लोकसभा बहस में भाजपा का उत्कृष्ट योगदान
मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि पिछले सप्ताह लोकसभा में हुई दो महत्वपूर्ण बहसों - परमाणु उत्तरदायित्व विधेयक तथा तथा जम्मू-कश्मीर की स्थिति - पर भाजपा के हमारे सांसदो ने उत्कृष्ट योगदान दिया।
जसवंत सिंह परमाणु मुद्दे पर बोले, और विनम्रता से मगर दृढ़ता से सरकार को इस विधेयक को जल्दबाजी में पारित कराने पर आड़े हाथ लिया। जंहा तक परमाणु उर्जा संयन्त्रो का सम्बन्ध है तो दुनिया आज खरीददारों की मार्केट है। यदि भारत इस मामले पर धैर्य और सतर्कता से भरा दृष्टिकोण अपनाता है तो यह राष्ट्रीय हित में होगा। जसवंत सिंह ने जोर देकर बताया जैसा कि साफ है कि दो वर्ष पूर्व हमारी सरकार द्वारा वाशिंगटन से किया गया समझौता आई0ओ0यू (इस्ट्रमेंट ऑफ अण्डरस्टेंडिंग) के समान है। यह एक हुण्डी है जिस पर हमने 10 सितम्बर, 2008 को हस्ताक्षर किए थे और यह हम पर बाध्यकारी है। इसी से साफ होता है कि जो हम कर रहे हैं उसका क्या महत्व है!
जम्मू-कश्मीर की स्थिति पर बोलते हुए डा0 मुरली मनोहर जोशी समान रुप से प्रभावी रहे। उन्होने कहा जब कुछ सदस्य बार-बार उन लोगों से वार्ता करने की बात करते है जो अपनी ‘वास्तविक शिकायतों’ को सुलझाने के लिए हिंसा में लिप्त है, ऐसे में कौन समझ सकता है कि वे किन वास्तविक शिकायतों की बात कर रहे है। क्या आजादी की मांग एक वास्तविक शिकायत है ? डा0 जोशी ने कहा कि उस राज्य में जो स्वायत्तता के बारे में बोलते हैं, उसी सांस में वे आजादी की बात करते हैं जैसे मानो दोनो शब्द समानार्थी हों।
मुझे इसकी प्रसन्नता है कि डा0फारुक अब्दुल्ला ने न केवल दो टूक शब्दो में आजादी की बात को नकारा अपितु उन्होनें 1994 में संसद द्वारा सर्वसम्मति से पारित प्रस्ताव का स्मरण कराते हुए आग्रह किया कि जब हम जम्मू-कश्मीर की बात सोचें तो केवल कश्मीर घाटी, जम्मू और लद्दाख की नही अपितु हमें यह कभी नही भूलना चाहिए कि पाक अधिकृत कश्मीर और उत्तरी क्षेत्र भी भारत के अंग है।
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विगत दिनों जम्मू- काश्मीर के पूर्व राज्यपाल जनरल (सेवानिवृत) एस0के सिन्हा द्वारा नई दिल्ली में हुए डिफेंस सर्विसेज़ वैटरन्स के सेमिनार में काश्मीर की वर्तमान स्थिति की सटीक विवेचना की गयी. मैं उनके वक्तृत्व को यहाँ उद्धृत करता हूँ :
“भारत के प्रति लगातार वैमनस्य के अलावा कश्मीर को लेकर पाकिस्तान में एक बीमारी की हद तक जूनन है।
उसने 1947, 1965, 1971 और 1999 में युद्धों का सहारा लिया मगर असफल रहा । यह पिछले बीस वर्षों से आतंकवाद का सहारा ले रहा है। लेकिन तब भी अपना उद्देश्य हासिल नहीं कर पाया।
सन् 2008 से एक नई रणनीति अपनायी है पृथक होने के लिए एक व्यापक जनआंदोलन खडा करना। बिलकुल असत्य और धोखाधड़ी पर आधारित अमरनाथ विवाद ने साम्प्रदायिक तूफान पैदा किया। यही असत्य और धोखाधड़ी की तिकड़म सन् 2009में शोपियां में दो महिलाओं के बलात्कार और हत्या को लेकर फिर से अपनायी गई। करीब दो महीनों से घाटी को बधंक बना रखा है। अमरनाथ और शोपियां भावनात्मक मुद्दों को उकसाकर आजादी के लिए जूनून पैदा करने वाले जनआदोलन का पूर्वाभ्यास है।
सन् 2008 में यह मजहबी कार्ड था, 2009 में कश्मीरी सम्मान और 2010 में पुलिस फायरिंग में मारे गये युवाओं का मुद्दा। जहाँ तक पहले दो का सम्बन्ध है, वे झूठ पर आधारित थे और शेष का आधार बनाए गए हालात है।
पत्थर फेंकने का आप्रेशन भारत-पाक विदेश मंत्रियों की वार्ता के समय शुरु किया गया। यह चालू है और यह नवम्बर में ओबामा की यात्रा के समय तक इंतेफादा के पूर्ण रुप में लाने तक उबलते रखा जाएगा, जब पूरी दुनिया के मीडिया फोकस इस उप-महाद्वीप पर होगा।”
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एक बेहतरीन फिल्म निर्माता
बालीवुड फिल्मों में सामान्य तौर पर दिखाए जाने वाले गांव बनावटी और स्टूडियो में स्थित होते हैँ। नियमों के चलते अभिनेता भी कोई अलग नहीं हैं। वे शुध्द रूप से शहरी होते हैं नाकि किसान, ग्रामीण इत्यादि जैसाकि फिल्मों में उन्हें दिखाया जाता है।
पिछले सप्ताह जब आमिर खान ने एन.डी.ए. के हमारे सांसदों के लिए अपनी फिल्म ‘पीपली लाइव’ का शो आयोजित किया जो मैंने उन्हें इस पर बधाई दी कि उनकी फिल्म एकदम प्रचलित अर्थों से उलट है। उसमें ग्रामीण जीवन के यथार्थ को दिखाया गया है। अनेक शहरी दर्शकों के लिए यह पहला ही अनुभव होगा।
मैं सर्वाधिक इससे प्रभावित हुआ कि फिल्म में टी.वी. चैनलों और राजनीतिज्ञों की प्रतिस्पर्धा का चित्रण किया गया है। टी.वी. मीडिया के लिए टीआरपी का लालच कितना विडम्बनापूर्ण और भोंडा हो सकता है, को फिल्म में प्रभावी ढंग से उजागर किया गया है। लेकिन मेरा मानना है कि फिल्म निर्माता को किसानों की आत्महत्या के बजाय कोई अन्य विषय फिल्म की मुख्य कहानी के लिए चुनना चाहिए था।
मैंने आमिर को बताया : मैं आंध्र और विदर्भ के उन गांवों में गया हूं जहां अनेक किसानों ने आत्म-हत्याएं की हैं। और मैं कल्पना कर सकता हूं कि जब ये परिवार फिल्म में देखेंगे कि उनकी त्रासदी को मजाक का विषय बनाया गया है तो उन पर क्या गुजरेगी। यह फिल्म और अधिक प्रभावी हो गई होती यदि इसकी मुख्य कथा के लिए नरेगा जैसी योजनाओं को केन्द्र में रखा जाता।
फिर भी, उनकी इस ताजा फिल्म ने एक बार फिर दशार्या कि आमिर एक बेहतरीन फिल्म निर्माता हैं जो लीक से हटकर नए प्रयोग करने में कभी नहीं हिचकते। यद्यपि आमिर इसके निर्देशक नहीं हैं और न ही उन्होंने अभिनय किया है, फिर भी यह फिल्म प्रभावी है। निदेशक सुश्री अनुषा रिजवी हैं जो एक पूर्व टीवी पत्रकार रही हैं। यदि यही उनकी पहली फिल्म है तो निश्चित ही वह प्रशंसा की पात्र हैं। और प्रशंसा के हक़दार ओंकारदास मानिकपुरी, फिल्म के मुख्य अभिनेता, भी हैं जिन्होंने पहली बार अपने जीवन में फ़िल्मी कैमरे का सामना किया।
लाल कृष्ण आडवानी
नयी दिल्ली
२९ अगस्त, २०१०
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August 30th, 2010 at 2:21 pm
विपक्ष जितना सशक्त होगा देश उतना सशक्त होगा . लेकिन सिर्फ़ सत्ता के लिये ही लडने के कारण हार के बाद खामोश होने वाले लोगो से ही सत्ता निरकुंश हो जाती है . शर्म आती है आज सरकारी विग्यापन देखकर प्रधानमंत्री के बराबर मे गैर संवेधानिक पद के व्यक्ति की फ़ोटो देखकर लेकिन विपक्ष खामोश है . एक राजसत्ता सी दिख रही है रानी राजकुमार …….. विपक्ष खामोश है
और पीपली लाईव …….. आस्कर जीतने की इच्छा लिये बनायी गई फ़िल्म है जो भारत की बदहाली ना दिखायेगी तब तक आस्कर कएसे जीतेगी . सत्यजीत रे ने भी गरीबी दिखाकर ही महानता प्राप्त की थी