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अब आपातकाल पर भी फिल्म बने

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ब्रिटिश शासन के विरूध्द भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान, सन् 1930 में दो प्रमुख घटनाएं घटीं। एक महात्मा गांधी का दाण्डी मार्च, और दूसरा चिटगांव शस्त्रागार पर हमला।

 

गांधीजी ने नमक सत्याग्रहके लिए दाण्डी मार्च 12 मार्च को अहमदाबाद के साबरमती आश्रम से शुरू किया। अपने 78 आश्रमवासी सहयोगियों के साथ 390 किमी. की दूरी तय कर वे 6 अप्रैल को पश्चिमी तट के दाण्डी पहुंचे जहां उन्होंने समुद्र से नमक बनाकर कानून तोड़ा। इसके पश्चात् ब्रिटिश सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया।

 

भाजपा के हम लोगों के लिए वह तिथि जिस दिन गांधीजी ने नमक सत्याग्रह किया और गिरफ्तारी दी वह इसलिए महत्पवूर्ण है कि ठीक पचास वर्ष पश्चात् 6 अप्रैल, 1980 को मुंबई में बांद्रा समुद्र तट पर एक विशाल सभा में अटल बिहारी वाजपेयी ने भारतीय जनता पार्टी की नींव रखी।

 

do-die-bookदाण्डी सत्याग्रह सर्वविदित है, जबकि चिटगांव विद्रोह कम जाना जाता है। मैं हृदय से, प्रमुख पत्रकार मानिनी चटर्जी को धन्यवाद देता हूं जिन्होंने भारतीय इतिहास के इस भुला दिये अध्याय को डू एण्ड डाई : दि चिटगांव अपराइजिंग 1930-34” शीर्षक पुस्तक प्रकाशित करके ताजा कर दिया है। 1999 में पेंग्विन बुक्स इण्डिया द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक को सन् 2000 में रविन्द्र पुरस्कार मिला। अब यह आशुतोष गोवारीकर द्वारा एक हिन्दी फिल्म खेले हम जी जान सेके रूप में सामने है।

 

मानिनी चटर्जी, वर्तमान में द टेलीग्राफकी राष्ट्रीय मामलों की सम्पादक हैं। उन्हें पत्रकारिता में उत्कृष्टता के लिए संस्कृति पुरस्कार (1990) और राजनीतिक पत्रकारिता में उत्कृष्टता के लिए रामनाथ गोयनका पुरस्कार मिल चुका है।

 

maniniमैं मानिनी को दो दशक से ज्यादा समय से जानता हूं और मानता हूं कि वे एक बहुत योग्य तथा निष्पक्ष पत्रकार हैं, जिन्होंने माक्र्सवाद के साथ अपने जुड़ाव को कभी छुपाया; नहीं साथ ही उन्होंने अपनी वैचारिक प्रतिबध्दता को कभी भी अपनी रिपोर्टिंग या अपने विश्लेषण की वस्तुनिष्ठता में आड़े नहीं आने दिया।

 

इसलिए जब कुछ समय पूर्व उन्होंने मुझे गोवारीकर की फिल्म के विशेष शो में आमंत्रित किया तो मैंने निमंत्रण तुरंत स्वीकार कर लिया। मुझे मालूम था कि फिल्म बाक्स ऑफिस पर अच्छी नहीं चल पाई है। लेकिन इसके निर्माण से मैं काफी प्रभावित हुआ। यह ज्ञानवर्धक और प्रेरक है। मेरे जैसे के लिए जो व्यवहारिक रूप चिटगांव घटना के बारे में ज्यादा नहीं जानता, शिक्षाप्रद भी थी।

 

फिल्म देखने के बाद मैंने मानिनी की पुस्तक की प्रति मंगवाई और तब मुझे समझ में आया कि फिल्म व्यवसायिक ढंग से क्यों नहीं ठीक चल पाई। आशुतोष ने लेखक द्वारा कुशलता से किए गए अनुसंधान से कोई छेड़छाड़ नहीं की और पुस्तक में वर्णित घटनाक्रमों का अक्षरश: पालन करने का प्रयास किया है।

 

आशुतोष की पूर्व की दो फिल्में - लगान और स्वदेश - बाक्स आफिस पर काफी हिट रहीं। ये दोनों फिल्में काल्पनिक कहानियों पर आधारित थीं, जबकि वर्तमान ऐतिहासिक तथ्यों पर।

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स्वतंत्रता के पूर्व देश के इतिहास पर आधारित इन फिल्मों की चर्चा करते हुए समय, मैं इरा सेझियन की पुस्तक जिसका लोकार्पण 19 दिसम्बर, 2010 को चेन्नई में करने के लिए मुझे बुलाया था, का उल्लेख करने से अपने को रोक नहीं पा रहा हूं।

 

यह पुस्तक सेझियन ने नहीं लिखी है; इसे उन्होंने प्रकाशित किया है यद्यपि यह भारत सरकार का एक प्रकाशन है। इसलिए मैंने इसे एक अद्वितीय प्रकाशन के रूप में निरूपित किया है। इसका मूल शीर्षक था: शाह कमीशन रिपोर्ट। पुर्नप्रकाशित होते समय इसका शीर्षक बन गया है: शाह कमीशन रिपोर्ट % लॉस्ट एण्ड रिगेन्डA

 

सेझियन जो अब 88 वर्ष के हैं, मेरे संसदीय सहयोगी रहे हैं। उन्होंने कमीशन रिपोर्ट के पुर्नप्रकाशित संस्करण की प्रस्तावना में लिखा है कि सितम्बर, 2010 में वह 1975 के आपातकाल के बारे में कुछ संदर्भ सामग्री इकट्ठा कर रहे थे। जब उन्होंने विकीपीडिया सहित अनेक वेबसाइटों को खंखाला तो वह यह जानकर दंग रह गए कि शाह कमीशन जिसको आपातकाल के दौरान कांग्रेस सरकार द्वारा शक्तियों का दुरूपयोग करने की जांच का काम सौंपा  गया था, ने स्वाभाविक रुप से अपनी रिपोर्ट में श्रीमती इंदिरा गांधी की कड़ी निंदा और आलोचना की थी। अत: जब 1980 में श्रीमती गांधी सत्ता में लौटीं तो उन्होंने शाह कमीशन रिपोर्ट की सभी प्रतियों को या तो वापस ले लिया या नष्ट  कर दिया ।

 

विकीपीडिया कहता है: अब यह माना जाता है कि इस रिपोर्ट की एक मात्र प्रतिलिपी भारत में मौजूद नहीं है। आयोग की तीसरी और अंतिम रिपोर्ट ऐसा लगता है भभारत से बाहर चली गई और वर्तमान में नेशनल लायब्रेरी ऑॅफ आस्ट्रेलिया में है।

 

हारपर पेरेनियल द्वारा सन् 2005 में प्रकाशित कैथरिन फ्रैंक द्वारा लिखित इंदिरा गांधी की जीवनी में लिखा है : तीन भभागों वाली रिपोर्ट को खारिज करते हुए इसे बाजार से वापस मंगा लिया। तीन भागों वाली रिपोर्ट की एकमात्र उपलब्ध प्रति जहां तक मैं जानती हूं, स्कूल ऑॅफ ओरियंटल एण्ड अफ्रीकन स्टडीज, युनिवर्सिटी ऑॅफ लंदन में है।

 

jp-in-jailचेन्नई के कार्यक्रम में इरा सेझियन की पुस्तक के लोकार्पण के बाद मैंने कहा था कि भारतीय इतिहास के उस काल में लोकतंत्र को नष्ट करने के कगार पर खड़ा कर दिया गया था, के बारे में अधिकृत पुस्तक का प्रकाशन करने के लिए मेरे मित्र इतिहास, लोकतंत्र और देश की उत्कृष्ट सेवा करने के लिए प्रशंसा के पात्र हैं।

 

हालांकि पिछले सप्ताह गोवारीकर की फिल्म देखने के बाद मैं चाहता हूं कि फिल्मी दुनिया में लोकतंत्र के प्रेमियों को इस अवधि पर भी एक फिल्म बनाने का प्रयास करना चाहिए। यह जयप्रकाश नारायण के जीवन पर आधारित हो सकती है या फिर आपातकाल की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि पर आधारित हो सकती है।

 

आपातकाल ने राजनीति को प्रमुखता से प्रभावित किया है। लेकिन साथ ही इसने मीडिया  को भी गहरे से प्रभावित किया है। यहां तक कि ब्रिटिश राज या युध्द के समय भी मीडिया को कभी इतनी दमघोंटू सेंसरशिप का अनुभव नहीं करना पड़ा । न्यायपालिका, वस्तुत: समूचा विधि समुदाय भी गंभीरता से प्रभावित हुआ। सबसे अधिक आम आदमी प्रभावित हुआ जिसे ज्यादितयों के लिए कष्ट सहने पड़े।

 

आपातकाल पर पुस्तकों की कोई कमी नहीं है। मार्च 1977 में आपातकाल की समाप्ति के तुरंत पश्चात अनेक पुस्तकें मुख्यता उन लोगों ने लिखीं जिन्हें उस अवधि में कष्ट झेलने पड़े। एक लाख से ज्यादा राजनीतिक कार्यकताओं को सलाखों के पीछे बंद कर दिया गया। उसके बाद बनी सरकार में सूचना एवं प्रसारण मंत्री के रुप में मैंने पाया कि 250 से ज्यादा मीडियाकर्मी भी जेलों में बंद किए गये थे । बी.बी.सी. के मार्क टुली जैसे अनेक विदेशी संवाददाताओं को देशनिकाला दे दिया गया। बी.बी.सी से सेवानिवृत होने के बाद मार्क भारत में ही बस गए हैं और उन्होंने इस देश को अपना घर बना लिया है। मैं इस सब का उल्लेख इसलिए कर रहा हूं कि एक उत्साही फिल्म निर्माता के लिए  संदर्भ सामग्री और स्त्रोत कम नहीं है। बस किसी को भी यह चुनौती स्वीकार करनी है।

 

 

लालकृष्ण आडवाणी

नई दिल्ली

9 जनवरी, 2011

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One Response to “अब आपातकाल पर भी फिल्म बने”

  1. mukulgoyaladvocatemathura Says:

    आदरणीय आडवाणी जी,

    आपने अपने ब्लॉग में लिखा है कि—- ‘अब आपातकाल पर भी फिल्म बननी चाहिये’ | लेकिन कोई अन्य व्यक्ति आपके कहने से फिल्म क्यों बनायेगा ? इसलिये मेरा सुझाव तो यह है कि—- आपकी पार्टी को ही कोई ऐसा संगठन बनाना चाहिये जो कि– इस प्रकार की सामग्री का निर्माण और प्रसार करे |

    आपको इस विषय में ध्यान देना चाहिये और निम्नलिखित बिन्दुओं पर अमल करना चाहिये—-
    १- आपकी पार्टी को ही कोई ऐसा संगठन बनाना चाहिये जो कि– आपकी विचारधारा से सम्बन्धित सामग्री का निरन्तर (लगातार) —- निर्माण और प्रसार करता रहे |
    २- आपकी पार्टी को अपना कोई दैनिक ‘समाचार-पत्र’ प्रारम्भ करना चाहिये |
    ३- आपकी पार्टी को अपना कोई ‘टेलीविजन चैनल’ प्रारम्भ करना चाहिये |
    ४- आप अपने ब्लॉग पर लिखते हैं और आपकी पार्टी की वेब-साईट भी चलती है लेकिन—- ब्लॉग और वेब-साईट की पहुँच प्रत्येक व्यक्ति तक नहीं हो पाती है | इसलिये आपको अन्य प्रचार-साधनों का भी प्रयोग करना चाहिये |

    मुझे विश्वास है कि—- आप इन सुझावों पर विचार करेंगे और इन पर अमल भी करेंगे | धन्यवाद !

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