राष्ट्रीय पहचान का अन्तर्राष्ट्रीय सन्देश

मैं सन् 1970 में संसद के लिए चुना गया था। मेरा पहला विदेशी दौरा सन् 1972 में चेकोस्लोवाकिया जाने वाले संसदीय प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में हुआ था। लोकसभा अध्यक्ष श्री गुरदयाल सिंह ढिल्लों उस प्रतिनिधिमंडल के नेता थे।

उन दिनों चेकोस्लोवाकिया समाचारों में बहुत ज्यादा छाया हुआ था। सन् 1965 में अलेक्जेंडर डयूबेक द्वारा चेकोस्लोवाक कम्युनिस्ट पार्टी का नेतृत्व संभालने के बाद, पार्टी की घरेलू नीति में जबरदस्त बदलाव लाने और लोगों को एक स्थान पर एकत्र होने तथा बोलने की स्वतंत्रता प्रदान करने और गुप्त पुलिस पर कठोर प्रतिबंध लगाने के अधिकार को बहाल करने की परिकल्पना की थी। चेक नागरिकों द्वारा ”समाजवादी लोकतांत्रिक क्रांति” के रूप में उल्लिखित इस कार्रवाई योजना ने मास्को को अत्यधिक परेशान कर दिया।

सन् 1968 में क्रोधित संयुक्त राज्य सोवियत गणराज्य (यूएसएसआर) ने इन ”लोकतांत्रिक” प्रवृतियों को कुचलने का निर्णय लिया। चेकोस्लोवाकिया पर 6,00,000 सैनिकों ने चढ़ाई कर दी। कम्युनिस्ट पार्टी में सभी उदारवादियों का सशस्त्र सफाया कर दिया गया, डयूबेक को सत्ता से बाहर कर दिया गया और नई सरकार स्थापित कर दी गई। इस देश का एक बार फिर से दर्जा घटाकर उसे मास्को का एक मातहत राज्य बना दिया गया।

जब मैं संसदीय प्रतिनिधित्व मंडल के साथ चेकोस्लोवाकिया जाने के लिए सहमत हो गया, तो मैंने सोचा कि जाते हुए संयुक्त राज्य सोवियत गणराज्य (यूएसएसआर) की भी यात्रा क्यों न कर ली जाए? इसलिए मैंने मास्को से होकर प्राग जाने की योजना बनाई। लोकसभा के महासचिव श्री एस. एल. शकधर जो बाद में देश के मुख्य चुनाव अधिकारी बने, ने मुझे रोकने की काफी काशिशें की। उन्होंने कहा ‘आप जनसंघ से हैं। साम्यवाद और मास्को द्वारा चेकोस्लोवाकिया पर हमले के बारे में आपकी पार्टी की आलोचनात्मक राय से सभी वाकिफ हैं। मुझे डर है कि आपको उस वजह से कोई दिक्कत आ सकती है।’

फिर भी, मैं यू.एस.एस.आर. गया। हवाई अड्डे पर मेरे सामान की कड़ी जांच-पड़ताल किए जाने के सिवाए मुझे वहां पर कोई समस्या नहीं आई। मैं मास्को में दो दिन रूका। उस समय मई का महीना चल रहा था और उन दिनों मास्को आम तौर पर गर्म रहता है। मैं मास्को के जिस होटल में ठहरा हुआ था, मुझे एक रोचक अनुभव हुआ। जब मैं होटल की लॉबी में नीचे आया तो मैंने अपनी परम्परागत पोशाक ”धोती कुर्ता” पहन रखी थी। जैसे ही मैं वहां से गुजरा तो मैंने देखा कि एक महिला मेरी वेशभूषा को लगातार घूर-घूर कर देख रही थी। वह तुरन्त दौड़कर मेरे पास आई और मुझे सम्बोधित करते हुए बोली ”भारत”। उसने एक क्षण के लिए रूककर फिर कहा ”राजकपूर का भारत?”

मैंने हामी भरते हुए अपना सिर हिलाया। लेकिन उस छोटी सी बातचीत से मुझे जबरदस्त आभास हुआ कि फिल्में और फिल्म स्टार भी राष्ट्रीय पहचान का प्रमाण चिह्न बना सकते हैं और संभवत: वे अन्तर्राष्ट्रीय सन्निकटता और मित्रता के सशक्त अभिकर्ता बन सकते हैं।

यह घटना पिछली रात मेरे मस्तिष्क में उस समय कोंधी जब मैं मुख्यत: मुम्बई में हुई ताजा आतंकवादी हिंसा के विरूध्द लड़ने वाले नायकों को सम्मानित करने हेतु आयोजित एक समारोह में भाग ले रहा था। इस समारोह में आमिर खान को उनकी फिल्म ”तारे जमीं पर” और निर्देशक डेनी बॉयल तथा पुरस्कार विजेता ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ की भूमिका को सम्मानित किया गया। इस फिल्म के संगीत निर्देशक ए.आर.रहमान ने गोल्डन ग्लोब अवार्ड सहित विदेशों में अनेक पुरस्कार जीते हैं। भारत के अनेक लोग ए.आर.रहमान और फिल्म को कई ऑस्कर मिलने की ओर भी उत्सुकता से देख रहे हैं। इस फिल्म ने पहले ही दस नामांकन हासिल किए हैं।

आमिर खान की ”तारे जमीं पर” एक सुन्दर फिल्म है जिसकी कहानी एक ऐसे 9 वर्षीय बच्चे के इर्द-गिर्द घूमती है जो वाचन वैकल्य (Dyslexia) से ग्रसित है। यह एक ऐसी बीमारी है जो बच्चों के दिमाग को प्रभावित कर देती है जिसके कारण बच्चा शब्दों की बनावट में अंतर करने में असमर्थ रहता है। उसे यह वेदना सताती रहती है जिसे बोलचाल की भाषा में ”शब्द नेत्रहीनता” कहा जा सकता है। आमिर खान की फिल्म की कहानी और उनका निर्देशन वास्तव में उत्कृष्ट हैं। इसी तरह, प्रसून जोशी के गीत और शंकर एहसान लॉय का संगीत भी उच्च कोटि का है।

मेरी पहली ब्लॉग पोस्टों में से एक ब्लॉग में मैंने बी.बी.सी. के भूतपूर्व संवाददाता मार्क टुली द्वारा लिखे गए एक विचारोत्तेजक लेख से उदाहरण दिया था कि भारत ने किस तरह से ‘सेक्युलरिजम’ को एक बहुत ही स्पष्ट अर्थ दिया है। टुली के कथन को अमित मेहरा द्वारा लिखित ”इंडिया ए टाइमलेस सेलीबिरेशन” नामक एक कॉफी-टेबल बुक के लिए उनके द्वारा लिखी गई प्रस्तावना से उध्दृत किया गया है।

यह पुस्तक विदेश मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा प्रकाशित की गई थी। मैं समझता हूं कि अप्रैल 2006 में विदेश मंत्रालय ने एक विशेष पब्लिक डिप्लोमेसी डीविजन सृजित किया था क्योंकि सरकार ने यह महसूस किया था कि ”आज विश्व में सफल विदेशी नीति व्यवहारकर्ता को सिविल समाज, गैर-सरकारी संस्थाओं (एनजीओ), शिक्षाविदों, बुध्दिजीवियों और मीडिया से खुली तथा नियमित चर्चा करते रहना चाहिए।” यह एक नया प्रभाग है जिसने इस उत्कृष्ट पुस्तक पर विचार किया और इसे छपवाया।

श्री मेहरा की पुस्तक देखने के बाद मैंने पता लगाया कि क्या इस नये प्रभाग ने इस तरह की कोई दूसरी पुस्तक भी छपवाई है। अब तक, मुझे इस प्रभाग द्वारा निकाली गई कई ऑडियो सीडिज प्राप्त हुई हैं। इनमें वर्षों पुराने मुम्बईया फिल्मों के सर्वोत्तम संगीत की सीडीज तथा योग, ध्यान-साधना (मेडीटेशन), आध्यात्मिक और धार्मिक उपचारों की सीडीज भी शामिल हैं।

मैं इन अभिनव प्रयासों के लिए इस प्रभाग को हार्दिक बधाई देना चाहता हूं। मुझे उम्मीद है कि हम किसी छद्म-पंथनिरपेक्षवाद पर कोई हा-हुल्ला करने नहीं जा रहे हैं कि विदेश मंत्रालय भी केसरिया रंग में रंगने लगा है। मैंने मीडिया के कुछ वर्ग देखे हैं जो मध्य प्रदेश के स्कूलों में छात्रों से ‘वंदे मातरम्’ गीत गवाये जाने अथवा शारीरिक व्यायाम के रूप में ‘सूर्य नमस्कार” कराये जाने के विरूध्द हुल्लड़बाजी मचाने की कोशिश कर रहे हैं।

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3 Responses to “राष्ट्रीय पहचान का अन्तर्राष्ट्रीय सन्देश”

  1. Rajesh Naen Says:

    In Haryana the new party HARYANA JANHIT CONGRESS chief Kuldeep Bishnoi voted against Congress on your behalf. But after some time your party declared a ti-up with INELO. Now just tell me how faithful your party and you are?? I am not a worker of HJC, but a reputed media person working with a national hindi daily…
    Just tell me, why I should give my vote to you and your party…

  2. Rajesh Naen Says:

    You are appealing for votes on the name of RAMA once again… But why you forgot your Pakistan visit and your thoughts about JINNAH. Why a Hindu should give vote to you???

  3. pra007 Says:

    sir tell me one thing what the planing of bjp for students of it sector

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