Archive for June, 2010

25 जून, 1975 : भारत के लिए एक ना भूलने वाला दिन

June 25, 2010
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नाजी जर्मनी के बारे में विलियम शिरर की ‘द राइज एण्ड फॉल ऑफ थर्ड राइक’ मैंने पहली बार तब पढ़ी जब मैं कालेज का विद्यार्थी था। जून 1975 में आपातकाल की घोषणा के कुछ समय बाद ही मुझे इस प्रसिध्द पुस्तक की पुरानी प्रति हाथ लगी। इसने मुझे आपातकाल विरोधी भूमिगत कार्यकर्ताओं के आंदोलन हेतु ‘ए टेल ऑफ टू इमरजेंन्सीस’ (दो आपातकालों की गाथा) शीर्षक से एक पेम्फलेट लिखने को प्रोत्साहित किया। यह पेम्फलेट न केवल हमारे लोगों में वितरित किया गया अपितु उस वर्ष नई दिल्ली में हुए कॉमनवेल्थ पार्लियामेंटरी कांफ्रेंस में आए प्रतिनिधियों को भी बांटा गया। आज 25 जून को इस पेम्फलेट के कुछ महत्वपूर्ण अंशों को पुन: उद्धृत करना समाचीन होगा। *** गाथा दो आपातकालों की [A tale of two Emergencies] सितम्बर, १९७५ में बंगलोर सेंट्रल जेल में लिखा गया नाजी इतिहास के बारे में विलियम शिरर की ‘द राइज ऐंड फॉल ऑफ थर्ड राइक’ नामक … Continue reading 25 जून, 1975 : भारत के लिए एक ना भूलने वाला दिन

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Nana Chudasama : Mumbai’s Original Tweeter

June 22, 2010
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In the past few decades I have attended many book-release functions. But the one I participated in at Mumbai last week was truly unique. The nature of the book was unique, and so was the individual who had given birth to the book. I have known Nana Chudasama since the early seventies when my friend and party colleague late Makarand Desai of Gujarat introduced me to him. Since then we have been meeting often enough to bind us together in ties of mutual esteem. The University Convocation Hall in the Fort Area of Mumbai was jampacked that day. The cream of the city was present, both in the Hall, as well as on the dais. The Hall was so crowded this evening that my daughter Pratibha who had accompanied me to the function had to remain standing for nearly half an hour. The book has been titled History on a … Continue reading Nana Chudasama : Mumbai’s Original Tweeter

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नाना चुडासमा : मुंबई के पहले ट्वीटर

June 22, 2010
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पिछले कुछ दर्शकों में मैं अनेक पुस्तक लोकार्पण कार्यक्रमों में गया हूं। लेकिन गत् सप्ताह मुंबई में हुआ कार्यक्रम सचमुच में अद्भुत था। पुस्तक की विषय वस्तु अनोखी थी और उसी तरह वह व्यक्ति भी जिसने इस पुस्तक को जन्म दिया। मैं नाना चुडासमा को सत्तर के दशक के प्रारम्भ से तब से जानता हूं जब मेरे मित्र और गुजरात में पार्टी के सहयोगी स्वर्गीय मकरन्द देसाई ने उनसे मेरा परिचय कराया था। तब से अक्सर अनेक बार हम मिले और परस्पर सम्मान हमको एक-दूसरे से बांधे रखे हुए है। विश्वविद्यालय का कन्वोकेशन हॉल उस दिन खचाखच भरा था। हॉल इतना भरा था कि उस शाम मेरे साथ गई मेरी बेटी प्रतिभा को करीब आधे घंटे तक खड़ा ही रहना पड़ा। पुस्तक का शीर्षक है ‘हिस्ट्री ऑन ए बैनर’। सुप्रसिध्द लेखिका शोभा डे ने टिप्पणी की मुंबई के आम आदमी की आशाओं और कुण्ठाओं को ठीक से अभिव्यक्त करने वाले … Continue reading नाना चुडासमा : मुंबई के पहले ट्वीटर

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