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कैसे ब्रिटेन ने भारत में अफीम को प्रोत्साहन दिया

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मेरे एक घनिष्ठ मित्र और छत्तीसगढ़ के पूर्व राज्यपाल जनरल कृष सेठ ने गत् रविवार 15 जुलाई के मेरे ब्लॉग जो विल डुरंट की पुस्तक ए केस फॉर इण्डियापर आधारित है पर एक संक्षिप्त टिप्पणी की है:

 

सेठ लिखते हैं:

 

ब्लॉग आंखें खोल देने वाला है। मुझे पूरा विश्वास है कि हमारी वर्तमान पीढ़ी इन तथ्यों से पूर्णतया अनभिज्ञ है। ज्यादा से ज्यादा वे जानते हैं कि कभी भारत सोने की चिड़िया हुआ करता था। यहां तक कि स्कूलों में हमारी पाठय पुस्तकों में कभी भी इन तथ्यों को सामने नहीं लाया गया।

 

      इतने साधारण ढंग से रखने के लिए महान प्रयास।

                                                      - जनरल सेठ

 

will-durantमेरे ब्लॉग में एक महान इतिहासकार द्वारा किए गए दु:साध्य कार्य की झलक है। पुस्तक तथ्यों से परिपूर्ण है जो डुरंट के इस निर्णय की प्रभावकारी तरीके से पुष्टि करते हैं कि ब्रिटिश साम्राज्यवादियों द्वारा भारत के साथ किया गया व्यवहार इतिहास का सर्वाधिक बड़ा अपराधहै। जो मेरे ब्लॉग के पाठक हैं मैं उन्हें इस समूची पुस्तक को पढ़ने को कहूंगा, साथ ही अपने नियमित पाठकों के लिए मैं इस अद्भुत पुस्तक की अन्य झलक को भी साझा कर रहा हूं।

 

वर्तमान में, सर्वमान्य रूप से किसी देश की परिस्थियों को मापने हेतु दो मुख्य कसौटियां हैं शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में उसका परफोरमेंस। इन दो कसौटियों पर कसकर दुनिया सदैव उन सरकारों की आलोचना करती है जो इसे उपेक्षित करते हैं। लेकिन विल डुरंट दर्शाते हैं कि कैसे ब्रिटिश शासकों ने भारत में जो भी इस तरह की ठीक व्यवस्था थी उन्हें जानबूझकर और सुनियोजित ढंग से नष्ट किया। ए केस फॉर इण्डियापुस्तक में एक अध्याय है-सोशल डिसट्रक्शन (सामाजिक विनाश)। इसमें विल डुरंट लिखते हैं:

 

जब ब्रिटिश यहां आए तब समूचे भारत में गांव समुदायों द्वारा संचालित सामुदायिक स्कूलों की व्यवस्था थी। ईस्ट इण्डिया कंपनी के एजेंटों ने इन ग्रामीण समुदायों को नष्ट कर दिया…… आज (100 वर्ष पश्चात्) भारत में 7,30,000 गांव हैं और सिर्फ 1,62,015 प्राथमिक स्कूल हैं। मात्र 7% लड़के और 1½ % लड़कियां स्कूलों में हैं यानी समूचे का 4%A

 

सन् 1911 में, एक हिन्दू प्रतिनिधि, गोखले ने भारत में सार्वत्रिक अनिवार्य शिक्षा हेतु विधेयक प्रस्तुत किया। अंग्रेजों ने इसे पारित नहीं होने दिया और सरकार ने सदस्यों को नियुक्त किया। 1916 में पटेल ने ऐसा ही विधेयक रखा जिसे अंग्रेजों ने पारित नहीं होने दिया ओर सरकार ने सदस्यों को नियुक्त किया।

 

डुरंट कहते हैं कि इससे ज्यादा और शर्मनाक यह है:

 

शिक्षा को प्रोत्साहन देने के बजाय सरकार ने शराब को प्रोत्साहन दिया। जब अंग्रेज आए तब भारत एक संयमी राष्ट्र था। वारेन हेस्टिंग कहते हैं लोगों का संयम उनके सादा खान-पान और स्प्रिट वाली शराबों तथा नशे की अन्य वस्तुओं से पूर्णतया परहेज से प्रदर्शित होता था।

 

अंग्रेजों द्वारा स्थापित पहली व्यापारिक चौकी स्थापित की गई, तब रम की बिक्री के लिए सैलून खोले गए, और इस व्यवसाय से ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने अच्छा-खासा मुनाफा कमाया। जब क्राऊन ने भारत पर अपना अधिपत्य किया तो यह अपने राजस्व के बहुत बड़े भाग के लिए सैलूनों पर आश्रित था; लाइसेंस प्रणाली इस ढंग से प्रबंधन की गई कि पीने-पिलानेको प्रोत्साहन मिले और बिक्री हो।

 

ऐसे लाइसेंसों से पिछले चालीस वर्षों में सरकारी राजस्व में सात गुना वृध्दि हुई; 1922 में यह 60,000,000 डॉलर वार्षिक थी - स्कूलों और विश्वविद्यालयों के उपयोग से तीन गुना।

 

केथरीन मायो की भारत विरोधी दूषित पुस्तक मदर इण्डियाका संदर्भ देते हुए विल डुरंट लिखते हैं:

 

मिस मायो हमें बतातीं हैं कि हिन्दू माताएं अपने बच्चों को अफीम खिलाती हैं; और वह निष्कर्ष निकालती हैं कि भारत होम रूल के लायक नहीं है।

 

जो वह कहती हैं वह सच है; जो उसने नहीं कहा वह एकदम झूठ की तुलना में ज्यादा खराब है।

 

वह हमें नहीं बताती (यद्यपि वह जानती है) कि महिलाएं अपने बच्चों को इसलिए नशा कराती हैं क्योंकि माताओं को प्रत्येक दिन में फैक्ट्री में काम पर जाने के लिए बच्चों को छोड़कर जाना होता है।

 

वह हमें यह नहीं बताती कि अफीम सिर्फ सरकार उगाती है, और सरकार द्वारा ही बेची जाती है; और यह कि इसकी बिक्री राष्ट्रवादी कांग्रेस, औद्योगिक और सामाजिक कांफ्रेंसों, प्रोविन्शियल कांफ्रेंसों, ब्रह्मो समाज, आर्य समाज, मोहम्मडन्स और क्रिश्चियनों के विरोध के बावजूद सैलूनों के माध्यम और यह कि ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत के प्रत्येक शहर के सर्वाधिक संदेहास्पद स्थानों पर संचालित सात हजार अफीम की दुकानों; यह कि सन् 1921 में सेंट्रल लेजिस्लेचर ने भारत में अफीम की वृध्दि और बिक्री पर प्रतिबन्ध लगाने हेतु विधेयक पारित किया, और कि सरकार ने इस पर कार्रवाई करने से मना कर दिया; और दो से चार सौ हजार एकड़ भारत की भूमि जो खाद्य उपजाने हेतु जरूरी थी को अफीम उपजाने हेतु दे दिया; और मादक द्रव्यों की बिक्री से सरकार को प्रत्येक वर्ष उसके कुल राजस्व का नौवां हिस्सा प्राप्त हुआ।

 

macaulayइस अध्याय के अंतिम पैराग्राफ में लार्ड मैकाले द्वारा 10 जुलाई, 1833 (अर्थात इस पुस्तक के लिखे जाने से कम से कम सौ वर्ष पूर्व) को हाऊस ऑफ कॉमन्स में दिए गए भाषण का एक अंश दिया गया है।

 

लार्ड मैकाले को उदृत करते हुए डुरंट लिखते हैं:

 

निरंकुश शासकों की तकलीफ देने की शिकायत हमने भारत में तब पाई जब उनके कुछ विशिष्ट नागरिकों की क्षमता और भावना से वह डरते हुए दिखे और तब भी वे उनकी हत्या करने का साहस नहीं कर सके, लेकिन उनको पोश्ताजो अफीम से बनी होती है, की प्रतिदिन खुराक देने लगे जो इसका सेवन करने वाले निरीहों की सभी शारीरिक और मानसिक शक्तियों को कुछ ही महीनों में नष्ट करने उसे असहाय बना देती है। यह घृणास्पद तरीका हत्या की तुलना में ज्यादा भयावह है और इसको अपनाने वालों के लिए बहुमूल्य। यह ब्रिटिश राष्ट्र के लिए आदर्श नहीं है। हम समूचे समुदाय को पोश्तादेने की इसलिए कभी सहमति नहीं दे सकते कि महान लोगों को मूर्छितावस्था और लकवाग्रस्त बनाएं।

 

 

लालकृष्ण आडवाणी

नई दिल्ली

18 जुलाई, 2012

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One Response to “कैसे ब्रिटेन ने भारत में अफीम को प्रोत्साहन दिया”

  1. vikalp Says:

    छत्तीसगढ़ कि राजधानी का वासी होने के नाते यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं कि के.एम्. सेठ एक बहुत ही उदार व्यक्तित्व के स्वामी है तथा छतीसगढ़ के अब तक के श्रेष्ठ राज्यपाल है उनकी आपके ब्लाग पर कि गयी टिपण्णी भी उनके व्यक्तित्व कि भांति ही शानदार है l
    आपके इन तथ्यों के मध्य ही मै पर्शिया कि किवदंतियों के काल्पनिक नायक “मुल्ला नसीरुद्दीन” कि कहानियो से एक सन्दर्भ देना चाहूँगा , मुल्ला नसीरुद्दीन कि कहानियो का उद्गम १३वी शताब्दी के पास माना जाता है जिसे समस्त बाल्य जगत (विशेष कर अरबी देशो के) में बड़े चाव से पढ़ा जाता है, उस तेरहवी शताब्दी कि कहानी में एक बाजार का विवरण है जहा प्रत्येक देश से लाये गए श्रेष्ठ उत्पादों का विवरण है वहा पर भारत के स्वर्ण, स्वर्ण आभूषण तथा केसर का उल्लेख है, याने तेरहवी शताब्दी में अरबी लेखको ने भारतीय स्वर्ण का उल्लेख करना आवश्यक समझा उसी देश को असभ्य, भूखा और भिखारियों का देश कह कर ब्रिटिश २०० साल दमन करते रहे, और अंग्रेज जन्य मानसिकता से भारतीय भी स्वयं को वही मानने लगे l
    आपका एकलव्य
    विकल्प सिंह नंदा “अद्वैत”

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