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स्थापना दिवस पर कुछ विचार

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आज भारतीय जनता पार्टी का स्थापना दिवस है। आज पार्टी पूरे 30 वर्ष की हो गई।

सन् 1980 में 6 अप्रैल को जब श्री वाजपेयी ने पार्टी की स्थापना की तो वह ‘ईस्टर संडे’ था। दो दिन पूर्व ‘गुड फ्रायडे’ मनाया गया था। 4 अप्रैल को जनता पार्टी ने एक प्रस्ताव पारित कर उन सभी को निष्कासित करने का निर्णय लिया था जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हुए थे। इसका आशय था कि जनता पार्टी की सदस्यता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सदस्यता के साथ नहीं चल पाएगी। इसे ‘दोहरी सदस्यता’ कहा गया। व्यवहारिक रूप से इसका अर्थ था पार्टी से जनसंघ के उन सभी सदस्यों का निष्कासन, जो कांग्रेस (ओ), समाजवादी पार्टी, लोकदल और जनसंघ के विलय से बनी थी।

इस वर्ष ‘ईस्टर सन्डे’ 4 अप्रैल को था। संयोग से इस दिन और इससे पूर्व के दिन मैं हरिद्वार के कुम्भ में था। 3 और 4 अप्रैल - दोनों दिन परमार्थ निकेतन के पूजनीय प्रमुख स्वामी चिदानन्दजी ने ऐसे शानदार कार्यक्रम आयोजित किए थे जो इस वर्ष के कुम्भ यानी 2010 के कुम्भ को अद्वितीय और अविस्मरणीय बना देंगे।

इण्डियन हैरिटेज रिसर्च फाऊण्डेशन द्वारा तैयार एवं रूपा एण्ड कम्पनी द्वारा प्रकाशित 11 खण्डों वाले इनसायक्लोपीडिया ऑफ हिन्दुइज्म का लोकार्पण हरिद्वार में दलाई लामा ने किया।

4 अप्रैल को ऋषिकेश में गंगा के किनारे श्री दलाई लामा के नेतृत्व में हजारों साधुओं, संतों, विद्वानों ने अपने अनुयायिओं के साथ गंगा को प्रदूषण मुक्त करने की प्रतिज्ञा ली।

हरिद्वार में इनसायक्लोपीडिया ऑफ हिन्दुइज्म के लोकार्पण समारोह में फादर डोमिनिक इमेएनुएल भी एक वक्ता थे। उन्होंने यूं ही उल्लेख किया कि यह कार्यक्रम ईस्टर की पूर्व संध्या पर आयोजित किया गया है। इस उल्लेख ने मुझे स्मरण कराया कि इस सप्ताह के ईसाई पर्वों - गुड फ्रायडे और ईस्टर का भाजपा के इतिहास में कितना महत्व है।

गुड फ्रायडे वह दिन है जब यीशु मसीह को सलीब पर चढ़ाया गया। ईस्टर सण्डे यीशु मसीह के पुनर्जीवित होने का दिन है।

दोहरी सदस्यता को लेकर जनता पार्टी का प्रस्ताव जिसने जनसंघ के सदस्यों को जनता पार्टी से निष्कासित किया था, वह हमें ‘सलीब पर चढ़ाए’ जाने जैसा था।

ईस्टर संडे को भारतीय जनता पार्टी की स्थापना निश्चित रूप से हमारा ‘पुनर्जीवन’ थी, जिसने श्री वाजपेयी को देश को 6 वर्षों तक सुशासन देने में समर्थ बनाने के साथ ही देश का राजनीतिक इतिहास बदल दिया और भारत की एकध्रुवीय प्रभुत्व वाली दलगत राजनीति को द्विध्रुवीय राजनीति में बदल दिया।

मैंने कहा कि मुझे इसमें संदेह नहीं कि इनसायक्लोपीडिया ऑफ हिन्दुइज्म का प्रकाशन भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विद्वता के लिए एक प्रकार का पुनर्जागरण सिध्द होगा और भारत के स्वाभिमान को पुनर्जीवित करने की ओर अग्रसर करेगा।

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‘मेरा देश : मेरा जीवन’ शीर्षक वाली मेरे संस्मरणों की पुस्तक मार्च 2008 में प्रकाशित हुई थी। इसका नौ पृष्ठीय उपसंहार मैंने जनवरी, 2008 में परमार्थ निकेतन में लिखा था। 2007 के नव वर्ष पर, मैं पहली बार इस आदर्शमयी आश्रम में आया था और इसकी गंगा-आरती में शामिल हुआ था।

अपने उपसंहार में, मैंने लिखा: ”स्वामीजी ने मेरे साथ अपने आश्रम में चल रही और कई भावी परियोजनाओं पर चर्चा की। इसमें गंगा को साफ करना, उत्तराखंड-जिसे ‘देवभूमि’ माना जाता है, को प्लास्टिक और अन्य कूड़ा-करकट से मुक्त करना तथा राज्य के तीर्थस्थलों का सौंदर्यीकरण एवं पुनर्सज्जा करना शामिल है। इस विचार ने मुझे बहुत प्रभावित किया क्योंकि हरिद्वार, ऋषिकेश, मथुरा, वाराणसी और भारत के कई अन्य पवित्र स्थलों की स्थिति काफी बुरी है, जहां प्रतिवर्ष पूरे भारत से लाखों श्रध्दालु आते हैं। ये मुझे हमेशा निराशा से भर देते हैं।”

मैंने आगे जोड़ा ”यह मेरा सपना है कि गंगा को प्रदूषण से मुक्त देख सकूं-गंगोत्री से गंगासागर तक, पश्चिम बंगाल का वह स्थान, जहां वह सागर में मिलती है। इस उद्देश्य से पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने 1980 के दशक में ‘गंगा एक्शन प्लान’ के नाम से एक सराहनीय परियोजना आरंभ की थी। दुर्भाग्य से उसके वांछित परिणाम नहीं निकल सके, क्योंकि उसे नौकरशाही के तरीके से लागू किया गया था और उसमें उन लोगों का उत्साह सम्मिलित नहीं था, जिसे मैं गंगा परिवार-गंगा के दोनों ओर रहने वाले लोग एवं देश के विभिन्न भागों से आनेवाले तीर्थ यात्री और सबसे महत्वपूर्ण गंगा के साथ-साथ स्थापित सैकड़ों धार्मिक प्रतिष्ठान-कहता हूं। मुझे कोई संदेह नहीं है कि यदि समाज और राज्य द्वारा संयुक्त रूप से दृढ़ व सतत् प्रयास किया जाए तो पवित्र गंगा को उसकी प्राचीन शुध्दता प्रदान की जा सकती है। हालांकि इस लक्ष्य को पूरी तरह से प्राप्त करने में वर्षों लग सकते हैं, लेकिन यह महायज्ञ करना उपयोगी होगा।”

मैं खुशी महसूस करता हूं कि इस स्पर्श गंगा अभियान ने इस वर्ष के कुम्भ को अविस्मरणीय बना दिया है। वहां मैंने कुछ पत्रकारों को बताया कि कैसे अहमदाबाद में नरेन्द्रभाई ने साबरमती (गांधीजी को साबरमती का संत इसलिए कहा जाता है क्योंकि उनका आश्रम यहां स्थित है) को गंदे नाले से एक साफ, सुंदर नदी और दोनों तरफ के किनारों को स्वच्छ बना दिया है। मैं आशा करता हूं कि यह प्रयास देश के अन्य भागों में लोगों को उनको अन्य नदियों के लिए भी ऐसे अभियान शुरू करने को प्रेरित करेगा और समय के साथ-साथ नदियों को जोड़ने के अभियान जोकि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का सपना था, को भी फिर से जीवित करेगा।

इसी उपसंहार में, मैंने उस भाषण का स्मरण किया है जो मैंने परमार्थ निकेतन में एक शाम गंगा-आरती के तुरंत बाद दिया था। मैंने कहा था:

”जब मैं सार्वजनिक जीवन में गुजारे छह दशकों को पीछे मुड़कर देखता हूं-और यह अवधि भारत की स्वतंत्रता के साठ वर्षों के एकदम साथ-साथ चली है-तो इसमें मैं तीन मुख्य उपलब्धियों को देख सकता हूँ ,-जिन्होंने हमारे राष्ट्र की शक्ति व सामर्थ्य को बढ़ाकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर इसके कद को ऊंचा किया है।

पहला, भारत ने न केवल शासन की लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाया बल्कि उत्साह के साथ इसे संरक्षित भी रखा। उसने कुछ विदेशियों की उस निराशावादी भविष्यवाणी को झुठला दिया है कि एक ऐसा देश, जिसकी काफी बड़ी जनसंख्या निरक्षर है और जिसे अनेक विभाजनकारी विविधताओं ने जकड़ा हुआ है, वह न तो लोकतांत्रिक रह सकता है और न ही एकजुट। भारत मुख्य रूप से अपने हिंदू लोकाचारों के कारण ही लोकतांत्रिक रह सका, जिस तरह से यह हिंदू लोकाचारों के कारण ही पंथनिरपेक्ष बना हुआ है।

हमारी दूसरी सबसे बड़ी उपलब्धि है कि भारत अब एक परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र है। मई 1998 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा लिए गए साहसी निर्णय के कारण ही यह संभव हो पाया। विडंबना है कि कुछ देशों, जिनके पास हमसे अधिक घातक परमाणु हथियार हैं, ने इस निर्णय के लिए हमारी सरकार की आलोचना की। फिर भी, इसने हर भारतीय को गौरवान्वित किया और उसे आश्वस्त किया कि भविष्य में कोई भी बुरी ताकत हम पर हमला करने की और सैन्य दृष्टि से भारत को अपना गुलाम बनाने की हिम्मत नहीं कर सकेगी, जैसाकि पिछले एक हजार वर्षों में होता रहा है।

हमारी तीसरी सबसे बड़ी उपलब्धि है-हाल में आर्थिक विकास के क्षेत्र में हुई असाधारण प्रगति। आज सारी दुनिया भारत को कल की आर्थिक महाशक्ति के रुप में देख रही है। इसके परिणामस्वरुप, भारत और भारतीयों को अंतराष्ट्रीय समुदाय में वह सम्मान और महत्व प्राप्त हो रहा है, जो दो या तीन दशक पहले नहीं था।”

लाल कृष्ण आडवाणी
नयी दिल्ली

06 अप्रैल, 2010

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One Response to “स्थापना दिवस पर कुछ विचार”

  1. dhiru singh Says:

    दोहरी सदस्य्ता के बन्धन को काट कर बनायी गई भा.ज.पा. आज दोहरे चरित्र के लोगो के हाथ मे है. ऐसा वह मानते है जो जनसंघ के जमाने से तन मन धन से सेवा कर रहे थे संगठन की . सिर्फ़ ३० साल मे भा.ज.पा ८५ साल के संघ से अपने को बडा सम्झती प्रतीत होती है . क्या यह समय आपके लिये व पार्टी के लिये चिन्तन का है . वैसे अल्पायू मे आघात असहनीय होता है.

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