आपदा बनी अवसर
पिछले सप्ताह मुझे कच्छ विश्वविद्यालय से सम्बध्द एक बी.एड. कॉलेज के नए भवन का उद्धाटन करने कच्छ के आदीपुर जाना पड़ा। इसी अवसर पर मेरी धर्मपत्नी कमला ने एक नर्सिंग स्कूल का भी उद्धाटन किया।
यह दोनों संस्थान, कमला की घनिष्ट मित्र निर्मला गजवानी के प्रयासों और समर्पण का फल है। श्रीमती गजवानी सिंधु पुनर्वास निगम की अध्यक्षा हैं।
दो स्थानों के प्रति मेरा विशेष लगाव है। निस्संदेह एक कराची, जहां मैं पैदा हुआ लेकिन 1947 में देश के विभाजन के बाद वहां केवल दो बार जा पाया-पहली बार 1978 में और अंतिम बार 2005 में। दूसरा स्थान कच्छ में आदीपुर कस्बा जिसे मेरे पिताजी और हमारे परिवार ने विभाजन के बाद अपने नए घर के रुप में अपनाया था।
पचास के दशक की शुरुआत से मैं वर्ष में दो या तीन बार आदीपुर अपने पिता और अन्य परिजनों से मिलने जाता था।
सिंध के एक प्रमुख उद्यमी भाई प्रताप दायलदास ने सिंध से आए प्रवासियों के पुनर्वास की एक योजना बनाई। भाई प्रताप की योजना की एक मुख्य विशेषता कच्छ के उत्तर-पश्चिम तट पर अपेक्षाकृत एक सुंदर बंदरगाह बनाना था। उन्हें आशा थी कि समय के साथ-साथ यह बंदरगाह कराची का स्थान ले लेगा।
काण्डला बंदरगाह के निकट गांधीधाम और आदीपुर शहर अस्तित्व में आए। गांधीधाम चहल-पहल भरा व्यापारिक केन्द्र है जबकि आदीपुर एक स्वच्छ मध्यमवर्गीय शैक्षणिक-कम-रिहायशी क्षेत्र है।
पचास के शुरुआती दशक में जब मैंने पहली बार कच्छ को देखा तो यह एक अनाकर्षक नीरस रेगिस्तान था। पिछले पांच दशकों में यहां आश्चर्यजनक रुप से काया पलट हुआ है। दो कारणों से यह परिवर्तन हुआ है। पहला, कच्छ में नर्मदा का पानी लाने में नरेन्द्र मोदी की सफलता। दूसरा, भले ही विडम्बनापूर्ण हो मगर सत्य है - 2001 का विनाशकारी भूकम्प।
गुजरात में, मुझे बार-बार लोगों की उल्लेखनीय जीवटता देखने को मिली है कि कैसे उन्होंने आपदा को अवसर में बदल दिया।
पहली बार मुझे यह सौराष्ट्र में मोरवी की भयावह बाढ़ के दौरान देखने को मिला। आज मोरवी एक आकर्षक शहर है, बाढ़ आने से पहले की तुलना में कहीं अधिक समृध्द। दूसरी ऐसी चुनौती सूरत में फैले प्लेग के समय आई थी जिसके चलते भारी मात्रा में मनुष्य मारे गए और इसके फलस्वरुप शहर के हजारों हजार श्रमिक अपने-अपने राज्यों को वापस लौट गए थे। लोगों और सरकार ने मिलकर ऐसा सफाई अभियान चलाया कि शहर आज अन्य समान नगर निगमों के लिए ईष्या का पात्र बन गया है।
और बाद में कच्छ भी ऐसे ही समान अनुभव से गुजरा। भूकम्प ने कच्छ को पूर्णतया ध्वस्त कर दिया था। लेकिन यदि आज कोई नवनिर्मित कच्छ को देखे जोकि इस क्षेत्र का प्रमुख शहर है, या भूकम्प के बाद यहां स्थापित हुए असंख्य नए उद्योग, या बड़ी मात्रा में बनी आवासीय कॉलोनियां, जो कच्छ के भूकम्प से बेघर हुए बड़ी मात्रा में लोगों के लिए बनी है-तो इसे आपादा प्रबंधन प्रयासों के मॉडल के रुप में स्वीकारेगा।
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कच्छ यूनिवर्सिटी के क्रांतिगुरु श्यामजी कृष्ण वर्मा के नाम पर होने के बाद पहले दीक्षांत समारोह में बोलते हुए हमारे पूर्व राष्ट्रपति डा. अब्दुल कलाम ने भारत की प्रगति में गुजरात के उल्लेखनीय योगदान पर भूरि-भूरि प्रशंसा की बौछार की।
डा. कलाम ने कहा था :
”गुजरात में भारत की जनसंख्या का 5 प्रतिशत और भौगोलिक क्षेत्र का 6 प्रतिशत हिस्सा है लेकिन भारत में इसका योगदान 3 लाख से ज्यादा लघु उद्योग इकाइयों, 2200 बड़ी और मध्यम उद्योगों, 182 औद्योगिक क्षेत्र और 33 विशेष आर्थिक क्षेत्र के चलते यह भारत का सर्वाधिक औद्योगिक राज्य बन गया है। गुजरात की श्रमशक्ति का योगदान भी राज्य की प्रगति में सहायक बना है। भारत के औद्योगिक उत्पादन में गुजरात का हिस्सा 16.2 प्रतिशत है जबकि गुजरात में हड़ताल के चलते कार्य दिवस हानि मात्र 0.5 प्रतिशत है- जोकि पूरे देश में सबसे कम है। गुजरात भारत के समुद्री तट के कच्चे तेल उत्पादन का 54 प्रतिशत और भारत के प्राकृतिक गैस उत्पादन का 50 प्रतिशत उत्पादन करता है।”
ऐसी वृध्दि वाले माहौल के चलते गुजरात को अपने लिए विजन 2020 तय करना चाहिए जिसमें 1990-2000 के स्थिर मूल्यों पर प्रति व्यक्ति आय 10,000 रुपए से उपर ले जानी चाहिए। इसे साक्षरता 100 प्रतिशत पहुंचानी चाहिए तथा आई.एम.आर. [शिशु मृत्यु दर] को प्रति हजार पर दस से भी कम ले जाना चाहिए। साथ ही अत्यंत गरीबी तथा बेरोजगारी का पूर्णतया उन्मूलन कर देना चाहिए।”
६४वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आप सभी को मेरी हार्दिक शुभ-कामनाएँ ।
लाल कृष्ण आडवाणी
नयी दिल्ली
१५ अगस्त, २०१०
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August 15th, 2010 at 10:11 am
कहा भी गया है प्राक्रतिक आपदा की भरपाई प्रक्रति स्वय ही कर देती है . लेकिन पीडित को हिम्मत रखनी चाहिये .
आपको स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाये