मुख्य मुद्दा क्रिकेट नहीं, भारत है
कोई भी मुकाबला सर्वदा उत्तेजना और अपेक्षाओं को जन्म देता है।
यह दो सेनाओं के बीच युध्द हो सकता है, या दो राजनीतिक दलों के बीच चुनावी लड़ाई या दो प्रतिस्पर्धी टीमों में खेलों का मैच।
सफलता विजेता को आनन्द देती है और असफलता हारने वाले को निराश करती है।

6 दशक से अधिक सार्वजनिक जीवन में व्यतीत करने वाले व्यक्ति के रुप में, मैं ऐसे अनेक अवसर स्मरण कर सकता हूं जो तीनों प्रकार की घटनाओं से जुड़े हैं, इनमें से कुछ को हर्षित करने वाला तो कुछ को हतोत्साहित करने वालों में शामिल किया जा सकता है।
लेकिन मैं बताना चाहता हूं कि जब 2 अप्रैल को रात्रि 11.30 बजे के आस-पास टीम इण्डिया के कप्तान एम.एस. धोनी ने छक्का लगाकर श्रीलंका को हराया, जबकि इस मैच की शुरूआत से अंत तक यह रहस्य बना हुआ था कि कौन जीतेगा। देश के लिए वर्ल्ड कप जीता, तो वानखेड़े स्टेडियम में मेरे जैसे हजारों लोगों के लिए यह हमेशा के लिए एक अविस्मरणीय क्षण बन गया।
वास्तव में, मैं ऐसे अनेक अवसर गिना सकता हूं जिन्होंने मुझे और भारतीयों को सामान्य तौर पर प्रसन्नता पहुंचाई है। लेकिन मैं इसके सिवाय किसी अन्य घटना को याद नहीं कर सकता कि जब समूचे भारतीयों-शहरी-ग्रामीण, जात, समुदाय, भाषा या क्षेत्र-समुदाय को एक साथ से सबको इतना गौरवान्वित कर दिया हो जैसा कि वर्ल्ड कप के अंतिम नतीजों को सुनने के बाद किया हो।
भारत को वर्ल्ड कप इत्यादि देने के समारोह का कार्यक्रम मध्य रात्रि तक चला। लेकिन स्टेडियम के आस-पास, मरीन ड्राइव सहित सुबह तड़के तक लोगों का जमघट लगा रहा।
स्टेडियम में दिखने वाला दृश्य तो देखते ही बनता था। हजारों झण्डे लहरा रहे थे। वंदेमातरम, सारे जहां से अच्छा जैसे गीत गाए जा रहे थे और खिलाड़ियों की जय-जयकार हो रही थी। भावनाएं और अहसास वस्तुत: उमड़ रहे थे।
मेरी बेटी प्रतिभा अपने साथ राष्टी्रय तिरंगा लेकर गई थीं और जब धोनी, सचिन और उनके सहयोगी स्टेडियम का चक्कर लगा रहे थे तो डा0 फारूक अब्दुल्ला, शाहनवाज हुसैन, प्रतिभा और मैं भी भारतीय टीम को बधाई देते हुए तिरंगा लिए खड़े थे। चूंकि हम विशेष बॉक्स में बैठे थे जिसमें भारत और श्रीलंका के राष्ट्रपति भी बैठे थे, तो मैंने इस अवसर का लाभ उठाते हुए दोनों टीमों द्वारा खेले गए शानदार मैच के लिए दोनों राष्ट्रपतियों को बधाई दी।
मैं चाहता हूं कि यह समझा जाए की मुख्य मुद्दा क्रिकेट नहीं है बल्कि यह देश है, यह भारत है। करोड़ों लोग जो क्रिकेट के बारे में कुछ भी नहीं समझते परन्तु इन विजय समारोहों में उत्साहपूर्वक भाग ले रहे थे, क्योंकि उनके लिए यह वास्तव में भारत माता की जय है। मीडिया की कुछ महत्वपूर्ण सुर्खियां यह थी:
बिंदिया, विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, दुनिया हमारे कदमों में इत्यादि।
विश्व कप विजय के बाद दिन भर निम्न गाने सुनने को मिलते रहे:
ये दुनिया एक दुल्हन दुल्हन, ये माथे की बिंदिया, आई लव माई इंडिया; चक दे इण्डिया, इत्यादि।
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स्वर्गीय मधु दण्डवते और मैं न केवल घनिष्ठ मित्र और साथ-साथ सांसद थे अपितु जीवन में अनेक अविस्मरणीय क्षणों के भी भागीदार रहे हैं। 1975-77 के आपातकाल के दौरान हम दोनों बंगलौर सेंट्रल जेल और रोहतक जिला जेल में कैदी के रूप में साथ-साथ रहे। आपातकाल के बाद मोरारजी देसाई की सरकार में हम दोनों ही केबिनेट मंत्री थे। दण्डवते को रेल मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई थी जबकि मैंने प्रधानमंत्री से आग्रह किया था कि मुझे सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय दिया जाए और आपातकाल के दमघोटूं सेंसरशिप से मीडिया को मुक्त कराने की जिम्मेदारी सौंपी जाए। मोरारजी भाई ने मेरे पूर्व पत्रकार होने को मान्यता देते हुए मेरे अनुरोध को स्वीकार कर लिया।
मुझे स्मरण है कि सत्तर के दशक के अंत में मुंबई से ‘जैन्टलमैन‘ नाम का साप्ताहिक प्रकाशित हुआ करता था। यह एक सुन्दर प्रकाशन था। 1979 में मोरारजी की सरकार गिरने के बाद इस साप्ताहिक ने हम दोनों -दण्डवते और मुझे - अनुरोध किया कि चूंकि अब हम विपक्ष में हैं - इस ‘जैन्टलमैन‘ के लिए पाक्षिक स्तम्भ लिखना शुरू करें जिसमें तत्कालीन राजनीतकि मुद्दों पर विपक्ष का दृष्टिकोण दिया जा सके और जिसे वे वैकल्पिक रूप से प्रकाशित करेंगे।
बहुतों को पता नहीं होगा कि हम दोनों ने इस पत्रिका के लिए दस वर्ष से ज्यादा समय तक स्तम्भ लिखे। यह बात मैंने मिन्हाज मर्चेंट को स्मरण कराई जो उन दिनों ‘जैन्टलमैन‘ में हुआ करते थे तथा गत् फरवरी में जिनकी फोन कॉल से मुझे सुखद आश्चर्य हुआ।
मर्चेण्ट ने ‘जैन्टलमैन‘ के अपने दिनों को स्मरण कराया और बताया कि आजकल वह मर्चेण्ट मीडिया लिमिटेड के एडिटर-इन-चीफ हैं और गवर्नमेंट वॉच के संस्थापक।
उन्होंने और एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) के सह-संस्थापक और न्यासी अजीत रानाडे ने मुंबई प्रेस क्लब के साथ मिलकर ‘राष्ट्रीय नेताओं को उत्तरदायी‘ (holding national leaders to account) बनाने संबंधी द्विमासिक श्रंखला की शुरूआत मुझसे करने की इच्छा की थी। कार्यक्रम का शीर्षक था ‘फेस दि प्रेस‘ (प्रेस से सामना)।
मैंने उनके प्रस्ताव को स्वीकार किया और सुझाया कि इसे संसद के बजट सत्र के तुरंत बाद शुरू किया जा सकता है।
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संसद का बजट सत्र 25 मार्च, 2011 को समाप्त हो गया। एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफार्मस (ADR), गवर्नमेंट वॉच (GW) और प्रेस क्लब, मुंबई को यह नवीन कार्यक्रम 28 मार्च, 2011 को मुंबई प्रेस क्लब में सम्पन्न हुआ।
मुझसे संवाद करने वाले सम्पादकों के पैनल में थे: एन. राम, मुख्य सम्पादक, दि हिन्दू; उदय शंकर, चीफ एक्जीक्यूटिव, स्टार इण्डिया; कुमार केतकर, दैनिक भास्कर समूह। इस संवाद का संचालन मिन्हाज मर्चेंट और अजीत रानाडे ने किया।
यह संवाद लगभग डेढ़ घंटे तक चला। मेरे ख्याल से इसका शब्दश: रिकार्ड रखा गया है। इसे कवर करने के लिए अनेक चैनल मौजूद थे। कुछ हिस्से बाद में दिखाए गए। प्रेस क्लब हॉल पूरा भरा हुआ था और बाहर लॉन में मौजूद प्रेस वालों के लिए बड़ी स्क्रीन लगाई गई थी।
31 मार्च, 2011 को ‘मिंट‘ ने आधिकारिक तौर पर रखे गये रिकार्ड से सम्पादित इसके अंशों को पूर्ण पृष्ठ पर प्रकाशित किया है। इन्हें निम्न वेबसाइट से देखा जा सकता है:
http://www.livemint.com/2011/03/30200337/Why-can8217t-we-have-fixed.html?atype=tp#
पैनल के साथ अपनी बातचीत के दौरान मैंने श्री एन. राम को विकीलीक्स जिनका सीधा असर भारतीय मामलों पर पड़ता है, को सार्वजनिक कर देश की शानदार सेवा करने के लिए सराहना की।
मैंने विशेष रुप से ‘दि हिन्दू‘ के राजनीतिक सम्पादक सिध्दार्थ वरदराजन द्वारा नोट के बदले वोट काण्ड के गहन विश्लेषण की प्रशंसा की। 18 मार्च के ‘दि हिन्दू‘ के अंक जिसमें अमेरिका के चार्ज डी एफयेर्स स्टीवन वहाडट द्वारा वाशिंगटन को भेजे गए ‘केबल‘ में बताया गया है कि अमेरिका के पोलिटकल कांऊसलर को सांसद सतीश शर्मा के घर पर लगभग 50 से 60 करोड़ रुपये के करेंसी नोटों से भरे बैग दिखाए गये और उन्हे बताया गया कि ‘पैसा कोई मुद्दा नहीं है, सर्वाधिक महत्वपूर्ण यह सुनिश्चित करना है कि जिन्होंने ने पैसा लिया है वे सरकार के लिए वोट करें।‘
18 मार्च, 2011 के इसी अंक में, वरदराजन ने ”घूसखोरी के आरोपों की जांच अब होनी ही चाहिए” (bribery charge must now be investigated) शीर्षक से लेख लिखा है। इस लेख में एक महत्वपूर्ण अनुच्छेद यह है :
22 जुलाई, 2008 को विश्वास मत की पूर्व संध्या मैने ‘दि हिन्दू‘ में एक आलेख लिखा था, जिसमें मैंने कहा था इतना ही नही मंगलवार को यदि सरकार विश्वास मत जीतती है, तो भी प्रधानमंत्री और कांग्रेस इस विजय के साथ जुड़े अनुचितता के दागों का धो नहीं पाएगी” जितना इसके बारे में, मै सोचता हूं उतना ही मैं मानता हूं कि सुस्ती, सुझाव और भ्रष्टाचार जिसके बारे में मै अनेक समीक्षकों ने मनमोहन सिंह सरकार सरकार की दूसरी पारी की निंदा की है , उसकी जडें विश्वासमत जीते जाने के तरीके में है। उस दिन यू.पी.ए सरकार ने अपनी नैतिकतादी और इसके साथ ही राजनैतिक वैधता भी।
टेलपीस (पश्च लेख)
एक समय था जब संसदीय बहसों में महावीर त्यागी, पीलू मोदी और मधु दण्डवते जैसे सांसदों की उपस्थिति अक्सर बहसों में हाजिरजवाबी और विनोद का पुट ला देती थी।
दण्डवते के साथ अपने सम्बन्धों को स्मरण करने के बाद उनके द्वारा सुनाए गए एक चुटकुले को यहां बताना उपयुक्त होगा जो मैंने तब सुना था जब 1975 के आपातकाल में उन्हें एस.एन. मिश्रा और मुझे बंगलौर जेल से रोहतक जेल में स्थानान्तरित किया गया था। हम लोग 25 जून, 1975 को बंगलौर में एक संसदीय समिति की बैठक में भाग लेने गए थे। उसी रात को आपातकाल थोप दिया गया और अगली सुबह हमें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।
हमने मीसा में बंदी बनाए जाने के विरोध में कर्नाटक उच्च न्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी। स्वयं मुख्य न्यायाधीश हमारी याचिका की सुनवाई कर रहे थे और न्यायालय का कक्ष वकीलों से भरा रहता था। न्यायाधीशों द्वारा की गई टिप्पणियों से सरकार को साफ हो गया था कि न्यायालय मीसा आदेश को निरस्त कर हमें रिहा करने पर आमदा है।
इसलिए नई दिल्ली ने अपने पूववर्ती आदेश को निरस्त करने, हमें रिहा करने और तुरंत नए आदेश के तहत पुन: गिरफ्तार करने तथा हमें रोहतक स्थानान्तरित करने का निर्णय लिया। जब हम रोहतक पहुंचे तब मध्य रात्रि हो चुकी थी और भारी बारिश हो रही थी।
जेल अधिकारियों के साथ रोहतक में हमारा पहला सामना कोई सुखद नहीं रहा। जेल के उप-अधीक्षक, जिसका नाम सैनी था, ने हमारे प्रवेश के संबंध में औपचारिकताओं को पूरा करने के लिए एक अपराधी वार्डर से हमारे सामान की जांच-पड़ताल करने को कहा। इसमें कैसी जांच-पड़ताल! हमारे कपड़ों और पुस्तकों को देखने के बाद निराशा हाथ लगने पर वार्डर ने हमारी चप्पलों के तल्ले में ढूंढना शुरू किया कि हमने वहां कोई गुप्त कागजात तो नहीं छुपा रखे हैं। कष्टदायक यात्रा और रातभर जगे रहने से श्याम बाबू का दबा हुआ गुस्सा उप-अधीक्षक पर फूट पड़ा। मधु दंडवते ने विनोदपूर्ण मुद्रा में उनपर टिप्पणी की, ‘श्रीमती गांधी ने अवश्य ही इन्हें Soul-searching (आत्म-निरीक्षण) के लिए कहा है; लेकिन वह s-o-u-l (आत्मा) निरीक्षण है न कि s-o-l-e (जूते का तला) निरीक्षण।‘
लालकृष्ण आडवाणी
नई दिल्ली
4 अप्रैल, 2011
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April 7th, 2011 at 2:40 pm
आदरणीय श्री अडवाणी जी सादर चरण स्पर्श ,
विश्वकप जीतने की आपको बधाई , आपको बधाई देने के मेरे पास बहुत कारण है परन्तु महत्वपूर्ण कारण है की इस जीत से बहुत दिनों के बाद देश में ख़ुशी आई है वरना घोटालो , भ्रष्टाचार के आलावा कुछ नहीं दिख रहा था जब हम आम आदमी तनाव में थे तो आप देश के शीर्ष पे है आप कितने दुखी होगे देश की हालत जो हो रही है उसे देख के, मुझे ख़ुशी है की विश्वकप की विजय से हमे और आपको थोडा सुकून मिला !
सर भारत देश के १५ खिलाडी परिश्रम , ईमानदारी , द्रद्दसंकल्प,देशप्रेम की भावना से विश्वकप जीत सकते है परन्तु देश पे दशको तक शासन करने वाली सत्तारुड पार्टी(कांग्रेस) गरीबी ,बेरोजगारी , भुखमरी ख़त्म नहीं कर पाती इसके विपरीत ये चीजे निरंतर उन्नति कर रही है उसका कारण है, सरकार के पास परिश्रम , ईमानदारी , द्रद्दसंकल्प,देशप्रेम की भावना की कमी है !
धन्यवाद्
April 13th, 2011 at 2:04 am
माननीय आडवाणी जी ..देश क्रिकेट मे जीता, ये हम सब लोगों के लिए बहुत ही ज़्यादा खुशी की बात है.. यहाँ परदेश मे रह कर भी हमने अपनी जीत के हर एक क्षण का अनद लिया ..परंतु जो बात हम सबको आज सबसे ज़्यादा व्यथित करती है वो है आकंठ भ्रष्टाचार me dooba hindustan..kuchh kijiye aap log..
hamen aap logon se bahut ummiden hain..
April 13th, 2011 at 8:03 am
श्री आडवानी जी ,
सादर अभिवादन !
बहुसंख्यक राजनेताओं ने अपने चरित्र और आचरण से लोकतंत्र को दूषित किया हैं और यह प्रदूषित लोकतंत्र ही स्वंय अपने अपमान का कारण बन रहा हैं !