प्रधानमंत्री द्वारा असमर्थनीय घूसखोरी का बचाव
प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने गत् शुक्रवार (18 मार्च, 2011) को संसद के दोनों सदनों में एक वक्तव्य देकर स्वंतंत्र भारत में अब तक के सबसे बड़े घोटाले-जुलाई 2008 में नोट के बदले वोट पर पर्दा डालने के उद्देश्य से उन्मत परन्तु व्यर्थ प्रयास किया। वक्तव्य के तुरंत पश्चात् दोनों सदनों में विपक्ष के नेता सुषमा स्वराज और अरुण जेटली ने अपने संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में इस वक्तव्य के प्रत्येक पहलू की प्रभावी ढंग से हवा निकाल दी और प्रधानमंत्री से निम्नलिखित पांच प्रश्न पूछे जिनका उत्तर पूरा देश चाहता है:
1- विश्वास मत के मुख्य लाभार्थी आप हैं। सभी ने स्वीकारा है कि यह घूसखारी का केस है। यहां तक कि संसदीय जांच में अधिकांश ने श्री सक्सेना को घूस देने वाला माना है। क्यों नहीं आपने या आपकी सरकार ने इस मामले को सीबीआई को जांच हेतु सौंपा? क्यों आपने सत्य की जांच को छुपाने और दोषियों को दण्डित न करने की कोशिश की? क्या आप अपने कर्तव्य पालन न करने के दोषी हैं? लोकसभा की संसदीय समिति की सिफारिशों को लागू न करने के चलते क्या आप संसद की अवमानना के दोषी नहीं हैं?
2- संसदीय जांच में यह पाए जाने के बावजूद कि सांसदों को घूस दी गई, क्यों आपने इंडिया टूडे कान्क्लेव को बताया कि घूसघोरी के बारे में आपको कुछ नहीं पता है?
3- क्या आपको घूस देने की वीडियो रिकार्डिंग्स को देखने का मौका मिला जो कुछ सप्ताह बाद समाचार चैनलों पर दिखाई गईं?
4- क्या कभी आपकी अंतरात्मा ने आपको नहीं कचोटा कि जिन संदिग्ध तरीकों से आपने विश्वास मत हासिल किया, उनसे देश और विदेशों में भारत की छवि कलंकित हुई?
5- देर से क्यों न सही, क्या आप अभी भी ऐसी भयंकर भूल की जिम्मेदारी स्वीकार कर प्रधानमंत्री के रुप में अपना त्यागपत्र देकर प्रायश्चित करने को तैयार हैं?
हालांकि, मनमोहन सिंह द्वारा अपने वक्तव्य में प्रतिपादित बेतुके सिध्दांत की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट करके मैं चाहूंगा कि कांग्रेससजन उनसे यह सवाल पूछें।
14वीं लोकसभा द्वारा घूसखोरी के आरोपों की जांच करने हेतु गठित समिति का उल्लेख करने के बाद प्रधानमंत्री कहते हैं:
”मैं इससे निराश हूं कि विपक्ष के सदस्य उसके पश्चात् क्या हुआ उसे भूल गए। 14वीं लोकसभा की अवधि पूरी होने पर आम चुनाव हुए। उन आम चुनावों में विपक्षी दलों ने बार-बार विश्वास मत में घूसखोरी के आरोपों को दोहराया था। लोगों ने इन आरोपों का क्या जवाब दिया? 14वीं लोकसभा में प्रमुख विपक्षी दल जिसके पास 138 सींटे थीं वह 15वीं लोकसभा में घटकर 116 सीटों पर आ गया। वाम दलों की संख्या भी 59 से 24 हो गई। अकेले कांग्रेस पार्टी ही ऐसी निकली जिसकी संख्या 145 से 206 हो गई, यानी 61 सीटों की बढ़ोत्तरी।
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि विपक्ष उन पुराने आरोपों को उठा रहा है जिन पर बहस हो चुकी है, चर्चा हो चुकी है और भारत की जनता ने जिन्हें नकार दिया है।”
यह कब से हुआ कि चुनावी विजय को, चुनाव पूर्व किए गए अपराधों की माफी के रुप में माना जाए? क्या प्रधानमंत्री को इस भौंडे तर्क के गंभीर आयाम मालूम है?
सभी राजनीतिक विश्लेषक इसे स्वीकार करेंगे कि 1989 के लोकसभाई चुनावों जिसमें राजीव गांधी को विश्वनाथ प्रताप सिंह के हाथों परास्त होना पड़ा था, का मुख्य मुद्दा बोफर्स तोप घोटाला था। और कोई भी यह नहीं भूल सकता कि राजीव गांधी जो 1984 में सभी रिकार्ड तोड़कर लोकसभा में 415 सीटों पर विजयी हुए थे, 1989 में 197 सीटों पर सिमट कर रह गए, जोकि आधे से भी कम होती हैं!
डा. मनमोहन सिंह द्वारा प्रतिपादित इस सिध्दांत कि भारत की जनता ने उनके निर्लज्ज घूसखोरी प्रपंच को स्वीकृति दे दी, तो क्या उन्हें पता है कि इसी तर्क पर 1989 के लोकसभाई जनादेश का अर्थ यह निकाला जाएगा कि भारतीय मतदाताओं ने राजीव गांधी को बोफर्स घोटाले में दोषी घोषित कर दिया ?
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निर्लज्जता की कोई सीमा नहीं
एक ही सप्ताह में, हिन्दू ने विकीलीक्स के आधार पर दो समाचार रिपोटें प्रकाशित की हैं जिसमें राष्ट्रीय राजनीति में प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह की स्थिति बुरी तरह से प्रभावित हुई है।
15 मार्च, 2011 को हिन्दू में प्रकाशित पहली रिपोर्ट कहती है कि भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम. के. नारायणन से अगस्त, 2009 में बातचीत के बाद अमेरिकी राजदूत टिमोथी रोइमर ने निष्कर्ष निकाला कि डा. एम.एस. सिंह पाकिस्तान से बातचीत और वार्ता के मामले में अपने दृढ विश्वास के चलते अपनी सरकार के भीतर ही अलग-थलग थे, और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी उनसे सहमत नहीं थे।
मैं मानता हूं कि आतंकवाद, पाकिस्तान और जम्मू-कश्मीर से जुड़े मुद्दों पर यदि भारतीय जनमत का मूल्यांकन किया जाए तो डा. मनमोहन सिंह न केवल अपनी सरकार अपितु जनता में भी अपने को अलग-थलग खड़ा पाएंगे।
लेकिन उनकी सरकार की छवि और यहां तक कि वैधता पर वास्तव में हथौड़े की जो मार पड़ी है जिसकी भरपाई नहीं हो सकती, वह हिन्दू में प्रकाशित दूसरी रिपोर्ट है जो दो दिन बाद यानी 17 मार्च, 2011 को प्रकाशित हुई है। इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि इस रिपोर्ट को अनेक समाचार पत्रों ने यू.पी.ए. की लिए विकीबोम्ब माना है।
समाचारपत्र को यह रिपोर्ट विकीलीक्स के हवाले से मिली है। इस समाचार को हिन्दू के प्रमुख राजनीतिक सम्पादक सिध्दार्थ वर्ध्दराजन ने लिखा है। रिपोर्ट के मुख्य पहलू यह हैं :
1- यह अमेरिका के चार्ज डी अफेयर्स स्टीवन व्हाईट ने वाशिंगटन को केबल भेजा है।
2- इस केबल में, व्हाईट दूतावास के राजनीतिक कांउसलर की राज्यसभा सदस्य सतीश शर्मा जोकि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के घनिष्ट सहयोगी और सोनिया गांधी के निकट पारिवारिक मित्र के रुप में जाने जाते हैं, से मुलाकात के बारे में लिखते हैं।
वर्ध्दराजन के अनुसार, श्री सतीश शर्मा ने अमेरिकी राजनायिक को बताया कि वह और पार्टी में अन्य लोग 22 जुलाई के विश्वास मत में सरकार की जीत सुनिश्चित करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। कांग्रेसी नेताओं द्वारा भारतीय जनता पार्टी और अकाली दल में सदस्यों पर डोरे डाले जाने का वर्णन करते हुए व्हाईट ने रहस्योद्धाटन के रुप में एक विस्फोट किया :
”शर्मा के राजनीतिक सहयोगी नचिकेता कपूर ने दूतावास के कर्मचारी को बताया कि 16 जुलाई को अजीत सिंह के राष्ट्रीय लोकदल को 10 करोड़ रुपए (2.5 मिलियन अमेरिकी डालर) उनके चार सदस्यों को सरकार का समर्थन करने के लिए दिए गए। कपूर ने उल्लेख किया कि पैसा कोई मुद्दा नहीं है लेकिन अहम यह कि जिन्होंने पैसा लिया है वे सरकार के पक्ष में वाट डालें।”
1- ”कपूर ने दूतावास के अधिकारी को लगभग 50-60 करोड़ रुपए (करीब 25 मिलियन डॉलर) से भरे दो बैग दिखाए जो घर में देने के लिए रखे थे।”
2- कांग्रेस पार्टी के अन्य भीतरी व्यक्ति ने राजनीतिक काउंसलर को बताया कि वाणिज्य और उद्योग मंत्री कमलनाथ भी इस काम में सहायता कर रहे हैं; इस वार्ताकार के मुताबिक, ”पहले, वह घूस के रुप में छोटे जहाज देने की पेशकश कर रहे थे; अब वह वोटों लिए जेट के लिए भी तैयार हैं।”
वर्ध्दराजन लिखते है: ”यह तथ्य कि कांग्रेसी राजनीतिज्ञ विश्वासमत के सिलसिले में अपने घूसखोरी अभियान के बारे में अमेरिकी राजनयिकों से खुलकर बात कर सकते हैं- और यह कि दूसरे भी लोकतंत्र के विध्वंश में इतने अलिप्त-यह सभी षड़यंत्रकारी हैं लेकिन अंतत: दोनों सरकारों के बीच क्षमकारी रणनीतिक भागीदारी को प्रदर्शित करता है जिसे बनाने के प्रयास हो रहे हैं।”
वर्ध्दराजन की इस तीखी टिप्पणी ने मुझे मेरे विशिष्ट सहयोगी जसवंत सिंह के शानदार भाषण का स्मरण करा दिया जो उन्होंने लोक सभा में गत् सप्ताह विदेश मंत्रालय की अनुदान मांगों पर बहस की शुरूआत करते हुए दिया।
भारत सरकार की पाकिस्तान नीति का उल्लेख करते हुए जसवंत सिंह ने कहा:
”चाहे पाकिस्तान हो या अफगानिस्तान, हमारी नीति अब हमारी नहीं रहीं। मान लिया गया है कि पाकिस्तान अमेरिकी नीति के लिए अनिवार्य है। यहां तक कि आपको बहस नहीं करनी है। मुझे अच्छी तरह से स्मरण है, श्रीमान। मैं साऊथ ब्लॉक (विदेश मंत्रालय) से निकल कर नार्थ ब्लॉक (वित्त मंत्रालय) में जा चुका था। वहां एक व्यक्ति मुलाकात के लिए आए। मैं नहीं जानता कि मुझे उसका नाम लेना चाहिए या नहीं। वह एक अमेरिकी अधिकारी था। हृष्ट-पुष्ट शरीर वाला। वह मुझे वित्त मंत्रालाय में मिलने आया। तब मैंने उसे बताया कि मैं उनसे गुस्सा नहीं हूं। लेकिन आपने (हमें) गलत समझा। यदि भारत की नीति प्रबन्ध में मुझे कुछ करना होगा तो मैं कभी भी अमेरिका से पाकिस्तान के सम्बन्ध में कुछ भी नहीं पूछुंगा। यह रिकार्ड पर है। श्रीमान, यह गर्वोक्ति नहीं थी। तब मैं भारत का एक प्रतिनिधि था। मैं आपसे अनुरोध करता हूं कि अमेरिका के सहारे मत रहिए क्योंकि हम अपने उत्तर आप ढूंढ लेंगे। लेकिन यदि आप अमेरिका के माध्यम से उत्तर पाने का प्रयास करोगे या उत्तर पाओगे तो हम कभी भी उत्तर नहीं पा सकेंगे।”
लालकृष्ण आडवाणी
नई दिल्ली
19 मार्च, 2011
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