जेल से लेकर फ्रीडम पार्क तक : मेरे जीवन के एक यंत्रणापूर्ण और रोचक अनुभव वाले स्थान की पुन: यात्रा
मैं तीन दिनों से लगातार यात्रा कर रहा हूं। ये स्थान क्रमश: गोरखपुर (उत्तर प्रदेश; 15 फरवरी), मदनपल्ली (आन्ध्र प्रदेश; 27 फरवरी) और बीदर (कर्नाटक; 28 फरवरी) हैं जहां मैंने 31वीं, 32वीं और 33वीं विजय संकल्प रैलियों को सम्बोधित किया। मेरी पार्टी ने मुझसे औपचारिक चुनाव अभियान से पहले एक बड़े सम्पर्क कार्यक्रम के रूप में पूरे देश की यात्रा करने के लिए कहा और फरवरी 2008 में जबलपुर में मेरी पहली विजय संकल्प रैली का आयोजन हुआ। मैंने व्यावहारिक तौर पर देश के प्रत्येक हिस्से-अरूणांचल प्रदेश में पासीघाट से लेकर केरल में कालीकट (कोझीकोड़े) और झारखंड में दुमका से लेकर महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के वाशिम तक इन रैलियों में हिस्सा लिया।
पिछले सप्ताह ही मैं कई जगहों पर गया - गुजरात में गांधीनगर जो मेरा लोकसभा चुनाव क्षेत्र है; मुम्बई जहां मेरे पार्टी कार्यकर्ताओं ने लगभग 50,000 लोगों से एकत्र हुई 11.11 करोड़ रूपए की धनराशि पार्टी के चुनाव कोष में अंशदान के रूप में दी; बंगलौर जहां मैंने एक लाख से ज्यादा विद्यार्थियों की आतंकवाद-विरोधी रैली को सम्बोधित किया और मध्यप्रदेश में ग्वालियर जहां मैंने भाजपा के अनुसूचित जाति मोर्चा द्वारा आयोजित एक बड़ी रैली में हिस्सा लिया।
यद्यपि मुझे प्रत्येक कार्यक्रम से अत्यंत संतुष्टि हुई, लेकिन मुझे एक ऐसा अवसर मिला जिसने न केवल मेरे व्यक्तिगत जीवन बल्कि देश के जीवन में भी एक निश्चित अवधि से जुड़ी अनेक बहुमूल्य और गहरी संजोई हुई स्मृतियों को ताजा कर दिया। यह अवसर था जब मुझे कर्नाटक सरकार ने 27 फरवरी, 2009 को बंगलौर में फ्रीडम पार्क का उद्धाटन करने हेतु आमंत्रित किया। यह वही जगह है जहां अभी तक बंगलौर जेल स्थित थी; यह जेल अब शहर के बाहर दूसरी जगह पर स्थानांतरित कर दी गई है। यह वही जेल है जहां मैंने आपातकाल के दौरान (जून 1975 से लेकर जनवरी, 1977 तक लगभग पूरे 19 महीने बिताए। हरियाणा में रोहतक दूसरी जगह है जहां आपातकाल के दौरान मुझे कुछ सप्ताह तक बंद रखा गया था।)
28 फरवरी, 2009 को फ्रीडम पार्क के उद्धाटन के अवसर पर
कर्नाटक के मुख्यमंत्री श्री बी.एस. येदियुरप्पा, सांसद एवं भाजपा
के महासचिव श्री अनन्त कुमार तथा अन्य लोगों के साथ
सौभाग्यशाली एवं धन्य
एक ही जीवन में दो अलग-अलग बिन्दुओं पर दो भिन्न भूमिकाओं में एक ही जगह पर उपस्थित होना वास्तव में हर किसी के लिए सौभाग्य की बात और सर्वशक्तिमान ईश्वर की कृपा होती है - पहली बार जेल में एक राजनीतिक कैदी के रूप में और दूसरी बार फ्रीडम पार्क में परिवर्तित हुई उसी जेल के उद्धाटनकर्ता के रूप में। यही एक क्षण था जिसने मेरे हृदय को झकझौर दिया। मैं उन 19 महीनों के अत्यंत यंत्रणापूर्ण समय को भूल नहीं सकता जिस तरह मैं श्रध्देय श्री जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में लोकतंत्र की अत्यंत आनन्ददायी विजय जिसके बाद आपातकाल का अंत हुआ, को नहीं भुला सकता।
कर्नाटक के दो भूतपूर्व मुख्यमंत्रियों
श्रीरामकृष्ण हेगड़े और श्री जे.एच.पॉल
के साथ
यह वही जेल है जहां मुझे श्री अटल बिहारी वाजपेयी, श्री मधुदंडवते, श्री एच.डी. देवेगौड़ा, श्री जे.एच पटेल, श्री रामकृष्ण हेगड़े और कई दूसरे नेताओं के साथ बंदी बनाकर रखा गया था। श्री जयप्रकाश नारायण और श्री मोरारजी देसाई एवं श्री चन्द्रशेखर जैसे प्रतिपक्ष के अन्य नेताओं तथा आपातकाल का विरोध करने वाले 10 हजार लोगों को देशभर की जेलों में बंद कर दिया गया था। जैसाकि मैंने अपनी आत्मकथा ”मेरा देश मेरा जीवन” में उल्लेख किया है, श्रीमती इंदिरा गांधी जिन्होंने यह घोषणा की थी कि ”राष्ट्र लोकतंत्र से ज्यादा महत्वपूर्ण है” की अध्यक्षता में कांग्रेस पार्टी ने लोकतंत्र को ही कैद में बंद कर दिया था। सर्व-व्यापक आकाशवाणी सहित मास मीडिया के सम्पूर्ण नेटवर्क का जनता में यह विश्वास पैदा करने हेतु लोगों के मस्तिष्क को धोने के उद्देश्य से इस्तेमाल किया गया कि स्वतंत्रता, नागरिक अधिकार, प्रेस की आजादी और न्यायिक स्वतंत्रता सभी विशिष्ट वर्ग की अवधारणाएं हैं उन्हें आम आदमी की भलाई से कुछ लेना-देना नहीं है और राष्ट्र को कांग्रेस पार्टी का आभारी होना चाहिए कि उसने तात्कालिक परिवर्तन लाने के लिए देश में आपातकाल लगाया है।
मेरी आत्मकथा ”मेरा देश मेरा जीवन” से चित्र
फ्रीडम पार्क का औपचारिक उद्धाटन करने के बाद सबसे पहले मैं जेल की ईमारत की ओर गया जहां मुझे पिछली बातें स्मरण हो आई। मुझे वास्तव में उस कानूनी लड़ाई की याद हो आई जो भारतीय संविधान जिसे इंदिरा गांधी की सरकार द्वारा बुरी तरह क्षत-विक्षत कर दिया गया था, की मर्यादा की रक्षा के लिए लड़ी गई थी। कांग्रेस सरकार ने न केवल संविधान के मूल ढांचे को ही बिगाड़ा बल्कि एक साल तक लोकसभा चुनावों को भी स्थगित कर दिया था। मेरे मन में कानूनी और न्यायिक विद्वानों - श्री नानी पालकीवाला, मोहम्मद करीम छागला, श्री एच.आर. खन्ना, श्री के.एस. हेगड़े, श्री वी.आर. कृष्णा अय्यर और दूसरे विधि विशेषज्ञों जिन्होंने कानून तोड़ने वाले घमण्डी लोगों के सामने झुकने के लिए इनकार कर दिया, के लिए गहरी कृतज्ञता और प्रशंसा के भाव भरे हुए हैं। मेरे मन में उन साहसी पत्रकारों - श्री कुलदीप नायर, श्री निखिल चतुर्वेदी, श्री राज थापर और शंकर्स विकली के शंकर और भारत के महान राजनीतिक कार्टूनिस्ट श्री अबू अब्राहिम - और श्री रामनाथ गोयंका जैसे समाचार-पत्र मालिकों के प्रति भी प्रशंसा भरी हुई है जिन्होंने प्रेस की स्वतंत्रता की जलती हुई मशाल को ऊंचा करके अपने व्यवसाय को गौरवशाली बनाया।
आपातकाल के दौरान बंगलौर सैन्ट्रल जेल के
भीतर लिखी गई मेरी पुस्तक
“A Prisoner’s Scrapbook” का कवर।
मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जयप्रकाश नारायण द्वारा बनाई गयी लोक संघर्ष समिति के असंख्य भूमिगत कार्यकर्ताओं की भूमिका को नमन करता हूं जिन्होंने छिपे तौर पर पूरे देश में आपातकाल-विरोधी साहित्य प्रकाशित करवाकर बटवाया था। मैं उन पुस्तकों को भी स्मरण करता हूं जो मैंने जेल के पुस्तकालय से लेकर पढ़ी थीं - उन पुस्तकों में एक विलियम शिरेर की पुस्तक ‘The Rise and fall of the third reich’ भी थी जिसमें अडोल्फ हिटलर के अधीन नाज़ी-जर्मनी का एक स्पष्ट और व्यापक वर्णन किया गया है। मैंने इस पुस्तक का ‘A tale of two emergencies’ नामक पुस्तिका के लिए संदर्भ-बिन्दु के रूप में इस्तेमाल किया था जिसे मैंने लोकतंत्र के पक्षधर साहित्य में अपना विनम्र योगदान देने के लिए लिखा था। बाद में, मैंने बंगलौर जेल में लोकतंत्र की रक्षा हेतु यह और चार अन्य निबन्ध भी लिखे जो मेरी पुस्तक “A Prisoner’s Scrapbook” जिसे आपातकाल हटाए जाने के बाद प्रकाशित किया गया था, का हिस्सा बन गए।
मुझे जेल के दौरान जीवन के कुछ रोचक क्षणों की भी याद आई। हमें आमने-सामने के दो बड़े कमरों में कैद करके रखा गया था। श्री श्याम नन्दन मिश्रा और श्री दंडवते एक कमरे में थे और मैं तथा अटलजी दूसरे कमरे में रहते थे। जेल अधिकारियों ने जेल मैन्युअल में निर्धारित मानकों के अनुसार हमें बर्तन, क्रॉकरी, कुछ खाद्य-पदार्थ व अनाज और सब्जियां दे रखी थीं। अटलजी ने स्वेच्छा से खाना बनाने की जिम्मेदारी संभाली हुई थी। आप देखेंगे कि लोकसभा की ”हू इज हू” में कुकिंग को अटलजी के शौक के रूप में लिखा गया है। वे जो खाना बनाते थे वह साधारण लेकिन पौष्टिक होता था।
जेल में लम्बे समय तक रहते हुए मुझे सबसे ज्यादा अपने परिवार की याद आती थी। मेरे बच्चे-जयन्त और प्रतिभा छोटे थे और दिल्ली में थोड़े से संसाधनों से परिवार चलाने का बोझ पूरी तरह से मेरी पत्नी कमला पर था।
”वे आपकी स्वतंत्रता छीन सकते हैं लेकिन आपकी आशाओं को नहीं छीन सकते।”
मैंने 26 जून, 1975 की सुबह जेल में प्रवेश किया था और 18 जनवरी 1977 को रिहा किया गया। उस दिन मैंने अपनी डायरी में जो कुछ लिखा वह अभी भी मेरे दिमाग में ताजा है। जेलर द्वारा सूचित किए जाने के बाद कि आज मुझे जेल से रिहा किया जा रहा है, जैसे ही मैं आखिरी बार अपने कमरे में लौटा, ”मैंने देखा कि मेरी मेज पर पत्रों का एक बण्डल पड़ा हुआ है। वे 600 से ज्यादा पत्र थे जो सभी विदेशों से जो एमनेस्टी इंटरनेशनल के सदस्यों या सहयोगियों द्वारा मुझे भेजे गए थे। उनमें से अधिकांश क्रिसमस या नये साल के ग्रीटिंग कार्ड थे लेकिन प्रत्येक पत्र पर एक या दो पंक्तियां लिखी हुई थीं जिनसे मुझे संघर्ष के लिए शक्ति और विश्वास मिला तथा मेरे मन में आशा की किरण जगी। मैं यहां एक उदाहरण दे रहा हूं। मुझे एमस्टर्डम से लॉरी हैन्ड्रिक्स का क्रिसमस का एक ग्रीटिंग कार्ड मिला। उन्होंने लिखा :
Freedom and hope don’t go hand in hand.
They Can steal your freedom, but can’t take away your hope.
स्वतंत्रता और आशा साथ-साथ नहीं चल सकते।
ये आपकी स्वतंत्रता छीन सकते हैं लेकिन आशा को नहीं।
हां, उन्होंने 60 करोड़ लोगों की आजादी छीन ली थी लेकिन वे उनकी आशाओं को नहीं तोड़ सके!
आपातकाल की दु:खद कहानी लोकतंत्र की जबरदस्त जीत के साथ समाप्त हुई जब जनता ने सरकार के खिलाफ मतदान किया। कांग्रेस पार्टी की चुनाव में हार हुई और नई दिल्ली में श्री मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी। मुझे गर्व है कि मेरी भी इस बदलाव में एक भूमिका थी। उस सरकार में सूचना एवं प्रसारण मंत्री के रूप में मेरा मुख्य कार्य प्रेस की स्वतंत्रता पर लगी रोक को समाप्त करना था जो आपातकाल का एक सबसे घिनौना पहलू था।
बंगलौर में फ्रिडम पार्क का सामने का दृश्य
मैं कर्नाटक के मुख्यमंत्री श्री बी.एस. येदियुरप्पा और बंगलौर नगर निगम को बधाई देता हूं कि उन्होंने 21 एकड़ में फैले सैन्ट्रल जेल परिसर को भारत के स्वतंत्रता सैनानियों और लोकतंत्र के रक्षकों को सम्मान देने के लिए एक स्मारक में बदलने का निर्णय लिया। मैं चाहूंगा कि यह स्थल बंगलौर में पर्यटकों के लिए एक आकर्षण का प्रमुख केन्द्र बने और स्वतंत्रता, लोकतंत्र, न्यायपालिका और मीडिया की आजादी तथा नागरिकों की स्वतंत्रता के लिए एक तीर्थस्थान के रूप में उभरे। यह एक ऐसा स्थान बने जो उन लोगों को निरन्तर चेतावनी देता रहे कि वे कभी भी भारत को फिर से सत्तावादी शासन के शिकंजे में जकड़ने का विचार मन में न लाएं।
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March 30th, 2009 at 7:59 pm
adarniya advaniji
yeh meri hardik iksha hai ki aap ek baar desh ki kursi samhalo aur desh ko rashtravad ki or le kar chaliye na ki tathakathit udarvad ki or. Vikas baad mein aata hai sarvpratham to rashtra suraksha aati hai ki koi hindustan ki taraf nazar uthane se pehle soche…
vastvikta yeh hai ki main aapki party ka bhi follower nahin huun….lekin mere paas kehne ke liye kafi kuch hai…..main aapki pustak “Mera Desh Mera jivan” padna chahta huun lekin kimat hum aam aadmiyon wali to nahin hai…
April 14th, 2009 at 4:59 pm
Advaniji,
Sir,
My personal opinion is that BJP should supprot Varun Gandhi, because whatever he has said, we all agree. Then why should we keep our thoughts is double standard. Lets support openly, however he should be directed to keep some restrain in his word. Ghar ka ladka kuch galti kare to use samjana chaiye.