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धारा 370 समाप्त करो

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पठानकोट की सैन्य छावनी (आर्मी कैंट) से लगभग 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक छोटा सा कस्बा है माधोपुर। गत् सप्ताह इस कस्बे ने इतिहास बनते देखा।

पंजाब, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश से आए लगभग एक लाख लोगों ने डा. श्यामा प्रसाद मुकर्जी, जिनकी भव्य मूर्ति यहां स्थापित की गई है, की स्मृति को अपनी श्रध्दांजलि अर्पित की। यहां से 1953 में उन्होंने जम्मू और कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय के अभियान की शुरुआत की थी।

जहां उनका स्मारक बनाया गया है उसका नाम ‘एकता स्थल’ रखा गया है। यह आदमकद भव्य मूर्ति प्रसिध्द शिल्पकार राम सुतार द्वारा तराशी गई है। इस स्मारक को बनाने का फैसला पंजाब के मुख्यमंत्री सरदार प्रकाश सिंह बादल ने किया। मूर्ति का अनावरण राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने किया। श्री बादल की अस्वस्थता के चलते उप-मुख्यमंत्री सरदार सुखबीर सिंह बादल ने इस भव्य कार्यक्रम की अध्यक्षता की, जिसमें भाजपा के अध्यक्ष श्री नितीन गडकरी सहित हमारी पार्टी के अनेक नेताओं ने भाग लिया।

डा. श्यामा प्रसाद मुकर्जी जीवनपर्यन्त कांग्रेस के आलोचक रहे। लेकिन डा. अम्बेडकर जैसे कांग्रेस विरोधी की तरह पंडित नेहरु ने उन्हें भी महात्मा गांधी की सलाह पर पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल में सदस्य बनाया। 1950 में भारतीय संविधान के अंगीकृत होने के बाद डा. मुकर्जी ने कश्मीर और पाकिस्तान विशेषकर पूर्वी बंगाल के मसले पर पंडित नेहरु की नीतियों पर गहरे मतभेद प्रकट करते हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया।

1953 में भारतीय जनसंघ (डा. मुकर्जी द्वारा बनाई गई पार्टी) का पहला राष्ट्रीय सम्मेलन कानपुर में हुआ। यहीं पर डा. मुकर्जी ने कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय का आव्हान किया था।

जम्मू-कश्मीर राज्य भारत में विलीन हो गया था। लेकिन भारत के संविधान में धारा 370 को शामिल कर दिया गया था जिसके फलस्वरुप राज्य को अपना पृथक संविधान, पृथक प्रधान और एक अलग झंडा रखने का अधिकार मिला। तब की वहां की सरकार के मुखिया शेख अब्दुल्ला को प्रधानमंत्री घोषित किया गया। यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय, चुनाव आयोग और महालेखा नियंत्रक की भी राज्य में नहीं चलती थी। इसके अलावा यदि कोई भारतीय नागरिक जम्मू एवं कश्मीर की यात्रा करना चाहता था तो उसे परमिट से ही अनुमति मिलती थी। डा. मुकर्जी ने इसी का उल्लंघन कर सांकेतिक रुप से धारा 370 और राज्य के पृथकतावादी प्रावधानों को चुनौती दी थी।

श्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ डा. मुकर्जी ने देश के विभिन्न भागों का दौरा किया और तब माधोपुर पहुंचे जहां रावी पुल से माधोपुर जम्मू-कश्मीर राज्य को जोड़ता था। पुल के बीच रास्ते में जम्मू-कश्मीर पुलिस ने उन्हें रोककर पूछा कि क्या उनके पास प्रवेश के लिए परमिट है। डा. मुकर्जी ने उन्हें बताया कि भारतीय नागरिक होने के अलावा एक सांसद भी होने के एक नाते उन्हें लगता है कि भारत के किसी भी हिस्से में जाने का उनका अधिकार है। जब पुलिस ने उन्हें बताया कि यदि वे बगैर परमिट के आगे बढ़ते हैं तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा। तब डा. मुकर्जी ने अटलजी को कहा कि तुम वापस जाओ और देश को बताओ कि डा. मुकर्जी ने बगैर परमिट के जम्मू-कश्मीर में प्रवेश किया है हालांकि एक बंदी के रुप में!

इस समाचार ने पूरे देश को आंदोलित कर दिया। भारत के सभी भागों से जनसंघ के हजारों-हजार कार्यकर्ताओं ने माधोपुर और कश्मीरी जेलों की ओर कूच शुरु कर दिया। स्वतंत्र भारत का पहला राष्ट्रीय, आंदोलन राष्ट्रीय एकता के लिए औपचारिक रुप से शुरु हुआ जिसकी अगुवाई डा. मुकर्जी कर रहे थे।

यह अभियान लगभग दो महीने तक चला लेकिन इसके साथ एक दु:खद घटना घटी! 23 जून, 1953 की रात्रि को पूरा देश यह जानकर स्तब्ध रह गया कि हिरासत के दौरान ही डा. मुकर्जी की तबियत बिगड़ी और कुछ दिन शैय्या पर रहने के बाद अचानक उनका निधन हो गया, और उनका मृत शरीर कलकत्ता भेजा जा रहा है!

डा. मुकर्जी के बलिदान के समाचार से पूरा राष्ट्र हतप्रभ हो गया। पश्चिम बंगाल के कांग्रेसी मुख्यमंत्री बी.सी. राय और डा. मुकर्जी की मां ने प्रधानमंत्री पंडित नेहरु को पत्र लिखकर इस त्रासदी की सम्पूर्ण जांच कराने की पुरजोर मांग की। किसी भी तरह की जांच से साफ मना करने वाला सरकार का रवैया इस सारे दु:खद घटनाक्रम पर रहस्य के आवरण को और गहराता है।

लोगों के गुस्से के कुछ तत्काल नतीजे सामने आए। परमिट प्रणाली को तुरन्त समाप्त कर दिया गया। अगस्त 1953 तक जम्मू-कश्मीर में सरकार बदल गई! शेख अब्दुल्ला को बर्खास्त कर दिया गया और उनके स्थान पर उनके सहायक बख्शी गुलाम मोहम्मद को 9 अगस्त को शपथ दिलाई गई।

आने वाले महीनों में, एक के बाद एक अन्य सभी पृथकतावादी प्रावधानों जैसे राष्ट्रीय तिरंगे, राष्ट्रपति के कार्यालय से, सर्वोच्च न्यायालय, चुनाव आयोग और प्रधानमंत्री पद से जुड़े सभी प्रावधानों को बदलकर जम्मू-कश्मीर को इन मामलों में अन्य राज्यों के बराबर कर दिया गया।

जब कश्मीर की स्वतंत्रता के नाम पर आजकल यह कहा जाता है कि 1953 के बाद से निष्प्रभावी हुई धारा 370 को बदलने की जरुरत है, तो इसका तात्पर्य उन सभी प्रावधानों को फिर से प्रभावी करने की मंशा से है जो अब जम्मू-कश्मीर में निष्प्रभावी है।

20 मार्च को माधोपुर की विशाल रैली सत्ता प्रतिष्ठान को चेताने वाला राष्ट्रीय आव्हान है कि भारत डा. श्यामा प्रसाद मुकर्जी के बलिदान को कभी नहीं भूलेगा और कश्मीर में भारत के विलय के बारे में संवैधानिक कालचक्र को फिर से वापस घूमने नहीं देगा। वस्तुत: सारा देश चाहता है कि अब धारा 370 को पूरी तरह समाप्त कर आगे की ओर बढ़ा जाए !

लाल कृष्ण आडवाणी
नयी दिल्ली

21 मार्च, 2010

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4 Responses to “धारा 370 समाप्त करो”

  1. dhiru singh Says:

    धारा ३७० ,कामन सिविल कोड, राम जन्म भुमि जॆसे मुद्दे अब बेमानी लगते है आप लोगो के द्वारा. छ साल मे आपके द्वारा कोल्ड स्टोर मे पटके यह मुद्दे इतने ठंडे हो गये है अब कभी गरम ना हो पायेन्गे .

  2. ePandit Says:

    देश श्री मुखर्जी का हमेशा ऋणी रहेगा। भारत माँ के ऐसे सच्चे सपूत को हमारी तरफ से श्रद्धांजलि।

    3 जून, 1953 की रात्रि को पूरा देश यह जानकर स्तब्ध रह गया कि हिरासत के दौरान ही डा. मुकर्जी की तबियत बिगड़ी और कुछ दिन शैय्या पर रहने के बाद अचानक उनका निधन हो गया, और उनका मृत शरीर कलकत्ता भेजा जा रहा है!

    लाल बहादुर शास्त्री, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, नेता जी सुभाष चन्द्र बोस आदि जो भी “गैर काँग्रेसी” देशभक्त नेता थे उन सबका अचानक रहस्यमय रुप से ही क्यों निधन हुआ। खेद है कि इस रहस्य से कभी पर्दा न उठेगा।

  3. मुकुल गोयल एडवोकेट, मथुरा Says:

    आदरणीय आडवाणी जी,

    आप और आपकी पार्टी के लोग ‘भारत के संविधान’ में से धारा ३७० को समाप्त करने की बात करते हैं । लेकिन आप इस धारा ३७० को समाप्त कैसे कर पायेंगे क्योंकि– पिछले साठ सालों में आपको और आपकी पार्टी के लोगों को यही नहीं पता चला है कि– संविधान में ‘धारा’ शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है बल्कि ‘अनुच्छेद’ शब्द का प्रयोग किया गया है । मतलब यह है कि– यह ‘धारा ३७०’ नहीं है, बल्कि “अनुच्छेद ३७०” है । जब आपको इतनी सामान्य-सी बात ही नहीं मालूम है तो आप इस ‘अनुच्छेद ३७०’ को समाप्त करने की प्रक्रिया के विषय में ही क्या जानते होंगे ?

  4. सुनील दत्त Says:

    हम तो चाहते है कि, शांति का अपना मार्ग हम कभी न छोड़ें।
    हम तो चाहते है कि, शांति का अपना मार्ग हम कभी न छोड़ें।
    पर क्या करें, कमबख्त शत्रु मानता ही नहीं,
    पर क्या करें, कमबख्त शत्रु मानता ही नहीं
    शांति की भाषा जानता ही नहीं।।
    हमने तो पांडवो की तरह, अफगानीस्थान,पाकिस्तान, बंगलादेश,कशमीरघाटी सब छोड़ दिए थे।
    पर शत्रु है, कि रूकने का नाम लेता ही नहीं; हमले पर हमला किए जाता है।
    कभी दंगा भड़काता है तो, कभी आरडीएकस व बम्ब चलाता है।
    भारतीयों को हर जगह से मार भगाता है।।
    इस शत्रु ने के, न जाने कितने भारतीयों के घर तोड़े
    हम तो चाहते है कि, शांति का अपना मार्ग हम कभी न छोड़ें।
    आओ; अपने बचे पांच गांवों(भारत) के लिए, शांति छोड़ कर शस्त्र उठायें,
    इस कमबख्त, कमीने शातिर शत्रु को मार भगायें।
    हम भी इस पर घर वापसी का, दबाब वनायें,
    न माने तो इस पर बम्ब चलायें ।
    हम शांति तो तब करेंगें, जब हम रहेंगे जब हम ही न रहेंगे ,
    तो शमशानघाट की शांति का, भला हम क्या करेंगे।।

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