Month: March 2010

अनिवार्य मतदान – प्रासंगिक एवं अपरिहार्य

March 8, 2010

नई दिल्ली में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार 1975 के आपातकाल के विरूध्द लोगों के गुस्से का परिणाम थी। श्री मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली सरकार में मुझे सरकार में जाने का पहला अनुभव हुआ। प्रधानमंत्री जी ने मुझसे पूछा था कि क्या मंत्रालय के विषय में मेरी कोई निजी प्राथमिकता है? निस्संकोच मेरा जवाब था: सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय। मेरी इस पसंद के तीन कारण थे। एक पत्रकार के नाते मैं मीडिया से परिचित था। मेरा मानना था कि आपातकाल के दौरान लोकतंत्र को सर्वाधिक नुकसान मीडिया और पत्रकारों पर लगे प्रतिबंधों के कारण पहुंचा। तीसरा, काफी समय से मैं सरकार से अनुरोध कर रहा था कि वह आकाशवाणी से अपना नियंत्रण हटाए और इसे स्वायत्तता प्रदान करे। सूचना एवं प्रसारण मंत्री के रूप में मुझे बीबीसी द्वारा प्रसारित एक फीचर की पाण्डुलिपि देखने का अवसर मिला जो चुनाव सुधारों के मेरे अभियान के संदर्भ में मुझे काफी रोचक लगी। यह … Continue reading अनिवार्य मतदान – प्रासंगिक एवं अपरिहार्य

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COMPULSORY VOTING – AN IDEA WHOSE TIME HAS COME

March 7, 2010

The first non Congress Government formed in New Delhi was the result of people’s anger against the 1975 emergency. In this government, headed by Shri Morarji Desai, I had my first experience of Government.The Prime Minister asked me whether I had any personal preference in the matter of portfolio. My response was unhesitating : Information and Broadcasting. Three factors prompted me to make this choice. As a journalist I was familiar with the media. My opinion was that the maximum damage caused to democracy during the emergency was because of curbs imposed on the media and on media men. Thirdly, for long, I had been pleading that the Government stranglehold on Akashwani must be smashed, and autonomy be conferred on it. As I and B Minister I came across the script of a feature broadcast by the BBC which I found of great interest in the course of my campaigning … Continue reading COMPULSORY VOTING – AN IDEA WHOSE TIME HAS COME

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यूपीए सरकार की ढुलमुल पाकिस्तान नीति और देश का अपमान

March 1, 2010

जुलाई, 2001 में जब जनरल मुशर्रफ आगरा शिखर वार्ता से खाली हाथ लौटे तो वह भारत सरकार से काफी खफा थे कि एक तो उन्हें निमंत्रित किया गया और उस पर भी उन्हें खाली हाथ लौटा दिया-यहां तक कि कोई संयुक्त वक्तव्य भी जारी नहीं किया गया जिसमें भारत-पाक शांति के बारे में कुछ अच्छी-अच्छी बातें उल्लिखित होतीं। उनकी शुरुआती प्रतिक्रिया में ऐसा लगा कि उनका सारा गुस्सा मुझ पर केंद्रित है। यद्यपि, बाद में अपनी संस्मरणात्मक पुस्तक ”इन द लाइन आफ फॉयर” में उन्होंने श्री वाजपेयी को भी नहीं बख्शा। उनकी कटुतापूर्ण टिप्पणी थी: ”एक ओर आदमी होता है और एक ओर समय होता है। जब दोनों मिलते हैं तो इतिहास बनता है। वाजपेयी समय को नहीं पकड़ सके और इस प्रकार उन्होंने इतिहास में अपना अवसर खो दिया।” उनकी टिप्पणियों को ध्यान में रखकर प्रधानमंत्री श्री वाजपेयी ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इस सारे परिप्रेक्ष्य को को यूं … Continue reading यूपीए सरकार की ढुलमुल पाकिस्तान नीति और देश का अपमान

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