सेना सम्बन्धी एक्सप्रेस की रिपोर्ट से ताजा हुआ 1989 का तकलीफ देह प्रसंग
इस सप्ताह का सर्वाधिक चौंकाने वाला समाचार नई दिल्ली से प्रकाशित ‘इंडियन एक्सप्रेस‘ ने गत् बुधवार (4 अप्रैल) को अपने प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित किया है। इस समाचार रिपोर्ट पर छ स्तम्भों में फैला बैनर शीर्षक यह है: ‘दि जनवरी नाइट रायसीना हिल वाज़ स्पूकड‘। उपशीर्षक इस प्रकार है: सेना की दो यूनिटों ने सरकार को बगैर बताए दिल्ली की तरफ कूच किया (टू आर्मी यूनिट्स मूवड टूवर्डस दिल्ली विदआउट नोटिफाईंग गर्वनमेंट)।,
यदि कोई भी 4 अप्रैल की रिपोर्ट और 5 अप्रैल को उसके सम्बन्ध में प्रकाशित रिपोर्टों को पूरा पढ़े तो अवश्य ही मानेगा कि यह रिपोर्ट अत्यन्त चिंतनीय हैं और जैसाकि भाजपा के प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने टिप्पणी की कि इससे उद्धाटित होता है ‘सरकार-सेना के सम्बन्धों में इन दिनों सर्वाधिक खराब रिश्ते हैं। इस सप्ताह ‘इंडियन एक्सप्रेस‘ का समाचार दर्शाता है कि इन दिनों सरकारी क्षेत्रों में परस्पर अविश्वास कितना गहरा है। हालांकि, इससे राहत मिलती है कि इंडियन एक्सप्रेस ने स्वयं ही इसको स्पष्ट किया है कि इस समाचार का कोई गलत निहितार्थ न निकाला जाए। एक बॉक्स में सेना प्रमुख के ‘एक प्रोफेशनल सैनिक की बेदाग छवि‘ की प्रशंसा करते हुए कहा गया है कि कोई भी ‘सी‘ शब्द का उपयोग ‘क्यूरियिस‘ (उत्सुकता) के सिवाय नहीं करता।
मेरे मित्र और पड़ोसी विजय कपूर, जो संघ शासित प्रदेश दिल्ली के पूर्व उप-राज्यपाल रहे हैं, मुझे मिले थे और उन्होंने मुझे सुनाया कि कैसे 1989 में राजीव गांधी सरकार की पराजय के बाद तत्कालीन गृह मंत्री बूटा सिंह ने सेना को बुलाने की गंभीर कोशिश की और यह कोशिश कैसे असफल की गई।
उस समय विजय कपूर दिल्ली के मुख्य सचिव थे। तब दिल्ली के उप-राज्यपाल रोमेश भण्डारी थे। जब कपूर ने 1989 के इस प्रकरण की यादें मुझे बताईं तो मैंने इसके दस्तावेजी साक्ष्य तलाशने शुरु किए। संयोग से मुझे रोमेश भण्डारी की आत्मकथा हाथ लगी जो उन्होंने दस वर्ष पूर्व मुझे भेंट की थी। इसमें श्री भण्डारी ने उल्लेख किया है कि सितम्बर, 1988 में वह उप-राज्यपाल नियुक्त हुए और आगे वे कहते हैं ”मेरा कार्यकाल संक्षिप्त था क्योंकि 1989 में आम चुनावों में राजीव गांधी की पराजय के बाद मैंने त्यागपत्र दे दिया था।”
भण्डारी लिखते हैं:
”1989 में आम चुनावों के नजीजे घोषित होने के तुरंत बाद यह स्पष्ट हो गया था कि कांग्रेस पार्टी हार गई है। लोकसभा को भंग करने की कानूनी प्रक्रिया अभी शुरु होनी थी। अन्य दलों के नेता इसकी मांग कर रहे थे और राजीव गांधी सम्बन्धित पत्र राष्ट्रपति भवन भेजने की प्रक्रिया में थे। हालांकि चुनाव आयोग द्वारा नतीजों की अधिसूचना जारी की जानी शेष थी। इसके तुरंत पश्चात् ही लोकसभा भंग की जा सकती थी।
मैं तिथि तो भूल गया, लेकिन एक रात मुझे तब के गृह मंत्री बूटा सिंह का फोन आया कि इस तरह की अफवाहें हैं कि हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से अजीत सिंह और अन्य लोग लाखों किसानों को इकट्ठा कर दिल्ली की तरफ कूच कर रहे हैं ताकि संसद और राष्ट्रपति भवन का घेराव किया जा सके। इसका उद्देश्य राजीव गांधी को संसद भंग करने हेतु बाध्य करना था जिसके बगैर नई सरकार नहीं बन सकती थी। बूटा सिंह ने कहा कि संसद भंग तो होगी लेकिन कुछ कानूनी पहलू भी हैं जिनका उल्लेख मैंने ऊपर किया है। उन्होंने मुझे कहा कि मैं तुरंत कदम उठाऊं और सुनिश्चित करुं कि तब तक कानून-व्यवस्था की स्थिति न बिगड़े । हम दिल्ली में ऐसे धावे की अनुमति नहीं दे सकते।
मुझे ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं मिली थी, मैंने पुलिस कमिश्नर राजा विजय करण से पूछा कि क्या वे इस बारे में कुछ जानते हैं। जानकारियां जुटाने के बाद उन्होंने मुझे बताया कि ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं है। चूंकि स्वयं गृहमंत्री ने इस मामले का उल्लेख किया था, इसलिए मामले को यूं ही नहीं छोड़ा जा सकता था। मैंने तुरंत अपने आवास 18, अकबर रोड पर बैठक बुलाई। इसमें मुख्य सचिव विजय कपूर जोकि अब दिल्ली के उपराज्यपाल हैं, पुलिस आयुक्त राजा विजय करण और गुप्तचर विभाग, सुरक्षा इत्यादि से संबंध रखने वाले उच्चाधिकारियों ने भाग लिया। मैंने इंटेलीजेंस ब्यूरो और गृह मंत्रालय के अधिकारियों को भी बुलाया। बूटा सिंह द्वारा प्रकट किए गए डर को हमने विचारा। सभी ने कहा कि गृह मंत्री ने जो सुना है, उसमें कोई सच्चाई नहीं है। इतनी बड़ी संख्या में लोगों को जुटाने का काम कुछ घंटों में नहीं हो सकता। यदि ऐसे कोई इरादे होते तो हमारे स्त्रोतों को इसके बारे में पता चल जाता। सभी के इन विचारों से मैं भी पूरी तरह सहमत था और मैंने कहा कि मैं प्रधानमंत्री निवास और गृह मंत्री को बताऊंगा कि इन अफवाहों में कोई सच्चाई नहीं है। यह सब कुछ घटित हुआ। मदनलाल खुराना ने इसे ऐसे प्रस्तुत किया कि यह मेरे द्वारा सेना को बुलाए जाने का असफल प्रयास था। उन्हें यह अच्छी तरह से मालूम होना चाहिए था कि कोई राज्यपाल, उप-राज्यपाल या मुख्यमंत्री स्वयं सेना को नहीं बुला सकता, उसे रक्षा मंत्रालय के माध्यम से ही यह करना होता है।”
उप-राज्यपाल भंडारी अपनी अनभिज्ञता प्रकट कर सकते हैं। लेकिन तत्कालीन गृहमंत्री बूटा सिंह नहीं कि उन्होंने एक मनघडंत कहानी, जो उनके उप-राज्यपाल की जुबानी साफ हुई, के आधार पर सेना को बुलाने की पहल की थी।
टेलपीस (पश्च्य्लेख)
आज भारतीय जनता पार्टी का स्थापना दिवस है। ठीक बत्तीस वर्ष पूर्व 6 अप्रैल , 1980 को भाजपा की स्थापना नई दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में सम्पन्न एक अखिल भारतीय सम्मेलन में की गई थी।
यह सम्मेलन, जनता पार्टी के संसदीय बोर्ड द्वारा दो दिन पूर्व पारित एक प्रस्ताव का परिणाम था जिसमें तथाकथित ‘दोहरी सदस्यता‘, यानी जनता पार्टी की सदस्यता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सदस्यता से अभिप्राय था पर, प्रतिबन्ध लगाना था।
जनता पार्टी का गठन चार विपक्षी दलों-जनसंघ, कांग्रेस (ओ) लोकदल और समाजवादी पार्टी के विलय से हुआ था। जनसंघ के अधिकांश सदस्य राष्ट्रीय स्वयंसेवकसंघ के स्वयंसेवक या संघ से जुड़े थे। वस्तुत:, दोहरी सदस्यता वाला प्रस्ताव जनता पार्टी के उन कुछ नेताओं की पहल था जो इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि जनसंघ, पार्टी के लिए बोझ बन गया है और पार्टी के इस अंग को जितनी जल्दी अलग कर दिया जाए उतना ही अच्छा। संसदीय बोर्ड का ‘दोहरी सदस्यता‘ वाला प्रस्ताव इस लक्ष्य को हासिल करना था। ‘दोहरी सदस्यता‘ का प्रखर विरोध श्री मोरारजीभाई देसाई, श्री सिकन्दर बख्त और अन्य अनेक जनता पार्टी नेताओं ने किया जो जनसंघ से संबंधित नहीं थे।
सन् 1980 में 4 अप्रैल को यह प्रस्ताव पारित हुआ। उस वर्ष 4 अप्रैल ‘गुड फ्राइडे‘ था, अत: 6 अप्रैल यानी उस वर्ष स्थापना दिवस ‘ईस्टर सण्डे‘ था।
मैं अक्सर अपने भाषणों में इन दोनों ईसाई पर्वों के महत्व का स्मरण करता हूं। ‘गुड फ्राइडे‘ को माना जाता है कि ईसा मसीह को सूली पर चढ़ाया गया और ‘ईस्टर सण्डे‘ को उनके पुनर्जीवित होने का दिन माना जाता है।
जनसंघ के हम लोगों के लिए ‘गुड फ्राइडे‘ के दिन ‘दोहरी सदस्यता का पारित प्रस्ताव सूली पर चढ़ाने जैसा था और ‘ईस्टर सण्डे‘ जिस दिन भाजपा का श्री वाजपेयी के द्वारा गठन हुआ एक प्रकार से पुनर्जीवित होना था।
लालकृष्ण आडवाणी
नई दिल्ली
6 अप्रैल, 2012
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