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लोकतंत्र पर अक्षम्य हमला

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भारतीय राजनीतिक इतिहास के विद्यार्थियों में यह सदैव विवाद का विषय रहेगा कि देश में आपातकाल 1975 की 25 जून या 26 जून में से कब लागू किया गया।

तथ्य यह है कि राष्ट्रपति ने आपातकाल सम्बन्धी उद्धोषणा पर 25 जून की देर रात्रि को हस्ताक्षर किए। लेकिन इसके बारे में केबिनेट को 26 जून को सुबह 6 बजे सूचित किया गया। देश को इस बारे में 26 जून को प्रात: 8 बजे आल इण्डिया रेडियो पर स्वयं इंदिरा गांधी के प्रसारण से पता चला।

पूर्व के अपने एक ब्लॉग में मैने प्रधानमंत्री कार्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी बिशन टंडन की पुस्तक से कुछ उठ्ठत किया था। उन महत्वपूर्ण दिनों की घटनाओं के बारे में इस पुस्तक ‘पी0एम0ओ0 डायरी’ से ज्यादा अधिकृत रिकार्ड और कुछ और नहीं हो सकता। इस पुस्तक की प्रस्तावना सुविख्यात ब्रिटिश संवैधानिक विशेषज्ञ ग्रानविले ऑस्टिन ने लिखी है।

ऑस्टिन लिखते हैं:

”घटनाओं के अंदरुनी ब्यौरों के साथ श्री टण्डन के अर्थों के विश्लेषण का हमारे लिए बहुत कम या कोई कीमत नहीं होती यदि उस समय के उनकी प्रतिष्ठा एक बहुत सधे हुए रिपोर्टर की नहीं होती - एक ऐसी प्रतिष्ठा जो आज उनकी है। सुविज्ञ राजनीतिक विश्लेषक अब श्री टण्डन के उस समय के विचारों से असहमत हो सकते हैं लेकिन उनके ब्यौरों की प्रामाणिकता किसी भी संदेह से ऊपर प्रतीत होती है” ।

यहां, बिशन टण्डन की डायरी के कुछ उध्दरणों को दिया जा रहा है जो उन दिनों में घट रहे घटनाक्रमों से अनभिज्ञ देशवासियों को पता चल सके कि देश में तब क्या हो रहा था।

25 जून, 1975

न्यायमूर्ति अय्यर ने प्रधानमंत्री की अपील पर अपना निर्णय दे दिया।

पालकीवाला ने दलील दी कि जब तक सर्वोच्च न्यायालय मामले को निपटा नहीं देता तब तक इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय पर बगैर शर्त के स्टे दिया जाए।शांतिभूषण ने इसका विरोध इस आधार पर किया कि पिछले बीस वर्षों में सर्वोच्च न्यायालय ने किसी को भी ऐसा स्टे नहीं दिया है और प्रधानमंत्री को भी ऐसा स्टे नहीं मिलना चाहिए।

न्यायमूर्ति अय्यर ने निर्णय दिया कि एक सांसद होने के कारण प्रधानमंत्री को भी ऐसा स्टे दिया जाएगा जो कि सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले मामलों में दिया है लेकिन इससे प्रधानमंत्री की उनकी हैसियत पर कोई असर नहीं पड़ेगा सिवाय इसके कि वह लोकसभा में वोट देने योग्य नहीं होगीं।

मुझे पता चला कि प्रधानमंत्री इस निर्णय से प्रसन्न नहीं हैं, लेकिन प्रचार इस तरह का किया गया कि पार्टी और उनके रुख को उच्च न्यायालय ने सही ठहराया है।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से प्रधानमंत्री के केस का एक कानूनी चरण समाप्त हुआ। उनकी छवि बिगड़ रही थी और प्राधिकार मुसीबत में आ पड़े थे। उनको सर्वाधिक हिम्मत उनके कायर पार्टीजनों से मिली, विशेष रुप से वरिष्ठ मंत्रिया से।

उनका उद्देश्य साफ था : चाहे जो हो, वह प्रधानमंत्री रहनी चाहिएं। वे जो भी चाहेंगी वरिष्ठ नेता उनका समर्थन करेंगे।हमारे आदर्श, मूल्य और मानदंड गर्त में जाएं। क्या हमारे देश में लोकतंत्र समाप्त होने के निकट है?

26 जून, 1975

मैं ऑफिस जाने की तैयारी में था कि शारदा (शारदा प्रसाद प्रधानमंत्री के सूचना सलाहकार) का फोन आया ” तुमने सुना ही होगा, सब कुछ समाप्त हो गया। जब तुम ऑफिस आओगे तब हम बात करेंगे”। उनकी हताशा साफ झलक रही थी।

ऑफिस पहुंचने के बाद मैं सीधा शारदा के कक्ष में गया, उन्होंने मुझे विस्तार से वह सब बताया जो वह जानते थे। पिछली रात प्रधानमंत्री ने उन्हें और प्रो0 धर को रात दस बजे अपने घर बुलाया। बरुआ (कांग्रेस अध्यक्ष) और रे (प0 बंगाल के मुख्यमंत्री) वहां पहले ही थे। जब प्रो0 धर और शारदा वहां पहुचे तो प्रधानमंत्री ने उन्हें बताया ” मैंने आपातकाल घोषित करने का फैसला किया है। राष्ट्रपति सहमत हो गये हैं। मैं कल केबिनेट को सूचित करुंगी,” यह कहने के बाद उन्होंने आपातकाल की घोषणा का प्रारुप प्रो0 धर को थमा दिया। वह और शारदा दंग रह गये। उन्हें सिर्फ इसकी सूचना देने के लिए बुलाया गया था और शुरु किए जाने वाले प्रोपेगेण्डा पर उनकी सलाह लेने के लिए। उन्होंने इन दोनों को राष्ट्र को अपने सम्बोधन का प्रारुप तैयार करने को कहा। वे तड़के एक बजे प्रधानमंत्री निवास पर थे। केबिनेट की बैठक सुबह 6 बजे होनी थी।

दिल्ली में उपस्थित सभी मंत्रियों ने केबिनेट बैठक में हिस्सा लिया। प्रधानमंत्री ने उन्हें बताया कि उन्होंने क्या करने का फैसला किया है लेकिन उनमें से किसी एक ने भी, दिखावे के लिए भी विरोध नहीं किया। गिरफ्तारियों पर विचार विमर्श हुआ ही नहीं। शारदा ने बताया कि जेपी, मोरारजी, चरण सिंह सहित विपक्ष के सभी प्रमुख नेता गिरफ्तार कर लिए गये हैं।

शारदा ने मुझे यह भी बताया कि प्रधानमंत्री निवास का पूरा नियंत्रण अब संजय के हाथ में हैं। केबिनेट बैठक के बाद उन्होंने गुजराल को एक तरफ बुलाया और सही ढंग से प्रोपेगण्डा न होने के लिए उन्हें लताड़ा, उन्होंने उनसे अब से प्रत्येक समाचार बुलेटिन प्रधानमंत्री निवास भेजने को कहा।

शारदा बुरी तरह से थके हुए थे। 12 जून से ही वह प्रधानमंत्री सचिवालय में पूरी तरह से जुटे हुए थे क्योंकि प्रधानमंत्री की पूरी रणनीति प्रोपेगण्डा पर ही निर्भर थी। लेकिन शारीरिक थकावट से ज्यादा उन्हें मानसिक परेशानी थी। मैंने कभी उन्हें ऐसा नहीं देखा था, वह अवश्य ही सोचते होंगे कि क्या इसी सब के लिए वह 1942 में जेल गए थे। वह एक पत्रकार थे। स्वतंत्रता के पश्चात् यह पहली बार था जब पूर्व सेसंरशिप थोपी गई थी। पूरे दिन मैं व्यथित रहा। साथ ही कटु अनुभव कर रहा था। क्या लोकतंत्र समाप्ति की ओर है?

27 जून, 1975

आज सुबह भी कोई समाचारपत्र नहीं था। आखिर कब तक यह सब चलने वाला है? ऑफिस पहुंचने के बाद जब मैंने शारदा से पूछा, तो उन्होंने बताया कि सभी समाचारपत्र कार्यालयों की बिजली सप्लाई अभी भी कटी हुई है, इसलिए वे प्रकाशित नहीं हो सके। यह सब अवैध तरीके से किया गया, किसी कानून के तहत नहीं।

पालकीवाला ने प्रधानमंत्री का वकील बने रहने से इंकार कर दिया। अतिरिक्त सोलिसिटर जनरल फाली नरीमन ने भी इस्तीफा दे दिया। साफ था कि सभी ने अपनी आत्मा मरने नहीं दी थी और यही व्याप्त अंधकार में आशा की किरण थी।

***

आपातकाल युग में घटनाओं पर अपनी टिप्पणी करते हुए मैंने जिस दूसरी पुस्तक का संदर्भ दिया वह उमा वासुदेव की थी। लेकिन यह दोनों ही लेखक गैर-राजनीतिक थे। दोनों में से किसी को भी श्रीमती गांधी के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित नहीं माना जा सकता। लेकिन दोनों ही इससे परेशान थे जिस तरह श्रीमती गांधी स्थिति को संचालित कर रही थीं।

एन.के. मुखर्जी उस समय गृह सचिव थे और उस समय सरकार में सर्वाधिक योग्य अधिकारियों में से एक थे। अचानक उनका तबादला पर्यटन विभाग में कर दिया गया और राजस्थान के मुख्य सचिव एस.एल. खुराना को उनके स्थान पर लाया गया (मोरारजी भाई की सरकार में एन.के. मुखर्जी मंत्रिमण्डलीय सचिव बने)।

उमा वासुदेव लिखती हैं:

25 की सुबह 11 बजे जब सिध्दार्थ शंकर रे प्रधानमंत्री को मिले तब उन्होंने (इंदिरा गांधी) देश की स्थिति के बारे में रिपोर्टों के कुछ बण्डल उन्हें दिखाए। रे का कहना था कि ”उनके अनुमान से कुछ न कुछ करना होगा।”

वह आए, लेकिन 4 बजे शाम फिर वापस गए, साथ में अनेक पुस्तकों और भारत के संविधान के साथ। यही वह समय था जब उन्होंने आपातकाल के बारे में बातें कीं। इंदिरा गांधी ने रे से पूछा ”क्या कानून इसकी अनुमति देता है?” उन्होंने जवाब दिया ”हां यह दूसरे आपातकाल की अनुमति देता है।”

वे दोनों राष्ट्रपति से मिलने गए जिन्होंने अनेक रिपोर्टें देखी थी। और वह पंद्रह मिनटों में ही राजी हो गए।

राष्ट्रपति को भेजे जाने वाला पत्र तैयार करना था जिसमें उन्हें आपातकाल की उद्धोषणा का सुझाव देना था। दो पंक्तियां तैयार करनी थीं और तब श्रीमती गांधी उन्हें पढ़तीं। ”इसमें इतना ज्यादा समय क्यों लग रहा है?” प्रत्येक पांच मिनट में संजय (गांधी) दूसरे कमरे से आते और कहते ”मम्मी, एक मिनट के लिए आइए।” और वह चली जाती- रे ने स्मरण किया। संजय मुख्यमंत्रियों के नम्बर मिलाने में व्यस्त थे जो संयोग से दिल्ली में मौजूद थे या राज्यों की राजधानियों में थे, और इसीलिए हर बार उनसे बात कराने के लिए अपनी मां को बुलाते थे।

शाम 6.30 बजे तक उत्तरी राज्यों के कुछ विशेष घरों और कार्यालयों में फोन की घंटियां लगातार बज रहीं थीं। तरीका लगभग एक समान था। मुख्य सचिव, गृह सचिव और पुलिस के इंस्पेक्टर-जनरल के घरों पर टेलीफोन की घंटी बज रही थी कि - ”मुख्यमंत्री चाहते हैं कि आप जरूरी मीटिंग में आएं।” मुख्यमंत्री के कार्यालय में गुप्तता का माहौल था। ”देश में आपातकाल घोषित किया जाने वाला है और सभी विपक्षियों को गिरफ्तार करना है। प्रत्येक डिवीजन के डीआईजी को वायरलेस मैसेज भेजे जाने चाहिए। आर एस एस के सदस्यों और जनसंघ के कर्मठ कार्यकर्ताओं को पकड़ने के लिए। प्रेस को इसका पता नहीं चलना चाहिए। सेंसरशिप लगानी चाहिए। इन गिरफ्तारियों से सम्बन्धित कोई भी समाचार प्रकाशित करने से रोका जाना चाहिए।”

एक अधिकारी ने पूछा ”यह क्यों हो रहा है, सर?” ”क्योंकि ऐसी स्थिति पैदा हो गई है जहां सभी सरकारी संस्थानों को खतरा हो गया है और सभी स्थानों पर व्यापक विद्रोह होने के आसार हैं। यदि लोगों को पकड़ा नहीं गया तो हम स्थिति को नियंत्रण में नहीं रख पाएंगे।”

***

1977 में मोरारजी देसाई की सरकार में सूचना एवं प्रसारण मंत्री के रूप में मैंने अपने मंत्रालय में एक पूर्व सचिव की अध्यक्षता में एक विशेष समिति नियुक्त की जिसका काम प्रेस सेंसरशिप की आड़ में मीडिया पर की गई ज्यादतियों के बारे में एक श्वेतपत्र तैयार करना था। समिति ने रिकार्ड समय में अपना काम पूरा किया और मैं अगस्त, 1977 में श्वेतपत्र संसद में रख सका। तथ्य सबको चौंकाने वाले थे।

आपातकाल के दौरान 253 पत्रकार पकड़े गये। इनमें से 110 मीसा के तहत, 110 डी आई आर और 33 अन्य कानूनों के तहत। बीबीसी के सर्वाधिक लोकप्रिय पत्रकार मार्क टुली सहित 29 विदेशी पत्रकारों का भारत में प्रवेश प्रतिबंधित था। सरकार ने 51 विदेशी पत्रकारों की मान्यता समाप्त कर दी थी और उनमें से सात को निष्कासित कर दिया था।

लाल कृष्ण आडवाणी
नयी दिल्ली

२८ जून, २०१०

संलग्नक : APPENDIX TO BLOG

Table : आपातकाल के दौरान विभिन्न राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों में गिरफ्तार और हिरासत में लिये लोगों की संख्या

राज्य/केन्द्र शासित प्रदेश का नाम मीसा के तहत गिरफ्तारी डी आई एस आई आर के तहत गिरफ्तारी
आन्ध्र प्रदेश 1135 451
असम 533 2388
बिहार 2360 7747
गुजरात 1762 2643
हरियाणा 200 1079
हिमाचल प्रदेश 34 654
जम्मू व कश्मीर 466 311
कर्नाटक 487 4015
केरल 790 7134
मध्य प्रदेश 5620 2521
महाराष्ट्र 5473 9799
मणिपुर 231 228
मेघालय 39 20
नागालैंड 95 4
उड़ीसा 408 762
पंजाब 440 2463
राजस्थान 542 1352
सिक्किम 4 -
तमिलनाडु 1027 1644
त्रिपुरा 77 99
उत्तर प्रदेश 6956 24781
प. बंगाल 4992 2547
अंडमान व निकोबार 41 88
अरूणाचल प्रदेश - 1
चण्डीगढ़ 27 74
दादरा एवं नगर हवेली - 3
दिल्ली 1012 2851
गोवा, दमन एवं दीव 113 -
लक्षद्वीप - -
मिजोरम 70 136
पोण्डिचेरी 54 63
कुल 34988 [MISA में बंदी] 75818 [DISIR में बंदी]

कुल बंदी : 1,10,806
[स्त्रोत: आपातकाल पर शाह आयोग की रिपोर्ट]

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One Response to “लोकतंत्र पर अक्षम्य हमला”

  1. dhiru singh Says:

    नई पीढी आपातकाल से अन्जान है .आपातकाल के जुल्म और उन्के खल- नायको के कुक्र्त्य सामने लाने चाहिये जिससे आज के लोगो को पता चले १८ महीने मे काले अन्ग्रेजो ने क्या क्या सितम किये.

    आज की परिस्थितिया भी सन ७५ के दौर से मिलती जुलती सी है क्या कोई जे.पी नही जो आगे आये और कहे सिंहासन खाली करो जनता आती है (जनता पार्टी नही जो दो साल मे ही धाराशाही हो गई ).

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