25 जून, 1975 : भारत के लिए एक ना भूलने वाला दिन

June 25, 2010

नाजी जर्मनी के बारे में विलियम शिरर की ‘द राइज एण्ड फॉल ऑफ थर्ड राइक’ मैंने पहली बार तब पढ़ी जब मैं कालेज का विद्यार्थी था।

जून 1975 में आपातकाल की घोषणा के कुछ समय बाद ही मुझे इस प्रसिध्द पुस्तक की पुरानी प्रति हाथ लगी। इसने मुझे आपातकाल विरोधी भूमिगत कार्यकर्ताओं के आंदोलन हेतु ‘ए टेल ऑफ टू इमरजेंन्सीस’ (दो आपातकालों की गाथा) शीर्षक से एक पेम्फलेट लिखने को प्रोत्साहित किया।

यह पेम्फलेट न केवल हमारे लोगों में वितरित किया गया अपितु उस वर्ष नई दिल्ली में हुए कॉमनवेल्थ पार्लियामेंटरी कांफ्रेंस में आए प्रतिनिधियों को भी बांटा गया।

आज 25 जून को इस पेम्फलेट के कुछ महत्वपूर्ण अंशों को पुन: उद्धृत करना समाचीन होगा।

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गाथा दो आपातकालों की [A tale of two Emergencies]
सितम्बर, १९७५ में बंगलोर सेंट्रल जेल में लिखा गया

नाजी इतिहास के बारे में विलियम शिरर की ‘द राइज ऐंड फॉल ऑफ थर्ड राइक’ नामक पुस्तक अधिकृत और चिरस्मरणीय रचना मानी जाती है। हाल में जब मैं इसे पुन: पढ़ रहा था तो यह जानकर बहुत चकित था कि नाजी जर्मनी में हिटलर द्वारा अधिनायक बनने के लिए अपनाए गए तरीकों और श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा भारतीय लोकतंत्र को नष्ट करने के लिए अपनाई गई प्रक्रिया में व्यापक समानताएँ हैं।

जब सन् 1919 में जर्मनी का वीमियर संविधान बना था तो उसे ” बीसवीं शताब्दी का सबसे उदार और लोकतांत्रिक दस्तावेज कहा गया था ” । शिरर ने इसका वर्णन करते हुए लिखा है कि यह ” तंत्र की दृष्टि से पूर्ण, लोकतंत्र के दोषमुक्त संचालन के लिए अनेकानेक प्रशंसनीय तरीकों से युक्त, गारंटीशुदा संविधान था। ”

लेकिन भारत के संविधान की तरह जर्मनी के संविधान में भी आपातस्थिति का प्रावधान था, वह संविधान निर्माताओं ने इस विश्वास के साथ रखा था कि इस का उपयोग युध्द जैसे गंभीर संकट के समय में लाया जाएगा।

30 जनवरी, 1933 के दिन हिटलर जर्मनी का चांसलर (प्रधानमंत्री) बना। उसने राज्य और जनता की सुरक्षा के लिए 28 फरवरी को राष्ट्रपति हिंडनबर्ग द्वारा आपातस्थिति की घोषणा करवा दी। यह घोषणा अनुच्छेद 48 के (आपात अधिकार) के तहत की गई। अन्य बातों के अलावा इस घोषणा में ये बातें कही गईं

‘व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं, विचार-स्वातंत्र्य एवं प्रेस-स्वतंत्रता पर और सभा व संगठन के अधिकारों पर पाबंदी; टेलीफोन र्वात्ता, टेलीग्राफिक संवाद तथा निजी पत्राचार की गोपनीयता का उल्लंघन; घरों की तलाशी के वारंट, संपत्ति की जब्ती और उसपर नियंत्रण आदि कानून के दायरे के बाहर के कदम इसमें थे।’

इस घोषणा से संसद् को, संघ को राज्यों के अधिकार हस्तातंरित करने का अधिकार भी दिया गया। इसके द्वारा अनेक अपराधों के लिए क्रूर दंड विधान का प्रावधान किया गया। इन अपराधों में ‘शांति के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न करना’ भी था।

श्रीमती इंदिरा गांधी और उनके साथी बार-बार यह दोहराते रहे हैं कि जो कुछ किया गया है, संविधान के दायरे मे रहकर किया गया है। इसलिए उनका कहना है कि विपक्ष और पश्चिमी प्रेस द्वारा यह कहा जाना कि लोकतंत्र को ध्वस्त कर दिया गया है, बिल्कुल निराधार है।

नाजी इतिहास इस बात का पक्का सबूत है कि सिर्फ संविधान के अनुसार काम करना अपने आप में लोकतांत्रिक आचरण करने की गारंटी नहीं है। हिटलर हमेशा डींगें मारता था कि जो कुछ वह कर रहा है, ‘उसमें कुछ भी गैर-कानूनी या असंवैधानिक नहीं है।’ सच तो यह है कि उसने एक लोकतांत्रिक संविधान को ही तानाशाही स्थापित करने का उपकरण बनाया।

हिटलर के लिए विपक्ष की कोई उपयोगिता नहीं थी और न इंदिरा गांधी के लिए है। वह विपक्ष की यह कहकर निंदा करते नहीं थकतीं कि अल्पमत बहुमत की इच्छाओं को उद्ध्वस्त करता रहा है।

आपातकाल के ठीक पहले श्रीमती गांधी अलोकप्रियता की ढलान पर लुढ़क रही थीं। मई में प्रकाशित एक जनमत सर्वेक्षण में यह तथ्य पूरी तरह स्थापित हो गया था। नेता के रूप में उनकी लोकप्रियता घट रही थी। फिर 12 जून के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय से प्रधानमंत्री के तौर पर उनकी वैधता भी समाप्त हो गई थी।

श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा आपातस्थिति की घोषणा के लिए संसदीय सहमति प्राप्त करने, संविधान संशोधनों की लंबी फेहरिस्त को पास कराने और अपने को कानून की सीमाओं के परे करने की अपनाई गई रणनीति और हिटलर की रणनीति में आश्चर्यजनक समानताएँ हैं। पर कुछ असमानताएँ भी हैं।

आधारभूत रूप से दोनों की रणनीति समान है। कुछ दलों के समर्थन की व्यवस्था करो, बाकियों को दमित करो। संसद् की स्वीकृति पाने के लिए हिटलर को विपक्षी सदस्यों को ही कैद करना पड़ा था। लेकिन उसने नाजियों को कैद नहीं किया था।

यहाँ श्रीमती इंदिरा गांधी को भारी संख्या में विपक्षी सदस्यों के साथ-साथ अपने दल की केंद्रीय कार्यसमिति के दो सदस्यों को भी कैद करना पड़ा। इनमें से एक श्री रामधन तो पिछली मई में ही कांग्रेस संसदीय दल के सचिव चुने गए थे।

हिटलर ने संसदीय कार्रवाई के प्रकाशन पर कोई रोक नहीं लगाई थी। यहाँ विपक्ष ने आपातस्थिति का विरोध किया और इसके खिलाफ सत्र के शेष भाग के लिए सदन का बहिष्कार किया, यह समाचार तक दबा दिया गया।

संसद् को पंगु बना देने और विपक्ष को दबा देने के बाद हिटलर की ‘क्रांतिदृष्टि’ ने अपना ध्यान प्रेस और न्यायपालिका की ओर किया। यही दो अवरोध तानाशाही के मार्ग में बचे थे। अलंघ्य सेंसरशिप लगाया गया था। गोयबल्स को प्रचार मंत्री नियुक्त किया गया। 4 अक्तूबर, 1933 को प्रेस कानून पास करके प्रेस दासता को औपचारिक रूप दे दिया गया। पत्रकारिता को सार्वजनिक सेवा घोषित कर दिया गया। उक्त कानून की धारा 14 के तहत संपादकों को कह दिया गया कि ऐसी सभी सामग्री, जो राष्ट्र को कमजोर और जनता की सामान्य आकांक्षाओं को कमजोर बनाती हो, उससे सावधान व दूर रहें।

जब गांधी जी सन् 1942 के सत्याग्रह के पहले गिरफ्तार किए गए तो मीरा बेन ने कहा, ‘रात गए वे चोरों की तरह आए और उन्हें चुरा के ले गए।’

25-26 जून के बीच की रात को आज के महात्मा गांधी श्री जयप्रकाश नारायण को भी उसी तरह ले जाया गया जैसे गांधीजी को ले जाया गया था, लेकिन एक अंतर था। ब्रिटिश सरकार ने जनता से यह समाचार छिपाने की कोशिश नहीं की कि उनके प्रिय नेता बंदी बना लिये गए हैं और न ही यह कि भगत सिंह को फाँसी लगा दी गई है। देश भर के समाचार-पत्रों में महात्मा गांधी की गिरफ्तारी का समाचार प्रथम पृष्ठ पर आठ कॉलम शीर्षक से छापा गया था।

श्रीमती गांधी के राज में 26 जून से जयप्रकाश नारायण, मोरारजी, चरण सिंह और वाजपेयी अस्तित्वहीन हो गए। जे.पी. जेल में हैं, यह आज सरकार का सबसे महत्त्वपूर्ण गोपनीय तथ्य है। यदि कोई इसे प्रकाशित कर दे तो कड़ी सजा का पात्र हो जाएगा। केवल हिटलर या स्टालिन के राज में ही ऐसी मूर्खताओं की कल्पना की जा सकती है। अधिनायकवादी राज्यों में समाचार माध्यमों की इसके अलावा कोई भूमिका नहीं होती कि वे सत्ताधीशों के लक्ष्यों के प्रति समर्पित रहें। समाचार-पत्रों सहित सभी जनसंचार माध्यम सरकारी अंग होते हैं। लेकिन लोकतंत्र में समाचार-पत्रों की भूमिका अलग होती है।

यह प्रत्येक तानाशाह का चरित्र होता है कि भले ही वह सरकार की कुछ आलोचना बरदाश्त कर ले, लेकिन व्यक्तिगत रूप से की गई आलोचना को वह हरगिज नहीं पचा सकता। समाचार-पत्रों के खिलाफ श्रीमती गांधी के आक्रोश का यह कारण है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय के बाद प्रेस ने लगभग एकमत से यह मत व्यक्त किया कि जब तक सर्वोच्च न्यायालय अपना निर्णय न दे तब तक के लिए श्रीमती गांधी प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र दे दें। इसके लिए श्रीमती गांधी उन्हें माफ करने को तैयार नहीं।

स्वाभाविक रूप से सेंसरशिप के कारण समाचार-पत्र नीरस और फीके हो गए हैं। वे सरकारी प्रचार-प्रपत्रों की तरह हो गए हैं।

सेंसरशिप के लगाने के बाद ऐसा नाजी जर्मनी में भी हुआ। एक बार स्वयं गोयबल्स ने संपादकों को ज्यादा डरपोक न होने की सलाह दी और उनसे अपने पत्रों को रसहीन न बनने देने का आग्रह भी किया। बर्लिन के एक संपादक वेल्के ने गोयबल्स के व्यक्त कथन को गंभीरता से लिया। दूसरे ही अंक में उस पत्र ने प्रचार मंत्रालय की आलोचना करते हुए लिखा कि कैसे यह मंत्रालय दबाता है और उससे अखबार किस तरह नीरस हो गए हैं। इसके प्रकाशन के कुछ ही दिन बाद पत्र बंद कर दिया गया और संपादक महोदय जेल पहुँचा दिए गए।

इन दिनों नई दिल्ली में कुछ ऐसा ही हो रहा है। प्रधानमंत्री द्वारा बार-बार यह घोषणा किए जाने पर कि प्रेस सेंसरशिप ढीली कर दी गई है, कुछ पत्रकारों ने, खासकर विदेशी पत्रकारों ने, पत्र-सूचना विभाग के रंगहीन प्रेस विज्ञप्तियों के अलावा भी कुछ भेजना शुरू कर दिया। लेकिन इससे वे परेशानी में पड़ गए। पिछले कुछ सप्ताहों में दो अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसियों रायटर और यू.पी.आई. के टेलीप्रिंटर और टेलीफोन काट दिए गए हैं। कहा गया कि उन्होंने सेंसरशिप कानूनों का उल्लंघन किया है।

हिटलर के सत्तासीन होने के तुरंत बाद नाजी नेता जोचिम रिबेनट्रोप ने नई न्यायिक व्यवस्था की आवश्यकता प्रतिपादित की। जोचिम बाद में हिटलर के विदेश मंत्री बने जोचिम ने कहा कि पुरानी न्याय व्यवस्था को बदलना इसलिए जरूरी है, क्योंकि आज तो हिटलर पर भी उन्हीं दंड-विधानों से मुकदमा चल सकता है जिन कानूनों से एक आम आदमी पर चल सकता है।

वकीलों के एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए संसद् में विधि संबंधी नेता और न्याय आयुक्त डॉ. हेंस फ्रैंक ने कहा, ‘आज जर्मनी में केवल एक सत्ता है और वह सत्ता है हिटलर की।’

डॉ. फ्रैंक और जोचिम जैसे हिटलर के पुजारियों और ‘इंडिया इज इंदिरा ऐंड इंदिरा इज इंडिया’ का मंत्रोच्चारण करनेवाले श्री देवकांत बरुआ में कोई खास फर्क है क्या, जबकि दोनों के परिणाम एक ही तरह के निकले?

संविधान और कानूनों का ऐसा संशोधन किया गया कि कानून के शासन की धारणा बदल जाए और कार्यपालिका के प्रधान को कानूनी दायरे के ऊपर कर दिया जाए। इसी प्रक्रिया के अंतर्गत न्यायिक पुनरीक्षण के अधिकारों को कतर दिया गया।

कांग्रेस के लोग शायद यह जानकर कुछ लज्जित हों कि अगर श्रीमती गांधी को बीस सूत्री कार्यक्रम का गौरव प्राप्त है तो हिटलर को अपने पच्चीस सूत्री कार्यक्रमों पर नाज था और वह उन्हें अपरिवर्तनीय कहा करता था। पहले यह व्यक्तिगत मत था, बाद में नाजी पार्टी का अधिकृत कार्यक्रम बन गया।

हिटलर के राज्य में भी पच्चीस सूत्री कार्यक्रम के पक्ष प्रतिदिन प्रदर्शित होते थे। भाग लेनेवाले सामान्य जन ही नहीं, जीवन के विभिन्न क्षेत्रों के विचारवान् अगुआ होते थे। सन् 1933 में विख्यात वैज्ञानिकों और शिक्षाविदों सहित बर्लिन विश्वविद्यालय के 960 प्राध्यापकों ने हिटलर के प्रति अपनी आस्था एक प्रदर्शन के द्वारा प्रकट की।

एक वरिष्ठ प्राध्यापक रीपोक ने बाद में लिखा कि इस वेश्या प्रवृत्ति ने जर्मन विद्वत्ता के इतिहास को लांछित कर दिया। एक अन्य अध्यापक जूलियस एबिंग ने सन् 1945 में लिखा :

‘जर्मन विश्वविद्यालय विफल हो गए। जब सार्वजनिक रूप से अपनी पूरी शक्ति से विरोध करने का अवसर था तब भी जर्मन लोकतंत्र के विनाश करने के क्रम को उन्होंने नहीं रोका। आतंक की काली रात में स्वतंत्रता और अधिकारों की मशाल को जलाए रखने में ये असफल सिध्द हुए।’

भारत भी आतंक की काली रात से गुजर रहा है। अनुशासन की चमक-दमक भरी बातें किसी को धोखा नहीं दे सकतीं।

आज जो हम देख रहे हैं वह अनुशासन नहीं है। यह कायर सहमति और गुलाम जी हुजूरपना है। यह सब श्रीमती गांधी के भय के कारण है, कर्तव्यपरायणता या ईमानदारी के कारण नहीं। आज वह आदर नहीं पातीं, आज उनका आतंक है।

हिटलर ने इससे भी ज्यादा आतंक पैदा किया था और अपने कानूनों का पालन कराने में उसे कहीं अधिक कामयाबी मिली थी। उसने एक कानून बनाया था कि बिना संतोषजनक कारण के जो कामगार काम पर हाजिर नहीं होगा, उसे गिरफ्तार किया जा सकता है।

सरकारी दफ्तर आज आपात स्थिति के आतंक की छतरी के नीचे हैं। मनमानी कार्रवाई के खिलाफ सभी सुरक्षात्मक प्रबंधों को निलंबित कर दिया गया है। आज कोई यह पता लगाने की स्थिति में नहीं है कि वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ की गई कार्रवाई में से कितनी न्यायोचित है, कितनी गर्हित उद्देश्यों अथवा अफसरों की आपसी खींचतान का परिणाम है।

प्रतिदिन हम रेडियो और समाचार-पत्रों से जानकारी पाते हैं कि फलाँ-फलाँ जगह अकुशलता या भ्रष्टाचार के कारण इतने अधिकारी निलंबित कर दिए गए अथवा अनिवार्य रूप से उन्हें अवकाश प्राप्त करा दिया गया।

आकाशवाणी से रात-दिन इस तरह की घोषणा जारी है कि आयकर अधिकारियों ने फलाँ उद्योगपति या व्यापारी के यहाँ छापा मारा। कोशिश यह धारणा पैदा करने की है कि सरकार प्रशासन, उद्योग व व्यापार से भ्रष्टाचार को नेस्तनाबूद कर देने का व्यापक अभियान चला रही है।

इन चार महीनों में हमने एक भी ऐसा उदाहरण नहीं सुना कि फलाँ कांग्रेस मंत्री, सांसद या विधायक के खिलाफ भ्रष्टाचार या कर-वंचना या अन्य किसी भी कारण कोई कार्रवाई की गई हो।

यह आश्चर्यजनक, परंतु महत्त्वपूर्ण है। यह एक निर्विवाद तथ्य है कि प्रशासन, उद्योग और व्यापार-जगत् के भ्रष्टाचार की जड़ें राजनीतिक भ्रष्टाचार में हैं। संथानम समिति और प्रशासनिक सुधार समिति ने इस समस्या पर गहराई में जाकर राजनीतिक भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए ठोस सुझाव दिए थे। जे.पी. आंदोलन का मुख्य निशाना यह भ्रष्टाचार ही था। लेकिन सरकार इस समस्या पर ऑंख-कान बंद करके चादर तानकर सोई है।

दलीय साथियों के भ्रष्टाचार ने श्रीमती इंदिरा गांधी को कभी चिंतित नहीं किया। हिटलर भी इसके बारे में पूरी तरह उदासीन था। शिरर ने व्यंग्य करते हुए लिखा है

‘हिटलर स्वभाव से ही बहुत असहिष्णु था। लेकिन एक मानवीय स्थिति यानी व्यक्ति की नैतिकता के बारे में आश्चर्यजनक रूप से सहिष्णु था। नाजी पार्टी को छोड़कर कोई भी दूसरी पार्टी संदिग्ध चरित्र के व्यक्तियों को उतनी बड़ी संख्या में आकृष्ट नहीं कर पाई। हिटलर उनकी तब तक कोई चिंता नहीं करता था जब तक वे उसके लिए उपयोगी होते थे।’

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एक ही निष्कर्ष इसमें से निकलता है कि नौकरशाही, उद्योग और व्यापार क्षेत्र के खिलाफ जो कड़े कदम उठाए गए, उनका उद्देश्य कीचड़ को साफ करना नहीं था। यह तो देश की स्थिति पर दल की पकड़ बढ़ाने की राजनीति का एक भाग था। यह अधिनायकवादी योजना का ही एक कार्यक्रम था।

श्रीमती गांधी ने आपातस्थिति का वर्णन एक ‘शॉक ट्रीटमेंट’ के रूप में किया है। हमारे संविधान निर्माताओं ने आपात स्थिति का प्रावधान करते हुए इस उद्देश्य की कल्पना भी नहीं की होगी। निश्चय ही झटका तो लगा। उसने उन्हें भी झटका (शॉक) लगाया है जिन्हें जे.पी. के भविष्य-विश्लेषण में संदेह था। ज्यादा दु:खद यह है कि इस झटके ने बहुतों को भारत में लोकतंत्र के भविष्य के बारे में आशंकित कर दिया है।

इस विश्वास को पुन:स्थापित करने के बारे में सोचने-समझनेवाले हर भारतीय को आत्मचिंतन करना चाहिए। यह कैसे किया जाए, इसके बारे में हर व्यक्ति को अपने-अपने स्तर पर निर्णय करना है। लेकिन एक बात हम सबके लिए कर सकने योग्य है कि भय से मुक्त हों और सत्य को हम जैसा भी देखते हैं, प्रकट करें। यह अपने आप में लोकतंत्र के लिए छोटा योगदान नहीं होगा।

लाल कृष्ण आडवाणी
नयी दिल्ली

२५ जून, २०१०

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