मेरी हम्पी यात्रा और सम्राट कृष्णदेव राय के राज्याभिषेक के ५०० वर्ष
विगत सप्ताह कर्नाटक के हम्पी में विजयनगर साम्राज्य के महान सम्राट कृष्णदेव राय के राज्याभिषेक की ५००वीं वर्षगांठ के शुभ अवसर पर एक भव्य समारोह आयोजित हुआ. इसके अत्यंत सफल आयोजन के लिए राज्य सरकार और मुख्यमंत्री श्री येदियुरप्पा को मेरी हार्दिक बधाई.
प्रति वर्ष, इस अवसर पर, एक त्रि-दिवसीय उत्सव मनाया जाता है जिसमे हम्पी नगर के मध्य से एक भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है. पर, दुर्भाग्यवश, इस महान साम्राज्य के गौरवशाली इतिहास के बारे में इस क्षेत्र से बाहर देश में बहुत कम लोग ही जानते हैं. गत वर्ष, पहली बार मुझे हम्पी जाने और इस शोभा यात्रा में सम्मिलित होने का अवसर मिला.
यह शोभायात्रा नगर के मुख्य मंदिर - विरूपाक्ष मंदिर, से प्रारंभ होती है. गत वर्ष, जब मैं वहां अपने परिवार के साथ गया और यात्रा में सम्मिलित हुआ, तब वहां के मुख्य पुजारी ने हमारा स्वागत किया और मुझे बताया कि आने वाला वर्ष हम्पी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होगा क्योंकि तब विजयनगर साम्राज्य के महानतम शासक श्री कृष्ण देव राय के राज्याभिषेक का ५००वां वर्ष होगा. मैंने उनसे वादा किया था कि मैं २०१० में दुबारा अवश्य आऊंगा. वहां पुनः जाकर मैंने अपना यही वादा पूरा किया.
इस वर्ष लाखों की संख्या में, कर्नाटक के कोने-कोने से, लोग हम्पी आकर बड़ी प्रसन्नता और उत्साह के साथ समारोह में सम्मिलित हुए. आर्ट ऑफ़ लिविंग संस्था के प्रमुख श्री श्री रवि शंकर जी भी समारोह में भाग लेने हेतु आये. उन्होंने समापन समारोह में आये लगभग एक लाख लोगों को संबोधित किया. इस समापन समारोह का प्रमुख आकर्षण था - सम्राट कृष्ण देव राय के राज्याभिषेक को दर्शाने वाली एक अत्यंत भव्य संगीत नृत्य नाटिका. संगीत के इस विशेष कार्यक्रम का सृजन और मंचन कन्नड़ फिल्म जगत की मानी-जानी हस्तियों और प्रसिद्ध संगीत विशारदों द्वारा किया गया. उनके अलावा छः सौ से अधिक लड़के और लड़कियों ने इस कार्यक्रम में भाग लिया. इसके कार्यक्रम के पूर्व, दिन में, एक ऐसे परिकल्पना संस्थानक [थीम पार्क ] की आधार शिला रखी गयी, जहाँ आकर पर्यटक सम्राट कृष्ण देव राय के महान साम्राज्य के गौरव का अवलोकन कर सकेंगे.
सायंकाल के एक कार्यक्रम में मुझसे एक अत्यंत सुन्दर और गहन शोध के साथ तैयार की गयी पुस्तक को विमोचित करने का आग्रह किया गया. दो अमेरिकी विद्वानों जॉन एम् फ्रिट्ज एवं जॉर्ज मिशेल द्वारा लिखित एवं सम्पादित इस पुस्तक का शीर्षक है - ‘हम्पी : ए स्टोरी इन स्टोन’. इन दोनों विद्वत जनों ने बीस वर्ष के शोध एवं परिश्रम के बाद इस उत्कृष्ट पुस्तक को तैयार किया तथा इसको अत्यंत सुन्दर चित्रों से सुसज्जित किया मुंबई के विलक्षण फोटोग्राफर श्री नौशीर गोभाई ने.

१४ वीं शताब्दी में विजयनगर साम्राज्य की स्थापना हमारे देश के इतिहास की एक कालजयी घटना है. श्री कृष्णदेव राय एक अजेय योद्धा एवं उत्कृष्ट युद्धविद्या विशारद थे. इस महान सम्राट का साम्राज्य अरब सागर से लेकर बंगाल की खाड़ी तक भारत के बड़े भूभाग में फैला हुआ था - जिसमे आज के कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल, गोवा और ओडिशा प्रदेश आते हैं. कृष्ण देव राय के शासन के पूर्व देश के इस हिस्से में आपस में लड़ते रहने वाले क्षत्रपों का राज्य था. इन क्षत्रपों में चार प्रमुख राजघराने थे - वारंगल के ककातिया, मध्य दक्षिण पठारी क्षेत्र के होयसला, देवागिरी के यादव और धुर दक्षिण के पंड्या. श्री कृष्णदेव राय की उपलब्धि उन्हें महान सम्राटों - अशोक, चन्द्रगुप्त एवं हर्षवर्धन के समकक्ष खड़ा करती है. अपने २१ वर्ष के शासन (१५०९-१५३०) में उन्होंने १४ युद्धों का सामना किया और सभी में विजय प्राप्त की. उनका सबसे उल्लेखनीय युद्ध था बीजापुर, अहमदनगर और गोलकुंडा के सुल्तानों की संयुक्त सेना के साथ.
जिन इतिहासकारों ने उस समय की घटनाओं का विश्लेषण किया है, उनका मानना है राजा कृष्णदेव राय की युद्धक्षेत्र में विलक्षण उपलब्धियों का कारण सिर्फ उनकी वीरता और युद्ध-कौशल ही नहीं था बल्कि उनके द्वारा किये गए प्रशासनिक सुधार भी थे.
आज जब हम अपने चारों ओर भाषाई संकीर्णता और क्षुद्रता बढ़ती देख रहे हैं, तब श्री कृष्णदेव राय हमारे लिए और भी प्रासंगिक हो जाते हैं क्योंकि वे कन्नड़ भाषी क्षेत्र में जन्मे ऐसे महान नेता थे जिनकी मुख्य साहित्यिक रचना ‘अमुक्तामाल्यादा’ तेलगु भाषा में रचित थी. अपने प्रशासनिक सुधारों में उन्होंने बड़े पैमाने पर राजसत्ता के पारंपरिक हिन्दू सिद्धांतों और नियमों का समावेश किया जिन्हें कौटिल्य, शुक्र, भीष्म और विदुर जैसे मनीषियों ने प्रतिपादित किया था. इसीलिए, हालांकि एक सम्राट के तौर पर वे राज्य के मुखिया थे, लेकिन उनके शासन में नीति-निर्देशन के लिए एक मंत्री-परिषद् भी थी जिसका नेतृत्व एक प्रधान मंत्री करते थे जिनका नाम था सलवा तिम्मा.
इस महान शासक की बुद्धिमत्ता के साक्ष्य के रूप में, मैं अमेरिकी विद्वतजनों द्वारा लिखित उस सुन्दर पुस्तक, जिसका मैंने हम्पी में विमोचन किया था, से एक अद्भुत अनुच्छेद का उल्लेख करता हूँ :
“हम्पी में आज आने वाले पर्यटक प्रायः यह प्रश्न पूछते हैं की यह शहर जो कि इतने महान साम्राज्य की राजधानी था, क्यों इतने बियावान और सुदूरवर्ती जगह पर स्थित है. इसके कई कारण और व्याख्याएँ हो सकती हैं. प्रथम तो यह कि इस जगह कि प्राकृतिक मजबूती और नैसर्गिक अभेद्यता विजयनगर के मूल शासकों को जरूरी सुरक्षा प्रदान करती होगी. आज भी, उत्तर दिशा से हम्पी जाने वाला रास्ता अत्यंत दुर्गम्य है. यह वही दिशा है जहाँ विजयनगर साम्राज्य के हठी शत्रुओं, दक्षिण राज्यों की सल्तनतें स्थित थी. सच में यह जगह एक अभेद्य प्राकृतिक दुर्ग की तरह थी जिसको और दुर्गम बनाने के लिए बस कुछ और अतिरिक्त परकोटों की आवश्यकता थी जो कि दक्षिण-पूर्व के भूद्रश्य को एकसार कर देते. इस जगह की एक और विशेषता थी और वह थी प्रचुर मात्र में पानी की उपलब्धता. कर्नाटक की सबसे बड़ी नदी तुंगभद्रा इसी भूभाग से बहती है. और इस भूभाग की संरचना ऐसी है कि बहती हुई नदी अचानक अपनी ऊंचाई खोकर नीचे की ओर आती है, परिणामतः यह अत्यधिक गति पकड़ लेती है और बाढ़ इत्यादि के समय में प्रचंड वेग से बहती है. इस भौगोलिक स्थिति का सम्पूर्ण सदुपयोग करते हुए विजयनगर के शासकों ने एक जटिल जल-चालित प्रणाली [ कॉम्प्लेक्स हाईड्रालिक सिस्टम ] का निर्माण किया जिसके द्वारा धान (चावल) और अन्य आवश्यक अनाजों और फसलों का उत्पादन सुगम हो सका. केवल यही एक रास्ता था जिसके द्वारा नगर खाद्य के लिए आत्मनिर्भर बन सकता था और अपने हजारों नागरिकों के लिए भरण-पोषण की व्यवस्था कर सकता था. इसके साथ ही ऐसी नहरों का निर्माण किया गया जो नदी के ऊपरी मुहाने से निकल कर पूरे भूभाग से होते हुए छोटी पूरक नहरों को आगे बढ़ाते हुए निचले क्षेत्रों में फैले हुए खेतों तक पहुंचाती थी. इस अद्भुत जल-चालित प्रणाली के अवशेष आज भी उपयोग में आते देखे जा सकते हैं जोकि गन्ने और केले के बड़े बागानों को संभव बनाते हैं. यह कोई संयोग नहीं है कि आज की ‘तुंगभद्रा जल-विद्युत् परियोजना’ हम्पी के नज़दीक स्थित है जहाँ से नदी दो पहाड़ियों के बीच एक संकरे मार्ग से बहती है. पूरी घाटी और पूरे भू-पटल में स्थित ‘बंध’ (मिटटी-पत्थर से बनी दीवारों के अवशेष) इस बात के द्योतक हैं कि पूर्व में इस तरह के बांधों का निर्माण किया जाता था. कुछ पूर्ववर्ती जलघर और जलाशय आज भी उपयोग में लाये जा रहे हैं जैसे की कमालपुरा के बाहरी क्षेत्रों में जहाँ कि मानसून के दिनों में जल को एकत्रित किया जाता है.”
लालकृष्ण आडवाणी
नयी दिल्ली
१ फ़रवरी, २०१०
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February 4th, 2010 at 11:06 am
Respected Advani Saheb,
01.Are we not capable to unite Nepal,Bangladesh,Pakistan into one country i.e Akhanda Bharat?
02. Are we not capable to equalize the value of all the currencies by making reformations in the international acts,rules & procedure.
SAMBHUNATH TIADI
ADVOCATE
BHUBANESWAR(ORISSA)
February 9th, 2010 at 2:07 am
आदरणीय आडवानी जी, आपसे संवाद स्थापित करते हुए अत्यंत हर्ष का अनुभव हो रहा है. विजयनगरम राज्य की यात्रा तो तीर्थयात्रा के तुल्य है. आपको इस उपलब्धि के लिए बधाई. अब एक सुझाव. कैसा रहे अगर अपनी भारतीय जनता पार्टी के समस्त कार्यकर्ताओं के लिए आर्ट ऑफ़ लिविंग के कोर्स को अनिवार्य कर दिया जाये. मेरे विचार से इस कोर्स में इस वानर सेना में वहीँ उत्साह भर देने की शक्ति है जैसा उत्साह एक समय गुरु गोविन्द सिंह एवं समर्थ गुरु रामदास ने क्रमशः सिखों और मराठों में भर दिया था. आपके पास लाखों कार्यकर्ता हैं. यदि वे एक प्राण हो जाएँ तो इस राष्ट्र की गौरवशाली संस्कृति को फिर से पुनर्जीवित कर सकते हैं. जय श्रीकृष्ण.