अनिवार्य मतदान - प्रासंगिक एवं अपरिहार्य

नई दिल्ली में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार 1975 के आपातकाल के विरूध्द लोगों के गुस्से का परिणाम थी। श्री मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली सरकार में मुझे सरकार में जाने का पहला अनुभव हुआ। प्रधानमंत्री जी ने मुझसे पूछा था कि क्या मंत्रालय के विषय में मेरी कोई निजी प्राथमिकता है? निस्संकोच मेरा जवाब था: सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय।

मेरी इस पसंद के तीन कारण थे। एक पत्रकार के नाते मैं मीडिया से परिचित था। मेरा मानना था कि आपातकाल के दौरान लोकतंत्र को सर्वाधिक नुकसान मीडिया और पत्रकारों पर लगे प्रतिबंधों के कारण पहुंचा। तीसरा, काफी समय से मैं सरकार से अनुरोध कर रहा था कि वह आकाशवाणी से अपना नियंत्रण हटाए और इसे स्वायत्तता प्रदान करे।

सूचना एवं प्रसारण मंत्री के रूप में मुझे बीबीसी द्वारा प्रसारित एक फीचर की पाण्डुलिपि देखने का अवसर मिला जो चुनाव सुधारों के मेरे अभियान के संदर्भ में मुझे काफी रोचक लगी। यह कार्यक्रम सदियों से ब्रिटिश संसद के कामकाज पर आधारित था। इस पाण्डुलिपि में, अठारहवीं शताब्दी में ब्रिटेन में घटित एक उल्लेखनीय घटना के बारे में पढ़ने को मिला।

हाउस ऑफ कॉमन्स के एक सदस्य को उसके एक मतदाता का पत्र मिला जिसमें उसने बजट में कुछ एक्साइज़ प्रावधानों के विरूध्द वोट डालने को कहा था। बीबीसी कार्यक्रम के अनुसार, सांसद ने अपने मतदाता को जो तीखा जवाब भेजा, वह कुछ यूं था:

”श्रीमान्, एक्साइज़ के सम्बन्ध में आपका पत्र मुझे प्राप्त हुआ, और आपके द्वारा यह पत्र लिखने के दु:साहस को देखकर मुझे आश्चर्य हुआ।

”आप जानते हैं और मैं जानता हूं कि मैने इस निर्वाचन क्षेत्र को खरीदा है।

”आप जानते हैं और मैं जानता हूं कि अब मैंने इसे बेचने का दृढ़ निश्चय कर लिया है।

”और तुम्हें क्या लगता है कि मुझे पता नहीं कि आप किसी दूसरे खरीददार को तलाश रहे हो।

”और मुझे पता है कि निश्चित रूप से तुम्हें यह मालूम नहीं कि मैंने दूसरा निर्वाचन क्षेत्र खरीदने हेतु खोज लिया है।”

ब्रिटेन में संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों को खरीदा और बेचा जाना तब कोई अपवाद नहीं था। यह नियम था, अक्सर निर्वाचन क्षेत्रों की सार्वजनिक रूप से नीलामी होती थी - और कभी पूरी तरह बेचा जाता या वार्षिक आधार पर लीज़ पर दिया जाता था। स्टर्थन गोरडॉन द्वारा लिखित एक संसदीय प्रकाशन, अवर पार्लियामेंट में बताया गया है:

”1812 और 1832 के बीच संसदीय सीट को ‘खरीदने’ की कीमत 5000 से 6000 पौण्ड पर एक वर्ष के लिए ‘किराए’ पर उपलब्ध थी”

लेकिन आज, ब्रिटेन में चुनाव कुल मिला कर साफ-सुथरे हैं। ब्रिटेन में चुनाव सुधारों का इतिहास-भारत में फैली इस सामान्य मानसिकता कि चुनावों में बढ़ती धनशक्ति के प्रभाव का कोई सही इलाज नहीं है या जिस प्रकार हमारे कम्युनिस्ट मित्र कहते हैं कि एक ‘बुर्जुआ लोकतंत्र’ में यह तो अपरिहार्य है - से निपटने में सहायक हो सकता है।

*******

यदि समाज के विभिन्न वर्गों, जैसे शिक्षानुसार वर्गीकरण के आधार पर वोटिंग के तुलनात्मक प्रतिशत का सर्वेक्षण कराया जाए तो मुझे कोई संदेह नहीं कि स्नातक, स्नातकोत्तर और इससे उंची शिक्षा वाले वर्गों का वोटिंग प्रतिशत, समाज के निम्न वर्गों की तुलना में काफी कम होगा।

क्या यह स्थिति भारतीय लोकतंत्र की गुणवत्ता को प्रतिकूल रूप से प्रभावित नहीं करेगी? क्या इसे बदला जा सकता है?

मैं मानता हूं कि बदला जा सकता है। एक सीधा रास्ता -अनिवार्य मतदान- जिसे नरेन्द्रभाई मोदी ने खोज निकाला है। गुजरात ने इस कदम को अपने सभी स्थानीय निकायों हेतु लागू किया है। यह कानून राज्य विधानसभा ने पारित किया है और अभी क्रियान्वित होना है। नियम इत्यादि बनाए जा रहे हैं।

अनेकों को शायद यह पता नहीं होगा कि 700 मिलियन से ज्यादा जनसंख्या वाले कम से कम 25 देशों ने अपने संसदीय चुनावों तक के लिए मतदान अनिवार्य कर रखा है। इन देशों में आस्ट्रेलिया, अर्जन्टीना, इटली, ब्राजील, मैक्सिको, तुर्की, थाइलैण्ड और सिंगापुर शामिल हैं। मेरा सुझाव है कि भारत में राजनीतिक विचारकों को इस पर विचार करना चाहिये।

लोकतंत्र के कामकाज के बारे में इन दिनों मुझे काफी साहित्य देखने को मिला। इसमें दुनिया के कुछ महत्वपूर्ण लोकतंत्रों - कनाडा, ब्रिटेन और फ्रांस जैसों में शनैः शनैः मतदान कम होने पर चिंता व्यक्त की गई है और इससे निपटने हेतु अनिवार्य मतदान को समाधान मानने वालों की संख्या बढ़ रही है।

लाल कृष्ण आडवाणी
नयी दिल्ली

दिनांक: मार्च 08, 2010

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3 Responses to “अनिवार्य मतदान - प्रासंगिक एवं अपरिहार्य”

  1. RAJENDRA AGARWAL Says:

    “कोऊ नृप होई हमे का हानि” वाली मंथरा प्रवृति को अवश्य ही बदलना होगा. चुनावो के प्रति उदासीनता के चलते ही हमारी राजनितिक व्यवस्था में विकृतिया बढ़ी है . लोकतंत्र को स्वस्थ बनाने का एक मात्र कारगर उपाय अनिवार्य मतदान ही है . हालाँकि भारत जैसे देश में इसे लागु करना बड़ा कठिन होगा लेकिन शुरुआत तो कहीं से करनी ही पड़ेगी .

  2. AMRIT RAJ BHARAT Says:

    आदरणीय आडवानी जी,

    ये उलटी गंगा क्यूँ बह रही है. वास्तव में जब आप जैसे संवेदनशील राजनेता अधिक प्रतिशत में वोट देने वाले समूह की इसके पीछे की प्रेरणा के ऊपर ध्यान देंगे तो भी आप दुखी ही होंगे क्यूंकि वो प्रेरणा भी कोई लोकतंत्र के हित में में नहीं है बल्कि उसे गलत दिशा ही देती है. वोटिंग सफल लोकतंत्र के लिए अनिवार्य तो होना ही चाहिए पर हम नागरिकों को निगेटिव वोटिंग का भी अधिकार मिलना चाहिए नो वोटिंग की बात बेमानी है. हर नागरिक को एक निगेटिव या एक पोजिटिव वोट का अधिकार मिलना चाहिए. क्यूंकि जब मतदाता किसी उम्मीदवार को उचित न समझे तो वो उनमेसे सबसे बुरे उम्मीदवार को अपने एक निगेटिव वोट दे सके. ताकी कुछ घटिया नेता और असामाजिक व्यक्तियों को टिकट देने वाली पार्टियों को आईना दिखाया जा सके. जब जीत या हार का फैसला इस बात से होगा की सबसे कम निगेटिव वोट किस उम्मीदवार को मिले हैं.

    हम कुछ तो करे जो दुनिया से एक कदम आगे हो.

  3. gbpathak Says:

    Today the common man, particularly elite educated class, is immune to voting because of the deep rooted corruption in our system everywhere. Due to false promises of politicians and corruption in all fields of society the common man is bewildered and has lost faith. If voting is made compulsory then provision for negative voting must be made. Other reform that can be inducted is that 50% votes must be considered as eligibility for winning candidates. This way our election system will get more strengthened. corrupt politicians and mafias will get eliminated in the elections as people know them widely but law is unable to take action due to many shortcomings in the law.

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