फुकुशिमा हमें सतर्क बनाए
मई 2004 से डा. मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री हैं। अमेरिका के साथ परमाणु सौदे के मुद्दे पर वामपंथी पार्टियों द्वारा यूपीए सरकार से समर्थन वापस लेने पर उनकी सरकार को संसद में जुलाई 2008 में बहुमत सिध्द करने की गंभीर चुनौती झेलनी पड़ी।
सरकार अल्पमत में रह गई और सांसदों को घूस देकर बहुमत जीतने का फैसला किया गया, और यह सब सरेआम तथा निर्लज्जता से किया गया। तीन भाजपा सांसदों ने वास्तव में व्हिसल ब्लोअर (भण्डा फोड़ने वाला) की भूमिका निभाई और 22 जुलाई को लोकसभा में विश्वासमत की बहस के दौरान टीवी कैमरों की चकाचौंध के सामने सेंट्रल टेबल पर करोड़ रुपए रखे जो उन्हें घूसखोरी के रुप में देने की पेशकश की गई थी।
उस सुबह द हिन्दू के सिध्दार्थ वर्ध्दराजन ने लिखा था: ”मंगलवार के विश्वास मत पर यदि सरकार जीत भी जाती है तो प्रधानमंत्री और कांग्रेस को उनकी जीत से जुड़ी अनियमितताओं के दागों के साथ ही रहना होगा।”
पिछले महीने ही विकीलीक्स पर आधारित प्रकाशित समाचारों में बताया गया था कि कैसे सांसद सतीश शर्मा के निवास पर अमेरिकी दूतावास के अधिकारी को 50-60 करोड़ रुपए से भरे दो बैग दिखाए गए थे, वर्ध्दराजन ने सन् 2008 में लिखे गए को स्मरण करते हुए लिखा था: ”उस दिन ही यूपीए ने अपना नैतिक आधार खो दिया था और अपनी राजनीतिक वैधता भी।”
इन दिनों सुर्खियों बनती घोटालों की अंतहीन श्रृंखला और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मनमोहन सिंह सरकार की लगातार आलोचना (हाल ही में कालेधन के बारे में : ‘क्या सरकार सो रही है‘?) इसके नैतिक आधार जिसे एक केंद्रीय मंत्री ने नैतिक कमी के रुप में वर्णित किया है, को गंवाने के सशक्त संकेतक हैं आज मैं यह जोर देकर कहना चाहता हूं कि फुकुशिमा से नई दिल्ली द्वारा कोई सबक सीखने से कतराने वाली सरकार कैसे राजनीतिक आधार भी खोती जा रही है।
अब यह सभी को पता है कि जापान में हुई त्रासदी ने दुनिया भर में परमाणु उर्जा सयंत्र वाले सभी देशों को कितना प्रभावित किया है।
जर्मन चांसलर अंगेला मारकेल ने अपने सातों परमाणु संयंत्रों को तीन महीने तक बंद करने का आदेश दिया है और इस अवधि में इनको सुरक्षा सम्बंधी मानकों से जांचा जाएगा। चांसलर ने कहा है कि अन्य संयंत्र भी सुरक्षा मानकों की कसौटी पर फिर से परखे जाएंगे।
चांसलर मारकेल कहती हैं:
”जापान में आई आपदा से न केवल जर्मनी अपितु समूचे विश्व के लिए अचानक एक अलग ही
भिन्न स्थिति पैदा हो गई है।”
”हमें इसे एक अवसर मानकर पूरी तरह से खुले दिमाग से स्थिति की समीक्षा करनी चाहिए।”
न केवल जर्मनी अपितु दुनिया के लगभग सभी प्रमुख देश जिनके पास परमाणु संयंत्र हैं, ने ऐसे ही कदम उठाए हैं।
यूरोप के 14 देशों में 143 परमाणु उर्जा संयंत्र लगे हुए हैं। यूरोपीय संघ के उर्जा प्रमुख गुथेंर उगेईटिंगेर ने घोषित किया है कि भूकम्प और जल के उंचे स्तर से सभी परमाणु संयंत्रों पर सम्भावित नुकसान के जोखिम अनुमानों का पता लगाया जाएगा।
रुसी प्रधानमंत्री व्लादिमीर पुतिन और स्पेन के प्रधानमंत्री जोस ल्युइज रोट्रिग्युज जापातेरो ने भी ऐसी ही घोषणाएं की हैं।
दुनिया के सर्वाधिक परमाणु आधारित राष्ट्र फ्रांस ने जापान के संकट से सबक सीखा है। राष्ट्रपति निकोलस सारकोजी ने देश के सभी परमाणु रिएक्टरों के सुरक्षा तंत्र के परीक्षण का आदेश दिया है और इन परिणामों को सार्वजनिक करने की बात कही है।
इस पृष्ठभूमि में, यह आश्चर्यजनक लगता है कि भारत सरकार के प्रवक्ता ने नए परमाणु उर्जा संयत्रों को स्थापित करने की जल्दबाजी करने के विरुध्द आवाज उठाने वालों का वस्तुत: मजाक उडाया है।
यदि किसी पर्यावरणविद् ने जापान की त्रासदी को नजरअंदाज करने विशेषकर उन देशों जो भूकंपरोधी क्षेत्रों के रूप में जाने जाते हैं के बारे में सचेत किया जो उसे पर्यावरण मंत्री का यह ताना सुनने को मिला कि यह कैसा विरोधाभास है कि पर्यावरणविद् परमाणु ऊर्जा के विरूध्द हैं।
महाराष्ट्र के जैतापुर में भड़के जनाक्रोश के प्रति अपने अड़ियल रवैये की व्याख्या करते हुए जयराम रमेश ने कहा कि वे निम्नलिखित चार उद्देश्यों को साधने का प्रयास कर रहे हैं:
1) नौ प्रतिशत वृध्दि दर बनाये रखने के लिए आवश्यक ऊर्जा
2) ईंधन मिश्रण का अनुपात
3) पर्यावरणीय चिंताएं और
4) रणनीतिक कूटनीति, विशेषकर परमाणु सौदे के बाद
किसी को इनमें से पहले तीनों उद्देश्यों के बारे में कोई आपत्ति नहीं होगी। लेकिन पर्यावरण मंत्री के लिए ‘रणनीतिक कूटनीति‘ कैसे उद्देश्य हो सकता है बशर्ते कि यह न मान लिया जाए कि यूपीए के बहुमत को खोने के जोखिम के बावजूद सौदे पर हस्ताक्षर करने का एक उद्देश्य यह भी था कि अमेरिका की परमाणु कम्पनियों के व्यवसायिक हितों को प्रोत्साहित किया जाएगा ? पोलैण्ड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने कहा ”ऊर्जा वैवधीकरण बहुत महत्वपूर्ण हैं लेकिन साफ है कि नागरिकों की सुरक्षा सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारक है।” क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि सुरक्षा का यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व जयराम रमेश द्वारा स्पष्ट किए गए उद्देश्यों में कहीं भी स्थान नहीं पा सका है!
***
पश्चिम बंगाल में चुनावी प्रचार अभियान के दौरान् मुझे बीरभूम जिले के वनवासी क्षेत्र (उत्तार 24 परगना) में जाने का अवसर मिला। यहां का संदेश खाली निवार्चन क्षेत्र अनुसूचित जनजाति क्षेत्र के लिए आरक्षित है। यहां से भाजपा प्रत्याशी सुकुमार सरदार हैं जो आदिवासी कल्याण परिषद के माध्यम से अपने समाज की सेवा कर रहे हैं।
एक बड़ी सभा को सम्बोधित करने से पूर्व मैने स्थानीय लोगों से उन मुख्य समस्याओं को जानना चाहा जो उन्हें परेशान करती हैं। उनका तत्काल उत्तार था: स्वास्थ्य देखभाल। उन्होंने मुझे बताया कि संदेश खाली में अस्पताल है परन्तु कोई डॉक्टर नहीं है!
उस शाम मैंने अपने भाषण में सुबह के समाचारपत्रों में छपे उस समाचार का उल्लेख किया जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अमेरिकियों की इसके लिए आलोचना की है कि वे इलाज के लिए भारत की ओर भागते हैं।
भारत में अस्पताल चलाने वालों ने अमेरिकी राष्ट्रपति के वक्तव्यों की तीखी आलोचना की है - विशेष रुप से उनके इस वक्तव्य की कि अमेरीकी भारतीय अस्पतालों में इसलिए जाते हैं क्योंकि वे सस्ते हैं। हृदय रोग विशेषज्ञ और ग्लोबल हैल्थ के सीएमडी डा. नरेश त्रेहन ने कहा: ”ओबामा अपने देश में स्वास्थ्य सेवाओं के सुधार के वायदे पर जीते थे जोकि खराब हालत में है” डा0 त्रेहन ने कहा कि अमीर देशों से लोग भारत इसलिए आना चाहते हैं कि उन्हें गुणवत्ता वाला मेडिकल उपचार मिलता है जो और कहीं भी उपलब्ध नहीं है। कई बार तो उससे भी उत्ताम और निश्चित रुप से वहन करने योग्य भी ।
मुझे स्मरण आता है कि अनेक वर्ष पूर्व जब मैं एक विदेश यात्रा पर गया था तब मुझे विदेशों में भारतीय डाक्टरों को मिलने वाले अत्याधिक सम्मान की पहली झलक देखने को मिली थी। श्री मोरार जी देसाई की सरकार में सूचना एवं प्रसारण मंत्री के रुप में मैं यूनेस्को के सम्मेलन मे भाग लेने मलेशिया की राजधानी कुआलालम्पुर गया था।
भारतीय दूतावास द्वारा आयोजित स्वागत समारोह में मुझे अनेक मलेशियाईं और भारतीयों के साथ बातचीत करने का मौका मिला। कार्यक्रम में उपस्थितों में से अनेक सिख बन्धु थे। बातचीत के दौरान मुझे बताया गया कि प्रभावशाली मलेशियाई सेवानिवृत होने के बाद सामान्य तौर पर यूरोप में जा कर बस जाते हैं। लेकिन एक प्रवृति साफ तौर देखी गई थी कि इनमें से जो कोई भी कोई बीमार पड़ जाता और उसे सर्जरी की जरुरत पड़ती, तो प्रभावशाली व्यक्ति कुआलालम्पुर आकर ऑपरेशन कराकर वापस लौट जाते हैं।
मेरी टिप्पणी थी कि यह आपके डाक्टरों की प्रशंसा है।
इतना ही नहीं मुझे बताया गया कि वहां भारतीय सर्जनों को काफी सम्मान प्राप्त है। मुझसे गपशप कर रहे व्यक्ति ने मजाकिया लहजे में कहा कि वास्तव में, बेहोशी के बाद होश में आने पर यदि मरीज ऑपरेशन थियेटर में पगड़ी और ढाढ़ी वाले सिख सर्जन को देखरेख करते देखता है तो उसे विश्वास होता है कि सब कुछ ठीकठाक हुआ है।
लालकृष्ण आडवाणी
नई दिल्ली
24 अप्रैल, 2011
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April 26th, 2011 at 12:25 pm
आदरणीय श्री अडवाणी जी सादर चरण स्पर्श ,
सर, वर्तमान सरकार ने जो किया है वो लिखते हुए मुझमे घ्रणा,नफरत के भाव उत्पन्न हो रहे है न देश के लोगो की सोचा न प्रकुर्ति के बारें में सोचा, कुछ सोचा तो सिर्फ निजी स्वार्थ के लिए …..
एक लतीफा आपसे कहना चाहूगा ! एक पति अपनी मोटी पत्नी से कहता है, डार्लिंग तड़प तड़प के मरना अच्छा है या एक बार में मर जाना पत्नी बोली एक बार में मर जाना , पति बोला डार्लिंग फिर दूसरा पैर भी मेरे उपर रख लो !
अब खुदा से यही दुआ है या तो सरकार बदल जाये या २१ मई की विनाश भविष्यवाणी सच हो जाये !
धन्यवाद्
April 26th, 2011 at 10:10 pm
आदरणीय आडवानी जी चरण स्पर्श !
मैं आप का ध्यान प्रज्ञा सिंह कि तरफ आकर्षित करना चाहता हूँ | कि क्या किसी महिला के साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है जैसे प्रज्ञा सिंह के साथ किया जा रह है | प्रज्ञा सिंह के बारे में पढ़ कर रूह काप जा रहा है | सोचिये कि जिस पर गुजर रही है क्या हाल होगा ? मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हू कि आप और आप कि पार्टी कम से कम उनके साथ होने वाले दुर्व्यवहारो का विरोघ तो कर सकते है | उनके साथ क्यों पशुओ से भी गया गुजर व्यवहार किया जारहा है ? अभी तक क्या आरोप सिद्ध हुए है ?
अगर आप हिन्दुओ कि बात करते है तो प्रज्ञा सिंह का ख्याल रखाना होगा वर्ना हिन्दुओ के नाम पर वोट मांगने का कोई अधिकार नहीं है आप लोगो के पास |हिंदू सदियों से सताए, दबाए गए है आज भी वही हो रहा है | हिंदू सिर्फ राजनीतिज्ञों के हाथ का खिलौना मात्र रह गया है|
.. next..
April 26th, 2011 at 10:11 pm
…. कसाब और अफजल जैसे आतंकवादियों के साथ जेल में एक स्पेशल मेहमान कि तरह रखा जाता है जिस पर आरोप तय हो चुके है , सजा हो चुकी है | लेकिन वही एक आरोपी महिला के साथ दरिंदों जैसे व्यवहार किया जा रहा है |
आखिर क्यों ?
आखिर क्यों ?
आखिर क्यों ?
अगर आप के पास समय होतो तो कृपया ये ब्लॉग जरुर पढ़े |
http://blog.sureshchiplunkar.com/2011/04/sadhvi-pragya-malegaon-bomb-blast-sunil.html
( अगर कोई बंधू ब्लॉग लेखन में सहायक होतो मेरी बात अडवानी जी तक जरुर पहुचाये )
सुजीत सिंह
insujeet@gmail.com
May 4th, 2011 at 7:24 am
मौजूदा सरकार की हालत दयनीय है, वह बेबस सी नजर आती है, क्या इसका एक मात्र विकल्प आगामी चुनाव का इंतजार करना ही है