Month: October 2010

एक अक्षम्य भारी भूल

October 17, 2010

जम्मू एवं कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने वाकई इतिहास रच डाला है। जम्मू एवं कश्मीर के किसी अन्य मुख्यमंत्री ने कभी इसका प्रतिवाद नहीं किया कि जम्मू एवं कश्मीर राज्य भारत का अभिन्न अंग है। ऐसा करके उमर ने न केवल भाजपा को चिढ़ाया है अपितु आगे बढ़कर जो कहा है उससे राज्य में अलगाववादी और पाकिस्तान का मीडिया हर्षोन्माद में है।   राज्य विधानसभा में एक ताजा वक्तव्य में, उमर ने कहा: जम्मू एवं कश्मीर राज्य भारत के साथ जुड़ा है; इसका भारत के साथ ‘विलय‘ नहीं हुआ है।   तथ्य यह है कि 500 से ज्यादा रियायतें जिनमें हैदराबाद और जूनागढ़ शामिल है जिनका विशेष रुप से उल्लेख करते हुए उमर ने इसे जम्मू-कश्मीर से भिन्न केस बताया है- ने उसी तरह विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए जैसेकि जम्मू एवं कश्मीर ने किए हैं, और स्वतंत्रता के बाद भारत अखण्ड हिस्सा बने। और पिछले 6 दशकों से … Continue reading एक अक्षम्य भारी भूल

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CRUCIAL ASPECT OF AYODHYA MATTER

October 10, 2010

Not many constitutions of the world have invested their highest judicial authority with the kind of advisory role that Art. 143 of the Indian Constitution has entrusted to the Supreme Court of India.   Art. 143 (1) reads as follows :   If at any time it appears to the President that a question of law or fact has arisen, or is likely to arise, which is of such a nature and of such public importance that it is expedient to obtain the opinion of the Supreme Court upon it, he may refer the question to that Court for consideration and the Court may, after such hearing as it thinks fit, report to the President its opinion thereon.   In the last 60 years since the adoption of the Constitution, there have been just about one dozen issues on which the Central Government has sought the advice of the Supreme … Continue reading CRUCIAL ASPECT OF AYODHYA MATTER

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अयोध्या मामले का अत्यन्त महत्वपूर्ण पहलू

October 10, 2010

दुनिया के ऐसे बहुत कम संविधान होंगे जिन्होंने अपने सर्वोच्च न्यायिक प्राधिकरण को इस तरह की परामर्श दात्री भूमिका प्रदान की होगी जैसेकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 143 ने भारत के सर्वोच्च न्यायालय को प्रदान की हुई है।   अनुच्छेद 143(1) के अनुसार:   ”यदि किसी समय राष्ट्रपति को प्रतीत होता है कि विधि या तथ्य का कोई ऐसा प्रश्न उत्पन्न हुआ है या उत्पन्न होने की संभावना है, जो ऐसी प्रकृति का और ऐसे व्यापक महत्व का है कि उस पर उच्चतम न्यायालय की राय प्राप्त करना समीचीन है, तो वह उस प्रश्न को विचार करने के लिए उस न्यायालय को निर्देशित कर सकेगा और वह न्यायालय, ऐसी सुनवाई के पश्चात् जो वह ठीक समझता है, राष्ट्रपति को उस पर अपनी राय प्रतिवेदित कर सकेगा।”   संविधान के लागू होने के 60 वर्षों में, अब तक केन्द्र सरकार ने ऐसे लगभग एक दर्जन मामलों में सर्वोच्च न्यायालय की राय … Continue reading अयोध्या मामले का अत्यन्त महत्वपूर्ण पहलू

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