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न्यायाधीश हेगड़े देश के राष्ट्रपति बन सकते थे

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‘प्रतिबध्द’ विशेषण सामान्यतया सकारात्मक भाव में गिना जाता है। लेकिन मुझे स्मरण आता है साठ के दशक का अंतिम और सत्तर के दशक की शुरुआत की राजनीतिक चर्चाएं जब अचानक इस विशेषण का उस अर्थ में उपयोग में लिया जाने लगा जैसा पहले कभी नहीं हुआ था।

प्रतिबध्द प्रेस, प्रतिबध्द नौकरशाही और प्रतिबध्द न्यायपालिका जैसे इन विशेषणों को सुनकर सभी लोकतंत्रप्रेमियों को चिंता होने लगती थी।

विशेषकर यह तीनों विशेषण परेशानी में डालने वाले थे। वस्तुत, ऐसा माना जाता है कि प्रतिबध्द न्यायपालिका की अवधारणा का पालन करते हुए ही 1973 में प्रधानमंत्री श्रीमती गांधी ने तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों-न्यायाधीश के.एस. हेगड़े, न्यायाधीश जे.एम. शेलट और न्यायाधीश ए.एन. ग्रोवर की वरिष्ठता को नजरअंदाज कर इन तीनों से कनिष्ठ न्यायाधीश ए.एन. रे को भारत का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया।

इसी घटना ने मुझे न्यायाधीश के.एस. हेगड़े और उनके परिवार के निकट ला दिया और वह रिश्ता बना जो पिछले इन दशकों से बना हुआ है। लेकिन हाल ही में आपातकाल के काले दिनों पर नजर डालते समय मैंने पाया कि इन न्यायाधीशों की पदावनति का श्रीमती गांधी के विरुध्द चुनाव याचिका और विशेष रुप से न्यायाधीश हेगड़े से व्यक्तिगत रुप से-लेना देना था।

यह सभी जानते हैं कि श्रीमती गांधी के चुनाव संबधी केस में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले ने ही आपातकाल लगवाया। बिशन टंडन की ‘पीएमओ डायरी’ उन दिनों प्रधानमंत्री कार्यालय में चल रहे सभी घटनाक्रमों का अधिकृत और रहस्योद्धाटन करने वाली पुस्तक है। पुस्तक विधि मंत्री गोखले का यह कथन उद्दृत करती है कि श्रीमती गांधी न्यायाधीश हेगड़े के मुख्य न्यायाधीश बनने से काफी डरी हुई थी। उन्हें आशंका थी कि उनके मुख्य न्यायाधीश बनने से उनकी चुनाव याचिका पर गंभीर असर पड़ सकता है।

अपनी डायरी में टंडन कहते हैं कि उन्होंने गोखले से पूछा कि यदि वे न्यायाधीशों की पदावनति के मामले में इतने अप्रसन्न थे तो उन्होंने त्यागपत्र क्यों नहीं दिया? गोखले ने कहा कि उन्होंने ”सोचा कि न्यायपालिका के प्रति उनका कठोर रुख हेगडे क़े कारण था और एक बार जब चुनाव याचिका का निपटारा हो जाएगा, यह स्थिति बदलेगी…… चुनाव याचिका के निपटारे के बाद वह (गोखले) प्रधानमंत्री को समझाने में सफल रहेंगे कि न्यायपालिका के साथ दुर्व्यवहार न किया जाए। लेकिन चुनाव याचिका पर निर्णय ने समूची स्थिति को बदल दिया।”

बिशन टंडन के साथ अपनी बातचीत में, गोखले एकदम स्पष्ट थे। टंडन अपनी पुस्तक में बताते हैं ”गोखले ने माना कि आपातकाल में त्यागपत्र देने से वह डरते थे। उनका पक्का मानना था कि यदि वह ऐसा करते हैं तो प्रधानमंत्री उन्हें जेल भेज देंगी जिसके लिए वह अपने स्वास्थ्य के चलते तैयार नहीं थे। उपनी बातचीत समाप्त करते हुए गोखले ने कहा ‘बिशन, आप इसे मेरी कमजोरी या कुछ भी समझ सकते हैं मगर तथ्य यह है कि मैं जेल नहीं जाना चाहता’।”

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मैं न्यायाधीश हेगड़े के जितना निकट आता गया उतना ही उनके प्रति मेरा सम्मान बढ़ता गया। 1977 के लोकसभाई चुनावों में जनता पार्टी जीती और श्री मोरारजी भाई देसाई प्रधानमंत्री बने। उन्होंने मुझे अपनी मंत्रिमंडल में मेरी पत्रकारिता की पृष्ठभूमि के चलते, सूचना एंव प्रसारण मंत्री के रुप में शामिल किया। मैं उल्लेख करना चाहूंगा कि वह मुझसे मेरे विभाग के अलावा भी अन्य विषयों पर खुलकर विचार विमर्श करते थे।

सरकार के शुरुआती दिनों में मुझे याद है कि उन्होंने मुझसे पूछा कि कुछ संवैधानिक पदों को भरने के लिए कौन-कौन सी सही पसंद हो सकती है- जैसे लोक सभा का स्पीकर पद। मेरा तत्काल जवाब था: एक पत्रकार के नाते मैंने जिन सभी स्पीकरों को देखा है, उनमें मुझे संजीवा रेड्डी सर्वाधिक उपयुक्त लगते हैं। सदन का प्रबंधन करने में, सदस्यों को समझाने में वह नियम पुस्तक से ज्यादा सामान्य ज्ञान और विद्वता का ज्यादा सहारा लेते हैं। जब यह चर्चा राष्ट्रपति पद के चली तो मैंने मोरारजी भाई को कहा कि मैं सोचता हूं विद्वता, निष्पक्षता और सभ्य व्यवहार के संदर्भ में राष्ट्रपति पद के लिए न्यायाधीश के.एस. हेगड़े का नाम सर्वाधिक उत्तम रहेगा। श्री देसाई का जवाब था: मैं इन दोनों नामों पर सहमत हूं। लेकिन संजीवा रेड्डी राष्ट्रपति बनने के इच्छुक हैं। और जिस ढंग से पहले कांग्रेस पार्टी के संसदीय बोर्ड द्वारा उनको राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी घोषित करने के बाद भी उन्हें हार का सामना करना पड़ा, उससे मुझे उनकी इच्छा समझ में आती है।

और इस प्रकार श्री संजीवा रेड्डी 1977 में राष्ट्रपति बने और न्यायाधीश हेगड़े लोकसभा के स्पीकर

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मैंने श्री सन्तोष हेगड़े के प्रति अपनी गहन कृतज्ञता प्रकट की कि उन्होंने मेरे इस अनुरोध को कि उन्हें कर्नाटक का लोकायुक्त बने रहना चाहिए को तुरंत और गर्मजोशी से स्वीकार किया, और अपने त्यागपत्र पर जोर नहीं डाला। मैं मानता हूं कि राज्य सरकार उनकी चिंताओं का पूरा-पूरा ध्यान रखेगी।

लाल कृष्ण आडवाणी
नई दिल्ली/ जकार्ता

१० जुलाई २०१०

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2 Responses to “न्यायाधीश हेगड़े देश के राष्ट्रपति बन सकते थे”

  1. dhiru singh Says:

    अतीत के पन्ने पढ कर अच्छा लगा . आज ऎसी इच्छा शक्ति के बहुत ही कम लोग रह गये है .

  2. vinod Says:

    Mr. Advani,

    How this Justice Hegde is relevant here…….if you have courage and not power hungry…sack the minister….let the Govt fall….People of Karnataka will bring back your party in power for this gesture.

    To tell you the truth, BJP has lost 2004 Loksabha not bcoz of poor performance but bcoz it has tried to defend misdeeds of its state govt specially Gujarat riots and criticized congress on same grounds for SIKH riots….

    Atleast Congress was humble enough who has sought apology for emergency and sikh riots….
    what about your party? still defending fake encounter ministers

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