लोकतंत्र और सेकुलरिज्म की जडें
राजधानी नई दिल्ली से एक नया साप्ताहिक शुरू हुआ है। इसके सम्पादक एम.जे. अकबर और चेयरमैन राम जेठमलानी हैं। साप्ताहिक का नाम है ‘द संडे गार्जियन’ (The Sunday Guardian).
इस पत्रिका के पिछले संस्करण (4 अप्रैल, 2010) में जेठमलानी का एक दिलचस्प लेख प्रकाशित हुआ है। लेख का शीर्षक उकसाने वाला लगता है: ”हिन्दुत्व भाजपा की सम्पत्ति नहीं है” (Hindutva is not property of BJP)। मेरी पार्टी के कुछ सहयोगी इस पर आपत्ति करते हुए मान सकते हैं कि यह आलोचनात्मक है। जबकि ऐसा नहीं है, यह प्रशंसात्मक है।
वस्तुत: इसमें जोर दिया गया है कि भारतीय सेकुलरिज्म की जड़ें हिन्दुत्व में हैं। जेठमलानी ने सर्वोच्च न्यायालय में शिवसेना के नेता मनोहर जोशी का केस बहुत अच्छे ढंग से प्रस्तुत किया और न्यायमूर्ति वर्मा का हिन्दुत्व पर उल्लेखनीय निर्णय पाने में सफलता हासिल की जिसमें न्यायालय ने घोषित किया: ”हिन्दुत्व एक जीवन पध्दति है या मनोवृत्ति है और इसे मजहबी हिन्दू कट्टरपंथ के रूप में नहीं समझा जा सकता।” अपने लेख में विद्वान वकील ने लिखा है: ”यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भाजपा लोगों को यह समझाने में असफल रही है कि हिन्दुत्व और भारतीय सेकुलरिज्म वास्तव में समानार्थी हैं।”
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अस्सी के दशक में जब मैं भाजपा का अध्यक्ष था तो मुझे कनाडा के टेलीविजन की एक टीम का फोन आया। नई दिल्ली आई हुई इस टीम के बारे में मुझे बताया गया कि वह एक टेलीविजन धारावाहिक बना रहे हैं जिसका शीर्षक है ”विश्वभर में लोकतंत्रों का उदय और पतन” (The Rise and Fall of Democracies around the Globe).
कार्यक्रम के प्रस्तोता जो मुझसे मिले, ने कहा ”भारत में पिछले चार दशकों से जिस तरह से लोकतंत्र चल रहा है और केन्द्र तथा राज्यों में मतदान बक्सों के माध्यम से सरकारों का परिवर्तन सहज और शांतिपूर्ण ढंग से होता रहा है, उससे हम अत्यन्त प्रभावित हैं। हम मानते हैं कि आप उन कुछ राजनीतिक नेताओं में से हैं जिन्होंने स्वतंत्र भारत के पहले आम चुनाव (1952) से लेकर अभी तक सक्रिय भाग लिया है। इसलिए हम आपका साक्षात्कार लेना चाहते हैं।”
यह टीम अशोक रोड स्थित हमारे पार्टी कार्यालय में आई और मुझसे मेरा विश्लेषण पूछना चाहती थी कि इस देश में लोकतंत्र इतना सफलतापूर्वक कैसे चल रहा है। मेरा उत्तर था ”मैं मानता हूं कि सफल लोकतंत्र के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व यह है कि देश के लोगों को यह स्वीकारने के लिए तैयार रहना होता है कि किसी भी मुद्दे पर विभिन्न विचार होना स्वाभाविक है और नागरिकों में सामान्यतया अपने से विपरीत विचारों वाले के प्रति भी सहिष्णुता का भाव होना चाहिए, और भारत में यह सर्वदा रहा है।”
मानव इतिहास में, विभिन्न विचारों के प्रति असहिष्णुता अधिकांशतया धार्मिक क्षेत्र में प्रकट होती रही है। पश्चिम में, गैलेलियो जैसे विख्यात वैज्ञानिक को प्रताड़ना सहनी पड़ी और उन सभी वैज्ञानिक खोजों को वापस लेना पड़ा जो मजहबी ग्रंथों के विरूध्द थीं, भले ही वैज्ञानिक आधार पर इन खोजों की विश्वसनीयता संदेहों से ऊपर थी।
इसके एकदम विपरीत, भारत में विशुध्द धार्मिक मामलों में भी खुला दिमाग और उदार दृष्टि रही है। ईश्वर में विश्वास रखने वालों के बीच हमारे यहां घोर भौतिकवादी और ईश्वर को न मानने वाले चार्वाक जैसे नास्तिक भी हुए जो ईश्वर के अस्तित्व, पुनर्जन्म के सिध्दान्त पर प्रश्नचिन्ह लगाने तथा खाने, पीने, और आनन्द उठाने को ही जीवन प्रतिपादित करने वाले को न केवल ‘सहन किया गया’ अपितु वास्तव में उन्हें ‘ऋषि चार्वाक’ के रूप में सम्मान दिया गया।
न्यूजवीक इंटरनेशनल के सम्पादक फरीद जकरिया ने हाल ही में लिखित पुस्तक ”द पोस्ट- अमेरिकन वर्ल्ड” में बारम्बार इस पर जोर दिया है कि हिन्दुइज्म सही माने में सिर्फ मज़हब नहीं है । जकरिया लिखते हैं:
”हिन्दुइज्म का प्रत्येग वर्ग और उपवर्ग अपने भगवान, देवी या पवित्र व्यक्तियों की पूजा करता है। प्रत्येक परिवार हिन्दुइज्म की अपनी विशिष्ट पहचान धारण करता है। आप कुछ विश्वासों के प्रति अपना सम्मान प्रकट कर सकते हैं और अन्यों के लिए नहीं। आप शाकाहारी भी हो सकते हैं या मांस खा सकते हैं। आप प्रार्थना कर सकते हैं या नहीं भी। इसमें से कोई भी यह निर्धारित नहीं कर सकता कि क्या आप हिन्दू हैं। कोई विधर्मी नहीं है क्योंकि धारणाओं का कोई बंधा-बंधाया नियम नहीं है, कोई मत और न ही कोई आदेश (कमांडेंट्स) हैं।”
जकरिया तर्क देते हैं कि यह किसी बंधे-बंधाये सिध्दान्तों में सीमित न रहने वाला चरित्र ही हिन्दुइज्म को अन्यों को अपने में आत्मसात और सम्मिलित करने की शक्ति प्रदान करता है। मैं मानता हूँ कि यही हिन्दू लोकाचर भारत में लोकतंत्र और सेकुलरिज्म की सफलता की कुंजी है।
लाल कृष्ण आडवानी
नयी दिल्ली
११ अप्रैल, २०१०
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April 14th, 2010 at 9:31 am
कितना सही लिखा है जेठमलानी जी ने - हिन्दुत्व एक जीवन पद्दति है, एक दर्शन है ना कि एक धर्म का सार. हिन्दुत्व, राष्ट्रवाद वह भी प्रखर कभी चुनावी मुद्दा नही बन सकते. यह तो जीवन मे अपनाने के लिये होते है.
April 14th, 2010 at 11:41 pm
Respected Advani ji,
I strongly agree with the above article and the ideology of the BJP. But because of the vilification drive of Media & other information sources, the youth of India consider the party as a right wing party. In spite of following appeasement policies for muslims and dividing the society in the name of religion, Congress has successfully projected itself as a secular party. I have no hesitation to say that our BJP is not doing enough to counter this and project the real picture of BJP & RSS. I have a humble request to think over it.
Sadar Pranam
April 18th, 2010 at 7:41 am
Vande mataram.
There is something that everyone should know which I feel is of vital importance. 96% of population on globe utilizes 20% of the resources, rest 80% resources are being utilized by only 4 % , right before the democracy & after democracy. I cant see the difference in the ways of ruling. We should think about the human beings not faulty systems.
jai hind
April 24th, 2010 at 12:23 am
Respected Shri Advani Ji,
I totally agree with the article but have many complaints to ourselves that we could not make people understand about it.
I have started reading ” MY COUNTRY MY LIFE”, so many time it makes me sentimental…..it is excellent.
VANDE MATARAM