैसे अन्य राज्यों के सम्बन्ध में किया गया है। कोई अन्य संभावना नहीं है। हम एक ऐसी अलग-थलग जगह को बनाए रखने के पक्ष में सहमत नहीं हो सकते जो हमारे संघ जिसे हमने अपने खून और पसीने से बनाया है, को नष्ट करे। साथ ही साथ हम दोस्ताना सम्बन्ध और दोस्ताना समाधान चाहते हैं। इसका मतलब यह नहीं होगा कि हम कभी भी हैदराबाद की स्वतंत्रता पर राजी होंगे। यदि यह एक स्वतंत्र दर्जा बनाए रखने की जिद पर अड़े रहते हैं तो यह असफल रहेगा।

 

निष्कर्ष रूप में सरदार ने लाइक अली से हैदराबाद वापस जाकर निजाम से सलाह कर एक अंतिम फैसला लेने को कहा ताकि पता चल सके कि हम दोनों कहां खड़े हैं।

 

बातचीत के दौरान लाइक अली बेचैन दिख रहा था। मुझे ऐसा लगा कि सरदार ने जिस स्पष्टता से बात की उससे वह पूरी तरह से हक्का-बक्का रह गया।

 

हैदराबाद के सम्बन्ध में क्या कार्रवाई की जाए के प्रश्न को लेकर भारत सरकार के सलाहकारों में सर्वसम्मति नहीं थी। जो वर्ग झुकने की नीति की वकालत कर रहा था उसके पास यह बहाना तैयार था कि इससे व्यापक स्तर पर साम्प्रदायिक अव्यवस्था फैलेगी जिससे हैदराबाद की तरफ से कोई कार्रवाई होगी। उनके आशंका थी कि हैदराबाद में हिन्दुओं को कत्ल कर दिया जाएगा और भारत में मुस्लिमों का कत्लेआम होगा। कुछ का कहना था इससे दक्षिण भारत में मुस्लिमों में विद्रोह होगा, विशेषकर मोपलाओं में। यह दिलचस्प सुझाव उन लोगों द्वारा दिया गया था जिन्होंने कभी एक मोपला को देखा तक नहीं था, उनकी मानसिकता के बारे में बहुत कम समझते थे और उस समय मालाबार की स्थिति के बारे में कुछ नहीं जानते थे। एक ऐसा और भय था कि यदि भारत ने हैदराबाद के विरूध्द कोई कार्रवाई की तो पाकिस्तान हस्तक्षेप करेगा। मेरा अपना मत था कि पाकिस्तान निश्चित रूप से हैदराबाद के मुद्दे पर भारत के साथ युध्द का जोखिम मोल नहीं लेगा।

 

कुछ इस आशय का प्रचार भी चल रहा था कि हैदराबाद के विमान बॉम्बे, मद्रास, कलकत्ता और दिल्ली जैसे शहरों पर बम बरसा सकते हैं। इस प्रचार से पड़ोसी राज्यों के लोगों में कुछ हद तक आशंकाएं घर कर गई थीं।

 

इस दौरान लाइक अली दवाब डाल रहा था कि हैदराबाद के मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र संघ में ले जाया जाए।

 

इसी बीच नई दिल्ली में अमेरिका चार्ज डी अफेयर्स ने हमें बताया कि निजाम ने संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति को पत्र लिखकर उनसे मध्यस्थ बनने का अनुरोध किया है, जिसे ठुकरा दिया गया है।

 

रजाकरों ने मिशनरियों और ननों को भी नहीं बख्शा। स्टेट मिनिस्ट्रि को सितम्बर की शुरूआत में शिकायतें मिलीं कि कुछ विदेशी मिशनरियों पर हमले किए गए हैं और रजाकरों ने कुछ ननों के साथ दर्व्यवहार भी किया है।

 

सेना का मानना था कि यह अभियान तीन सप्ताह से ज्यादा नहीं चलेगा। वास्तव में, सभी कुछ एक सप्ताह से कम समय में ही हो गया।

 

9 सितम्बर को, सभी पहलुओं का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन करके और जब यह साफ हो गया कि भारत सरकार के पास कोई और विकल्प शेष नहीं बचा है तो हैदराबाद में सैनिक टुकड़ियां भेजने का निर्णय लिया गया ताकि राज्य में शांति और सद्भावना पुर्नस्थापित की जा सके तथा संलग्न भारतीय भू-भाग में सुरक्षा की भावना कायम हो सके। यह निर्णय दक्षिण कमाण्ड को सूचित कर दिया गया, जिसने आदेश दिया कि भारतीय फौजें 13 तारीख की तड़के सुबह हैदराबाद की तरफ कूच करेंगी।

 

major-choudhuryrajendrasinhji_भारतीय सेना का नेतृत्व मेजर-जनरल जे.एन. चौधरी कर रहे थे जोकि दक्षिण कमाण्ड के जनरल ऑफिस कमांडिंग-इन-चीफ लेफ्टिनेंट जनरल महाराज श्री राजेन्द्रसिंह जी के निर्देश में काम कर रहे थे। सेना मुख्यालय द्वारा इस अभियान का नाम ऑपरेशन पोलोरखा गया।

 

पहले और दूसरे दिन कुछ कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। इसके पश्चात् प्रतिरोध कमजोर पड़ा और वास्तव में समाप्त हो गया। हमारी सेना को कुल मिलाकर बहुत कम हानि पहुंची लेकिन दूसरी ओर अव्यवस्थित अभियानों और अनुशासन की कमी, सशस्त्र सेना से असंबध्द और रजाकरों को तुलनात्मक रूप से भारी क्षति उठानी पड़ी। मृतकों की संख्या 800 से कुछ ज्यादा थी। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस कार्रवाई में इतने अधिक लोग मारे गए, यद्यपि जब राज्य में रजाकरों द्वारा हिन्दुओं की हत्याओं, बलात्कारों और लूटमार के ताण्डव की तुलना की जाए तो यह संख्या ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है।

 

17 सितम्बर की शाम को हैदराबाद की सेना ने हथियार डाल दिए। 18 को मेजर-जनरल चौधरी के नेतृत्व में भारतीय सेना ने हैदराबाद शहर में प्रवेश किया। अभियान मुश्किल से 108 घंटे चला।

 

17 सितम्बर को लाइक अली और उनके मंत्रिमण्डल ने अपना इस्तीफा दे दिया। निजाम ने इसे के.एम. मुंशी को भेजा (जो पुलिस कार्रवाई शुरू होते ही नजरबंद कर दिए गए थे) और उन्हें सूचित किया कि उन्होंने अपनी सेना को समर्पण करने का आदेश दिया है; और वह एक नई सरकार का गठन करेंगे; कि भारतीय सेना सिकन्दराबाद, बोलारम जाने के लिए स्वतंत्र हैं तथा रजाकरों पर प्रतिबन्ध लगाया जाएगा। मुंशी ने यह जानकारी भारत सरकार को दी। मेजर-जनरल चौधरी ने 18 सितम्बर को मिलिट्री गर्वनर के रूप में दायित्व संभाला। लाइक अली मंत्रिमण्डल के सदस्यों के नजरबंद कर दिया गया। 19 सितम्बर को रिज़वी गिरफ्तार कर लिया गया।

 

इस अभियान के दौरान समूचे भारत में कहीं  भी कोई एक साम्प्रदायिक घटना नहीं घटी। हैदराबाद प्रकरण में सफलता से, तेजी से सभी ओर खुशी का माहौल था तथा देश के सभी भागों से इसके लिए भारत सरकार को मिल रहे बधाई संदेशों की बाढ़ सी आ गई थी।

 

टेलपीस (पश्च्यलेख)

अपने एक पूर्ववर्ती ब्लॉग में मैंने 1947 के एक आईएएस अधिकारी एम.के.के. नायर की पुस्तक विद नो इल फीलिंग टू एनीबॉडीके आधार पर मैंने पॉयनियर में प्रकाशित एक रिपोर्ट उदृत की थी जिसमें कहा गया था कि सरदार पटेल केबिनेट की एक बैठक से बहिर्गमन कर गए थे क्योंकि प्रधानमंत्री की कुछ टिप्पणियों से वह आहत हुए। पुस्तक यह भी कहती है कि नेहरू, पटेल की पुलिस कार्रवाई के बजाय संयुक्त राष्ट्र संघ का रास्ता अपनाने के पक्ष में थे।

 

लालकृष्ण आडवाणी

नई दिल्ली

2 जुलाई, 2013

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