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राजनीति और खेल

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पिछले दिनों मैं अपनी पत्नी कमला और पुत्री प्रतिभा के साथ रामेश्वरम की यात्रा पर गया. चारों धामों में से रामेश्वरम ही बचा था जहां मैं नहीं जा पाया था। दक्षिण में स्थित इस धाम की दिलचस्प यात्रा के बाद मैंने शुक्रवार का दिन आराम से टेलिविज़न पर दो बिंवलडन सेमी-फाइनल मैच देखकर बिताया।

दोनों ही मैच - टॉमस बेरडा (चेक) बनाम नॉवक डाइओकोविक (सर्ब) और राफेल नाडल (स्पेन) बनाम एण्डी मुरी (यू.के.) के बीच दिलचस्प खेल थे और अच्छे ढंग से खेले गए थे।

सबसे ज्यादा मुझे पसंद आयी स्पेनियार्ड की अपने ब्रिटिश प्रतिस्पर्धी के बारे में मैच के बाद की गई टिप्पणी। उन्होंने मुरी की प्रशंसा में कहा वे सिर्फ खिलाड़ी ही नहीं बल्कि एक अच्छे व्यक्ति भी हैं। खेल की समाप्ति पर जब दोनों नेट के पास एक-दूसरे से गले मिले तो उत्साह साफ देखते बनता था।

इससे मेरे मन में खेलों और राजनीति के बारे में अक्सर हमारे देश में की जाने वाली टिप्पणी का स्मरण हो आया।

कहा जाता है कि भारत में खेलों में बहुत ज्यादा राजनीति है जबकि दुर्भाग्य से राजनीति में बहुत कम खेल भावना है।

मुझे बजट सत्र का अंतिम दिन 7 मई याद आ रहा है। मैं संसद भवन के अपने कक्ष में बैठा था। तभी सुषमाजी का फोन आया। उन्होंने मुझे बताया ”सीपीएम और सीपीआई के दो लोकसभा सांसद बासुदेव आचार्य और गुरुदास दासगुप्ता यहां पर हैं और चाहते हैं कि आप भी इस संक्षिप्त विचार-विमर्श में शामिल हों।”

जैसे ही मैं सुषमाजी के कार्यालय में पहुंचा तो गुरुदास दासगुप्ता की शुरुआती टिप्पणी थी ”आडवाणीजी, आज हम पहली बार ‘निषिध्द क्षेत्र’ में आए हैं!” मैं मुस्कराया और कहा ”हमारे लिए ऐसा कभी भी कुछ निषिद्ध नहीं रहा। आपका हमेशा से ही इस ‘निषिध्द क्षेत्र’ में स्वागत रहा है। यह तो आपका स्वयं का लगाया प्रतिबंध ही है।”

मेरे लम्बे संसदीय जीवन में, वामपंथियों का कांग्रेस के साथ खुला गठबंधन हाल की घटना थी। काफी समय से वे कांग्रेस-विरोधी विपक्ष का हिस्सा रहे और इसलिए जनसंघ/ भाजपा सहित अन्य विपक्षी दलों की गतिविधियों से समन्वय करते रहे। यह भी सत्य है कि भाजपा के प्रति उनका पूर्वाग्रह अक्सर किसी न किसी किस्म की राजनीतिक अस्पृश्यता का रुप लेता रहा है। वे कभी भी हमारे पार्टी कार्यालय नहीं आए थे।

यहां तक कि राष्ट्रपति पद के लिए विपक्ष के संभावित साझा उम्मीदवार की चर्चा करते समय स्थान भाजपा को छोड़ अन्य किसी विपक्षी पार्टी का कार्यालय रहा!

हमारे साथ उनका विशेष समन्वय संवाद यदि रहा तो सदन अथवा लॉबी में ही …..

1989 में एक समय ऐसा आया जब श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह भाजपा और वाम मोर्चे के बाहरी समर्थन से ही प्रधानमंत्री बन सके। संसद सत्र के दौरान प्रत्येक सप्ताह सभी सहयोगी दलों के नेता प्रधानमंत्री के निवास पर रात्रि भोज पर मिलते थे और सरकारी और संसदीय मुद्दों पर व्यापक मुद्दों पर विचार विमर्श होता था।

उस दौरान एक दिलचस्प किस्सा हुआ। मुख्यमंत्री ज्योति बसु की तरफ से मुझे संदेश आया: ”क्या अटलजी और आप नई दिल्ली के वसंत विहार में रात्रिभोज पर आ सकते हैं ? यह विचार विमर्श करेंगे की वी0पी सिंह की सरकार के कामकाज को कैसे सुधारा जा सकता है।”

इस प्रस्ताव पर सहमत होते हुए हम एक ऐसे व्यक्ति जो दोनों पक्षों का परिचित था, के गेस्ट हाऊस में रात्रिभोज पर मिले। तब मैने माक्र्सवादियों को कहलवाया : ”क्या यह अच्छा नही होगा कि यदि यह रात्रिभोज अटलजी या मेरे निवास स्थान पर हो या तत्कालीन मुख्यमंत्री कलकत्ता में रात्रिभोज आयोजित करें?” मुख्यमंत्री पक्ष की ओर से हमें बताया गया कि उनकी पार्टी इसे पसंद नही करेगी !

मैं अक्सर जनसंघ के 1967 में कोझीकोड (कालीकट) में पार्टी के मुख्य विचारक प0 दीनदयाल उपाध्याय की अध्यक्षता में हुए अधिवेशन की घटना का संदर्भ देता हूं जिसमें उनकी इस बात की आलोचना की गई थी कि उन्होंने बिहार में संविद सरकार में जनसंघ को भाग लेने की अनुमति दी जिसमें सी0पी0आई भी शामिल था।

दीनदयालजी द्वारा इस आलोचना के दिए गये उत्तर को मैं कभी भूल नहीं सकता। उन्होंने कहा ” मैं इसे विडंबना मानता हूँ कि जब हम सामाजिक अस्पृश्यता को बुरा मानते हैं लेकिन राजनीतिक मामलों में कुछ ‘अछूत’ माने जाने वाले वर्गों के प्रति अस्पृश्यता को ना अपनाना अक्षम्य माना जाता है । जनसंघ को मेरी सलाह है : अपने सिध्दान्तों या मूल्यों से समझौता मत करो; लेकिन किसी भी तरह की अस्पृश्यता चाहे वह सामाजिक हो या राजनीतिक - का अनुपालन मत करो।

लाल कृष्ण आडवाणी
नयी दिल्ली

४ जुलाई, २०१०

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2 Responses to “राजनीति और खेल”

  1. dhiru singh Says:

    पं०दीनदयाल उपाध्याय जैसे संत राजनेता के मुल्य व दर्शन की उपेक्षा ही आज भाजपा के गिरावट का कारण है . एकात्म मानववाद , अन्तोदय को ही लेकर चले होते तो हो सकता है सत्ता का स्वाद कुछ वर्ष बाद मिलता लेकिन स्थायी होता .

  2. Sumant Says:

    ये सचमुच दुःखद है कि खेलों में राजनीति बहुत अधिक है और राजनीति में खेल भावना बहुत कम। और इससे अधिक दुःखद तो यह है कि आपकी पीढ़ी के नेताओं के राजनीति से सन्यास के बाद यह भावना लगभग पूरी तरह समाप्त हो चुकी है।

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